विश्व हिन्दी दिवस को लेकर आंदोलन शुरू इंग्लैण्ड, पाकिस्तान समेत बांग्लादेश सरकारों को ज्ञापन मथुरा, महामना के पुरूषार्थों से सेवा समिति, हासानन्द गोचर भूमि, श्रीकृष्ण जन्म स्थान एवं मालवीय मंच समेत बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसी विश्वस्तरीय संस्थाओं ने भले ही उनके रहनुमाओं को अरबों रूपये की सम्पŸिायों का मालिक बना दिया हो। मगर यह सच है कि किसी भी संस्था द्वारा महामना के महापरिनिर्वाण के 69 वर्षों बाद भी उनके समग्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व का प्रकाशन नहीं किया गया। यह सवाल डाॅ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में शनिवार को विश्रामघाट क्षेत्र में 18 अप्रैल को ‘विश्व हिंदी दिवस’ घोषित कराने की माँग को लेकर आयोजित सभा में उठाया गया। संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष डाॅ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि महामना को भारतरत्न से विभूषित किये जाने की माँग को लेकर 25 दिसम्बर 2014 से शुरू होने वाले आंदोलन पर उŸाराधिकारियों ने हाथ खड़े कर दिये थे। लेकिन जब सरकार ने आंदोलन की भनक लगने पर भारतरत्न की घोषणा कर दी तो उसे लेने के बड़े दावेदार खड़े हो गये। जबकि सच यह है कि महामना के राष्ट्रªीय एवं वैश्विक योगदानों के अवमूल्यन व विलोपन पर उŸाराधिकारियों समेत उŸारदायी संस्थाओं ने कभी पहल नहीं की। जिसका नतीजा यह हुआ कि खादी का सवाल जिसे कभी महामना ने उठाया था, उसे महात्मा गाँधी के नाम से जोड़ दिया गया। चैरी-चैरा कांड के 154 निर्दोष अभियुक्तों को महामना द्वारा फांसी के फंदे से छुड़ाने के बाद भी यह तथ्य घटना के 97 वर्षों तक पाठ्य पुस्तकों में शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा 18 अप्रैल 1900 से महामना के हाथों यूनाइटेड प्राविंसेस में उद्धार पाई देवनागरी राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्थापना को तरसती रही। और तो और प्रदेश की सरकारों ने जहाँ 114 वर्षों से 18 अप्रैल को तवज्जो नहीं दी, वहीं बार एसोसिएशंस हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। महामना के हाशिये पर रखे गये दूसरे राष्ट्रीय योगदानों डाॅ0 शर्मा ने कहा कि अमृतसर का जलियांवाला बाग जब जनरल डायर के पागलपन के चलते खून से लथपथ पड़ा था, तब महामना ही पूरे देश में अकेले नेता थे जो ब्रिटिश सरकार को चुनौती देते हुए अमृतसर पहुँच सके थे। और जलियांवालाबाग का आँखों देखा हाल ब्रिटिश हुकूमत को रात के दो बजे तार करने के बाद ही चैन की सांस ली थी। इसी क्रम में डाॅ0 शर्मा ने आगे कहा कि प्रथम विश्व युद्ध के भारतीय शहीदों की याद में दिल्ली के इण्डिया गेट पर चाहे हम कितना ही गर्व कर लें। मगर शहीदों के बलिदान पर ब्रिटिश सरकार के भेदभाव को लेकर शिमला सदन में महामना को ही गवर्नर ओडायर के पसीने छुड़ाने पड़े थे। जिसके समर्थन में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना भी सदन से वाक आउट कर गये थे। समापन पर डाॅ0 शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 18 अप्रैल को ‘विश्व हिंदी दिवस’ घोषित कराने के साथ-साथ भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय पर वांङमय प्रकाशन, टी0 वी0 सीरियल प्रसारण एवं योगदानों को पाठ्यक्रम में शामिल कराने की माँँग की। इसी के साथ इंग्लैण्ड, पाकिस्तान एवं बांगलादेश की सरकारों से महामना के राष्ट्रीय आंदोलन एवं समाज सेवा के योगदानों को प्रकाशित करने की माँग की। इससे पूर्व उपस्थितों ने माँ यमुना एवं महामना के चित्रपटों पर माल्यार्पण एवं दीपोपहार से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् ‘महामना को दे पहचान, मोदी भारत करो महान’ ‘देश का होगा तभी विकास, याद करोगे जब इतिहास’ नारों से आयोजन स्थल गुंजायमान हो गया। इस अवसर पर मंसोला चतुर्वेदी, घनश्यामलाल शास़्त्री, बैजनाथ चैबे, शैलू, बालो आदि उपस्थित थे।
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