मथुरा

ग्रामीण विकास विभाग स्‍व-रोजगार एवं मजदूरी रोजगार के सृजन, ग्रामीण निर्धनों के लिए आवास एवं सिंचाई परिसम्‍पत्ति के प्रावधान, निराश्रितों को सामाजिक सहायता एवं ग्रामीण सड़कों के लिए स्‍कीमों का कार्यान्‍वयन करता है। इसके अतिरिक्‍त, विभाग डीआरडीए प्रशासन को सुदृढ़ करने हेतु सहायता, पंचायती राज संस्‍थान, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान, मानव संसाधन विकास, स्‍वैच्छिक कार्यवाही का विकास आदि कार्य भी करता है।  ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख कार्यक्रम हैं – प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई), ग्रामीण आवास (आरएच),  महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), स्‍वर्ण जयंती ग्राम स्‍वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) / राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) और राष्‍ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी)। महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ऐसा मांग आधारित मजदूरी रोजगार कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्‍य अकुशल शारीरिक श्रम करने इच्‍छुक व्‍यस्‍क सदस्‍यों वाले प्रत्‍येक ग्रामीण परिवार को एक वित्‍तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के मजदूरी रोजगार की गारंटी देकर आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है। इस योजना के प्रमुख उद्देश्‍य इस प्रकार है: •        ग्रामीण क्षेत्रों में मांग के अनुसार प्रत्‍येक परिवार को एक वित्‍तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन का अकुशल मजदूरी कार्य उपलब्‍ध कराना, जिससे निर्धारित गुणवत्‍ता और स्‍थायित्‍व वाली उपयोगी परिसंपत्‍तियों का निर्माण हो। •        गरीबों की आजीविकाओं को बढ़ावा देना। •        सक्रियतापूर्वक सामाजिक समावेशन सुनिश्‍चित करना तथा •        पंचायती राज संस्‍थाओं का सुदृढ़ीकरण करना। इस कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्‍धियां इस प्रकार हैं : •                 वर्ष 2006 में इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक सीधे ग्रामीण कामगार परिवारों को मजदूरी भुगतान के रूप में 1,63,754.41 करोड़ रुपये की राशि वितरित की गई है। •                 1,657.45 करोड़ श्रम दिवसों के रोजगार का सृजन हुआ है। •                 वर्ष 2008 से हर वर्ष औसतन पांच करोड़ ग्रामीण परिवारों को मजदूरी रोजगार प्राप्‍त हुआ है। •                 31 मार्च, 2014 तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की भागीदारी 48 प्रतिशत रही है। •                 कुल सृजित श्रम दिवसों में महिलाओं के श्रम दिवस 48 प्रतिशत रहे हैं। महिलाओं की यह भागीदारी इस अधिनियम में यथापेक्षित 33 प्रतिशत की अनिवार्य सीमा से काफी अधिक है। •                 इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक इस अधिनियम के अंतर्गत 260 लाख कार्य शुरू किए गए हैं। •                 इस कार्यक्रम की शुरुआत से प्रति श्रम दिवस औसत मजदूरी 81 प्रतिशत बढ़ी है। अधिसूचित मजदूरी दरें मेघालय में न्‍यूनतम 153 रुपये से हरियाणा में अधिकतम 236 रुपये तक हैं। त्‍वरित और पारदर्शी संचालन सुनिश्‍चित करने के लिए इलैक्‍ट्रानिक निधि निगरानी प्रणाली (ईएफएमएस) और इलैक्‍ट्रानिक मस्‍टर प्रबंधन प्रणाली (ईएमएमएस) शुरू की गई है। इनके अतिरिक्‍त कामगारों के खातों में आधार समर्थित प्रत्‍यक्ष इलैक्‍ट्रानिक अंतरण में बैंकों और बिजनेस कारेस्‍पेंडेंटों के बीच कार्य संचालन का प्रावधान भी है। राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) आबंटन और कवरेज की दृष्‍टि से एनआरएलएम मंत्रालय का दूसरा सबसे बड़ा कार्यक्रम है और इसका उद्देश्‍य वर्ष 2021-22 तक 8-10 करोड़ गरीब ग्रामीण परिवारों को स्‍व-सहायता समूहों और गांवों तथा इससे ऊपर के स्‍तरों के संघों में संगठित करके लाभान्‍वित करना है। एनआरएलएम में भागीदारीपूर्ण प्रक्रियाओं के माध्‍यम से और ग्राम सभा के अनुमोदन से निर्धारित किए गए समाज के गरीब और कमजोर वर्गों की पर्याप्‍त कवरेज सुनिश्‍चित की जाती है। पंचायती राज संस्‍थाओं के साथ गहन तालमेल इस कार्यक्रम की अहम विशेषता है। वर्ष 2013-14 के दौरान आजीविका-एनआरएलएम के अंतर्गत सभी अपेक्षाओं की पूर्ति, कार्यान्‍वयन संरचना की स्‍थापना, उन्‍हें व्‍यापक प्रारंभिक प्रशिक्षण और क्षमता विकास सहायता प्रदान करके उनका सुदृढ़ीकरण करके एनआरएलएम शुरू करने में राज्‍य मिशनों की सहायता करने पर जोर दिया गया। मार्च, 2014 तक 27 राज्‍यों और पुदुचेरी संघ राज्‍य क्षेत्र में एनआरएलएम शुरू कर दिया है और एसआरएलएम स्‍थापित कर दिए हैं। वर्ष 2012-13 के दौरान शुरू किए गए संसाधन ब्‍लॉक ने सामुदायिक संस्‍थाओं और सामाजिक पूंजी के सृजन की गुणवत्‍ता के संदर्भ में प्रभावी परिणाम दर्शाए हैं। एनआरएलएम ने विकलांग व्‍यक्‍तियों, बुजुर्गों, अत्‍यधिक कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी), बंधुआ मजदूरों, मैला ढ़ोने वालों, अनैतिक मानव व्‍यापार पीड़ितों जैसे समाज के सर्वाधिक उपेक्षित और कमजोर समुदायों तक लाभ पहुंचाने वाली विशेष कार्यनीतियां तैयार करने तथा प्रायोगिक परियोजनाओं पर जोर दिया है। इस वर्ष के दौरान मानव संसाधन नियमावली, वित्‍तीय प्रबंधन नियमावली के अंगीकरण के माध्‍यम से तथा ब्‍याज सब्‍सिडी कार्यक्रम शुरू करके संस्‍थागत प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण पर जोर दिया गया। आजीविका की सहायता से लगभग 1.58 लाख युवाओं ने अपने उद्यम स्‍थापित कर लिए हैं। 24.5 लाख महिला किसानों को भी सहायता दी गई है। कौशल विकास आजीविका कौशल भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की कौशल और रोजगार परक पहल है। आजीविका कौशल राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम)- आजीविका का एक घटक है। यह घटक ग्रामीण गरीबों को आय के विविध स्रोत उपलब्‍ध कराने की जरूरत पूरी करने तथा ग्रामीण युवाओं की व्‍यावसायिक आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्‍य गरीब ग्रामीण युवाओं के कौशलों का विकास करके उन्‍हें न्‍यूनतम मजदूरी या उससे अधिक दरों पर नियमित मासिक मजदूरी वाले रोजगार दिलाना है। इस कार्यक्रम में ग्रामीण युवाओं की कौशल विकास और उन्‍हें औपचारिक क्षेत्र में रोजगार दिलाने पर जोर दिया जाता है। वर्ष 2013-14 में पांच लाख ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया था, जिनमें से 2,08,843 युवाओं को मार्च, 2014 तक प्रशिक्षित किया गया और 1,39,076 को रोजगार दिलाया गया। भारत ग्रामीण आजीविका फाउंडेशन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 सितंबर, 2013 को आयोजित अपनी बैठक में भारत ग्रामीण आजीविका फाउंडेशन (बीआरएलएफ) नामक एक स्‍वतंत्र पंजीकृत सोसायटी स्‍थापित करने का निर्णय लिया था। फाउंडेशन का गठन, एक ओर सरकार और दूसरी ओर निजी क्षेत्र की परोपकारी संस्‍थाओं, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (कॉर्पोरेट क्षेत्र के सामाजिक दायित्‍व के अंतर्गत) के बीच साझेदारी के रूप में किया गया है। राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसायटी (एनआरएलपीएस) राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसायटी (एनआरएलपीएस) की स्‍थापना एक स्‍वायत्‍त एवं स्‍वतंत्र निकाय के रूप में जुलाई 2013 में की गई। एनआरएलपीएस एनआरएलएम के विभिन्‍न स्‍तरों पर मुख्‍य/अग्रणी तकनीकी सहायता एजेंसी के रूप में कार्य करती है। सोसायटी का मुख्‍य उद्देश्‍य कार्यक्रम की आयोजना, कार्यान्‍वयन और निगरानी में राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन (एसआरएलएम) का सतत क्षमता निर्माण करना है। यह एसआरएलएम के लिए ज्ञान संसाधन केंद्र के रूप में भी कार्य करती है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) हालांकि, संविधान में राष्‍ट्रीय राजमार्गों को छोड़ कर अन्‍य सड़कें राज्‍य सूची में हैं, फिर भी राज्‍यों को सहायता देने के लिए भारत सरकार ने गरीबी उपशमन कार्यनीति के अंतर्गत केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में 25 दिसंबर, 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम का मुख्‍य उद्देश्‍य कोर नेटवर्क में शामिल तथा सड़क मार्गों से न जुड़ी 500 तथा उससे अधिक (2001 की जनगणना) जनसंख्‍या वाली सभी पात्र बसावटों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है। पर्वतीय राज्‍यों (पूर्वोत्‍तर, सिक्‍किम, हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू एवं कश्‍मीर तथा उत्‍तराखंड), मरुभूमि क्षेत्रों (मरुभूमि विकास कार्यक्रम में यथानिर्धारित), जनजातीय (अनुसूचीV) क्षेत्रों तथा पिछड़े जिलों (गृह मंत्रालय और योजना आयोग द्वारा निर्धारित) में 250 तथा उससे अधिक की जनसंख्‍या (जनगणना 2001 के अनुसार) वाली बसावटों को सड़क मार्गों से जोड़ने का उद्देश्‍य है। इस कार्यक्रम में एक बारहमासी सड़क-संपर्क की परिकल्‍पना की गई है। अब देश में ऐसी सड़कों का लगभग 4,04,000 कि.मी. का नेटवर्क निर्मित किया गया है। खेत से सीधे बाजार तक सड़क संपर्क की सुनिश्‍चितता की दृष्टि से इस कार्यक्रम में वर्तमान थ्रू रूटों और प्रमुख ग्रामीण संपर्कों के विनिर्दिष्‍ट मानकों के अनुसार उन्‍नयन का प्रावधान है, हालांकि यह केंद्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत नहीं आता है। पीएमजीएसवाई के अंतर्गत 50,000 पात्र परियोजनाओं में से 10,725 परियोजनाएं मंजूर की गई हैं। दिनांक 31 मार्च, 2014 तक 97,838 बसावटों को सड़कों से जोड़ा गया है। 2,48,919 किमी के नए सड़क संपर्कों का निर्माण कर लिया गया है। ग्रामीण सड़कों की महत्‍ता का अंदाजा सड़क निर्माण अथवा निर्माण के शीघ्र पश्‍चात नहीं लगाया जा सकता। कुछ वर्षों के उपरांत ही विशेष रूप से जब यातायात की आवाजाही बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था में बाजार तक पहुंच का पूरा दोहन किया जाता है तब सड़कों के लाभ का पूरा पता चलता है। ग्रामीण सड़कों के नियमित रखरखाव से ही सामाजिक-आर्थिक विकास का पूरा लाभ प्राप्‍त होता है और गरीबी कम होती है। इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) मंत्रालय के गरीबी उपशमन के प्रयासों की व्‍यापक कार्यनीति के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय की इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) नामक प्रमुख योजना शुरुआत से ही बेघर या अपर्याप्‍त आवासीय सुविधाओं वाले बीपीएल परिवारों को सुरक्षित और टिकाऊ आश्रय के निर्माण के लिए सहयाता देती रही है। ‘सभी के लिए आश्रय’ की मंत्रालय की प्रतिबद्धता को तब और रफ्तार मिली, जब भारत ने जून, 1999 में मानव बस्‍ती संबंधी इस्‍तांबुल घोषणा पर हस्‍ताक्षर करके यह स्‍वीकार किया कि सुरक्षित स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक आश्रय तथा आधारभूत सेवाओं की उपलब्‍धता व्‍यक्ति के शारीरिक, मनौवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक कल्‍याण के लिए बेहद जरूरी हैं। पर्यावास दृष्टिकोण का उद्देश्‍य सभी, विशेषकर वंचित शहरी और ग्रामीण गरीबों के लिए अवसंरचना, सुरक्षित पेयजल, स्‍वच्‍छता, बिजली इत्‍यादि जैसी आधारभूत सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने वाले प्रयासों के माध्‍यम से पर्याप्‍त आश्रय सुनिश्‍चित करना है। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए कि ग्रामीण आवास उपेक्षितों के लिए किया जाने वाला प्रमुख गरीबी उपशमन उपाय है, केंद्र सरकार सभी के लिए आश्रय उपलब्‍ध कराने के प्रयासों के तहत इंदिरा आवास योजना चला रही है। मकान केवल आश्रय और निवास स्‍थान नहीं होता बल्कि यह एक ऐसी संपत्‍ति है, जिससे आजीविका के साधन उपलबध होते हैं और जो सामाजिक स्‍थिति का प्रतीक होने के साथ-साथ सांस्‍कृतिक अभिव्‍यक्ति का एक रूप भी होता है। वर्ष 2013-14 में 13.73 लाख मकानों का निर्माण किया गया।               महिला सशक्‍तीकरण  वर्ष 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत महिला कामगारों की भागीदारी 53 प्रतिशत थी, जबकि सांविधिक न्‍यूनतम आवश्‍यकता 33 प्रतिशत है। एनआरएलएम के सभी लाभ केवल ग्रामीण गरीब महिलाओं के लिए हैं। एनआरएलएम के महिला किसान सशक्‍तीकरण परियोजना नामक उपघटक का उद्देश्‍य महिला किसानों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्‍य से उन  महिलाओं हेतु स्‍थायी आजीविका के अवसर सृजित करना है। आजीविका कौशल के अंतर्गत 33 प्रतिशत प्रत्‍याशी महिलाएं होनी चाहिएं। इंदिरा आवास योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार आईएवाई मकानों का आवंटन विधवा/अविवाहित/पति से अलग रह रही महिला के मामले को छोड़कर अन्‍य सभी मामलों में पति और पत्‍नी के संयुक्‍त नाम से किया जाना चाहिए। राज्‍य चाहें तो इन मकानों का आवंटन केवल महिलाओं के नाम पर भी कर सकते हैं। एनएसएपी की विभिन्‍न योजनाओं के अंतर्गत बीपीएल श्रेणी के विधवाओं और वृद्ध महिलाओं को सहायता दी जाती है। महिलाओं के लाभार्थ कम से कम 30 प्रतिशत योजनागत संसाधनों का निर्धारण करने के लिए ग्रामीण विकास विभाग ने जेंडर बजट प्रकोष्‍ठ की स्‍थापना कर दी है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्‍पसंख्‍यकों के लिए प्रयास सभी के लिए विशेषकर लाभवंचित समूहों के व्‍यक्‍तियों के लिए समान अवसर किसी भी विकास संबंधी पहल का एक अनिवार्य घटक है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का मुख्‍य उद्देश्‍य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी को कम करना है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सहित समाज के सर्वाधिक लाभवंचित वर्गों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से यह मंत्रालय विशेष रोजगार सृजन कार्यक्रमों के माध्‍यम से विभिन्‍न योजनाओं/कार्यक्रमों को क्रियान्‍वित कर रहा है। मंत्रालय ने इस संबंध में दिशानिर्देशों में विशेष प्रावधान किए हैं। तदनुसार, आईएवाई और एनआरएलएम के अंतर्गत अनुसूचित जाति उप-योजना (एससीएसपी) और जनजातीय उप-योजना (टीएसपी) के लिए निधियां निर्धारित की गई हैं। आजीविका में, कम से कम 50% महिला लाभार्थी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से तथा 15% महिला लाभार्थी अल्‍पसंख्‍यक समुदायों से होंगी। इसके अलावा, राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका परियोजना (एनआरएलपी) के अंतर्गत संसाधनों के व्‍यापक उपयोग के लिए ऐसे 13 राज्‍यों का चयन किया गया है जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित ग्रामीण निर्धनों की आबादी काफी अधिक है। एसजीएसवाई के अंतर्गत, स्‍व-सहायता समूहों के लगभग 86 लाख अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सदस्‍यों को आर्थिक कार्यकलाप करने के लिए सहायता प्रदान की गई थी। एनआरएलएम के हिस्‍से के रूप में, स्‍व-सहायता समूहों में मुख्‍य रूप से 5.16 लाख अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तथा 50,000 अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के सदस्‍यों को प्रोत्‍साहित किया गया था। कौशल विकास के अंतर्गत, अनुसूचित जाति के 2.21 लाख, अनुसूचित जनजाति के 1.04 लाख और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के 54136 ग्रामीण युवा सदस्‍यों को प्रशिक्षण दिया गया था। इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए कम से कम 60% तथा अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए 15% निधियों का उपयोग किया जाना अपेक्षित है। वर्ष 2013-14 में, स्‍वीकृत किए गए कुल 18.66 लाख मकानों में से 6.89 लाख मकान अनुसूचित जाति के लिए, 5.20 लाख मकान अनुसूचित जनजाति के लिए और 2.36 लाख मकान अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए मंजूर किए गए हैं। वर्ष 2013-14 के दौरान 10151.99 करोड़ रु. के कुल व्‍यय में से 6296.52 करोड़ रु. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए तथा 1270.13 करोड़ रु. अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए खर्च किए गए हैं। मनरेगा योजना के अंतर्गत, वर्तमान वर्ष के दौरान सृजित किए गए रोजगार के कुल 126.36 करोड़ श्रमदिवसों में से अनुसूचित जाति के लिए 29.65 करोड़ श्रमदिवस (23%) और अनुसूचित जनजाति के लिए 19.53 करोड़ श्रमदिवस (15%) सृजित किए गए थे। विशेष क्षेत्रों के लिए लक्षित उपाय हालांकि 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992)  में ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्‍थाओं (पीआरआई) की स्‍थापना के व्‍यापक विधिक – संवैधानिक फ्रेम वर्क का प्रावधान किया गया है, लेकिन सही मायने में विभिन्‍न राज्‍यों में इस अधिनियम के कार्यान्‍वयन में अंतर रहा है। इस अंतर के परिणामस्‍वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में स्‍थानीय स्‍तर पर एक ही जैसी संस्‍थागत संरचनाओं की संस्‍थागत क्षमताओं में अंतर था। विशेषकर जिन क्षेत्रों में इन संस्‍थाओं को सार्वजनिक वस्‍तुओं और सेवाओं की प्रदायगी में प्रमुख भूमिका दी गई, उन क्षेत्रों में विकास संबंधी परिणामों में अंतर आने का कारण भी कुछ हद तक यह अंतर ही है। केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) के उद्देश्‍य और प्रचालन दिशा-निर्देश तो एक समान हैं लेकिन उनके कार्यान्‍वयन के परिणाम विभिन्‍न क्षेत्रों में अलग-अलग हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की सभी योजनाओं में पूर्वोत्‍तर के विशेष श्रेणी वाले आठ राज्‍यों पर विशेष जोर दिया गया है। केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के बजट (सकल बजटीय सहायता) का 10 प्रतिशत निर्धारित करने और केंद्रीय संसाधनों का व्‍यपगत न हो सकने वाला पूल तैयार किए जाने का लाभ हाल के वर्षों में प्राप्‍त हुआ है। वर्ष 2013-14 के दौरान मनरेगा के अंतर्गत केंद्र सरकार के हिस्‍से के रूप में पूर्वोत्‍तर राज्‍यों को 2801.49 करोड रुपये रिलीज किए गए, जबकि जबकि एनआरएलएम के अंतर्गत 228.20 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) आवंटित किए गए, जिसमें से 110.87 करोड़ रुपये रिलीज किए गए। वर्ष 2013-14 के दौरान पीएमजीएसवाई के अंतर्गत पूर्वोत्‍तर राज्‍यों को 353.31 करोड़ रुपये रिलीज किए गए। एनएसएपी के अंतर्गत सर्वव्‍यापी कवरेज की परिकल्‍पना की गई थी और प्रत्‍येक राज्‍यों को निधियों का आवंटन लाभार्थियों की अनुमानित संख्‍या के आधार पर किया गया। वर्ष 2013-14 के दौरान 82 समेकित कार्य योजना (आईएपी) जिलों में मनरेगा के अंतर्गत 86.07 लाख परिवारों को रोजगार मिला; 4039.50 लाख श्रम दिवसों का सृजन हुआ और 702196.12 लाख रुपये खर्च किए गए। समेकित कार्ययोजना जिलों में योजना के प्रभावी कार्यान्‍वयन के लिए इस योजना के प्रावधानों में कई छूट दी गई हैं। लक्षित 88 समेकित कार्ययोजना जिलों में 56,257 बसावटों को पीएमजीएसवाई के अंतर्गत सड़क से जोड़े जाने का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्‍य में से अब तक 41.379 बसावटें स्‍वीकृत की गई हैं और 24,057 बसावटें (स्‍वीकृत बसावटों का 58 प्रतिशत) सड़कों से जोड़ी गई हैं। इसी प्रकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 82 जिलों को भी दुर्गम क्षेत्रों की श्रेणी में शामिल किया गया है और इन जिलों में आईएवाई लाभार्थियों को एक मकान के निर्माण के लिए 75 हजार रुपये की बढ़ी हुई सहायता दी जाती है। वामपंथी उग्रवाद से सर्वाधिक प्रभावित 27 जिलों में युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार दिलाने के लिए आजीविका कौशल के अंतर्गत रोशनी नामक विशेष पहल 7 जून, 2013 को शुरू की गई। एनआरएलएम में आईएपी जिलों को लाभान्‍वित करने को प्राथमिकता दी गई है। अब तक कई आईएपी जिले एनआरएलएम गहन जिले भी हैं। 88 आईएपी जिलों में से 53 जिले पहले से ही एनआरएलएम की गहन कवरेज में शामिल हैं। जम्‍मू और कश्‍मीर के लिए विशेष पहल के अंतर्गत 223 करोड़ रुपये रिलीज किए गए हैं तथा 5186.66 किमी लंबाई वाले 962 सड़क कार्यों का निर्माण कार्य संपन्‍न किया गया। आजीविका कौशल के अंतर्गत हिमायत कौशल विकास की विशेष योजना है। ग्रामीण विकास का उद्देश्‍य पांच वर्षों की अवधि (2011-12 से 2016-17 तक) में जम्‍मू और कश्‍मीर के एक लाख युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करके संगठित क्षेत्रों में रोजगार दिलाना है। आशा है कि एनआरएलएम में उम्‍मीद कार्यक्रम के अंतर्गत राज्‍य सरकार पांच वर्षों की अवधि में लगभग नौ लाख महिलाओं को लाभान्‍वित करेगी। ये महिलाएं दो तिहाई ग्रामीण परिवारों का प्रतिनिधित्‍व करती हैं।  इस कार्यक्रम में राज्‍य के 22 जिलों के 143 ब्‍लॉकों में सभी 3292 ग्राम पंचायतों की नौ लाख महिलाओं को लाभान्‍वित किया जाएगा। पर्यावरण के अनुकूल प्रयास अच्‍छी पारिस्थितिकीय प्रणालियां ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर उपेक्षित समुदायों के लिए कृषि आधारित आजीविकाओं तथा पेयजल, स्‍वच्‍छता और स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख जैसी आवश्‍यक सेवाओं की उपलब्‍धता बढ़ाने में सहायक होती हैं। प्राकृतिक संसाधनों में निवेश से समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और उनमें प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता विकसित करने में भी मदद मिलती है। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय की कार्यनीति में एक बड़ा बदलाव है। स्‍थायी गरीबी उपशमन के लक्ष्‍य की प्राप्‍ति में योगदान की क्षमताओं का उपयोग करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के किफायती उपयोग के लिए मंत्रालय निम्‍नलिखित पर ध्‍यान दे रहा है : •         जल निकायों और जलाशयों सहित पारिस्थितिकीय प्रणालियों की गुणवत्‍ता और वहन क्षमता बढ़ाना तथा प्राकृतिक संसाधनों के क्षय की रोकथाम करना; •         प्राकृतिक संसाधनों के स्‍थाई उपयोग पर आधारित स्‍थायी आजीविकाओं को बढ़ावा देना; •         पारिस्थितिकीय प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना ताकि विनाशकारी मौसमी परिस्‍थितियों में कमी आए तथा जलवायु परिवर्तन की समस्‍या से निपटा जा सके •         ऊर्जा, सामग्री, प्राकृतिक संसाधनों के किफायती उपयोग और नवीकरणीय सामग्री के अधिक प्रयोग के माध्‍यम से विभिन्‍न कार्यकलापों के पारिस्‍थितिकीय तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों की रोकथाम करना। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2009-10 से 2011-12 के बीच के एक वर्ष के दौरान ग्रामीण मासिक प्रति व्‍यक्‍ति उपभोग व्‍यय (एमपीसीई) 5.5 प्रतिशत की तेज रफ्तार से बढ़ा (एनएसएसओ-2012)। हालांकि औसत ग्रामीण एमपीसीई शहरी औसत से लगभग आधी रही, लेकिन ग्रामीण आय और व्‍यय में वृद्धि ग्रामीण गरीबी अनुपात में भारी कमी दर्शाती है। यह अनुपात मात्र दो वर्षों में 34 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत से भी कम हो गया है। क्रय शक्‍ति बढ़ने के परिणामस्‍वरूप ग्रामीण बाजार अब बाकी बचे सामान का खुदरा बाजार नहीं रह गए हैं। विशेष रूप से ग्रामीण मांग की पूर्ति के लिए उत्‍पाद तैयार किए जा रहे हैं। ग्रामीण भारत अब अपनी उपस्‍थिति का अहसास करा रहा है। इसके अतिरिक्‍त बड़े गांव भी शहरी केंद्रों से जुड़े सक्रिय विकास केंद्रों के रूप में तेजी से उभर रहे हैं।

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डॉ. विश्व मोहन कटोच किसी रोग का इलाज उसके निदान पर निर्भर करता है अर्थात यदि समय पर और सटीक निदान कर लिया जाए तो जहां चिकित्सक द्वारा उपयुक्त इलाज की शीघ्र शुरुआत करना आसान हो जाता है वहीं रोगी में उभरने वाली गंभीर जटिलताओं और उनके इलाज पर होने वाले व्यय भार से भी बचा जा सकता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग / भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) का उद्देश्य रोगों के निदान, चिकित्सा विधियों और रोगनिवारण के लिए वैक्सीन से संबंधित अनुसंधान और नवाचारों के माध्यम से लोगों तक आधुनिक स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी को पहुंचाना, शोध परिणामों को उत्पादों और प्रक्रियाओं में रूपांतरित करना है और संबंधित संगठनों के सहयोग में इन नवाचारों को जन स्वास्थ्य प्रणाली में सम्मिलित कराना है। हाल के वर्षों में आईसीएमआर / स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा नवाचारों एवं प्रौद्योगिकियों के माध्यम से निम्नलिखित प्रमुख उपलब्धियां प्राप्त की गईं: जापानी मस्तिष्कशोथ के लिए स्वदेशी विकसित वैक्सीन का लोकार्पण भारत में तीव्र मस्तिष्कशोथ संलक्षण (एक्यूट एनसिफैलाइटिस सिण्ड्रोम) एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में वेल्लोर में प्रकाश में आया। जेई विषाणु देश के 19 राज्यों के 171 जिलों में फैल गया। अभी तक जेई की वैक्सीन चीन से आयात की जाती है। आईसीएमआर के पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (पब्लिक) और भारत बायोटेक (प्राइवेट) की भागीदारी में जेनवैक नामक प्रथम स्वदेशी जापानी मस्तिष्कशोथ वैक्सीन विकसित की गई। राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान, पुणे द्वारा स्वदेशी विषाणु उपभेद (स्ट्रेन) पृथक किया गया और उसकी विशेषता ज्ञात की गई। इसे वैक्सीन निर्माण के लिए हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक को उपलब्ध कराया गया। आईसीएमआर एवं भारत बायोटेक की भागीदारी में विकसित जेनवैक नामक वैक्सीन को भारत सरकार के औषधि नियंत्रक द्वारा लाइसेंस प्रदान किया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में इस स्वदेशी जेनवैक वैक्सीन के सम्मिलित होने से देश के विशेषतया जेई प्रभावित क्षेत्रों में जनता को पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध कराई जा सकेगी और स्वावलम्बिता प्राप्त की जा सकेगी। थैलासीमिया के आण्विक निदान हेतु जांच किट बीटा थैलासीमिया मेजर बचपन में होने वाला एक गंभीर आनुवंशिक एनीमिया है। यह भारत में प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों को प्रभावित करता है। थैलासीमिया से पीड़ित बच्चा प्राय: छह माह से दो वर्ष की आयु में पीला पड़ जाता है और पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता। ऐसे बच्चों को नियमित रक्ताधान की आवश्यकता पड़ती है। जिससे उसके शरीर में आयरन (लौह) की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इस आयरन का निष्कासन अति आवश्यक है जो बहुत खर्चीला होता है। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है। भारत में प्रतिवर्ष थैलासीमिया मेजर के साथ पैदा होने वाले 10,000 से 12,000 बच्चों के साथ लगभग तीन से चार करोड़ थैलासीमिया के संवाहक हैं। प्रत्येक वर्ष 5000 से अधिक बच्चे सिकिल सेल एनीमिया के साथ पैदा होते हैं। इस विकार के संवाहकों को पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि माता-पिता दोनों थैलासीमिया (थैलासीमिया ट्रेट) के वाहक हैं तो 25 प्रतिशत मामलों में उनके बच्चे में यह वंशानुक्रम विकार होता है। बीटा थैलासीमिया और सिकिल सेल एनीमिया की जांच के लिए आईसीएमआर ने सटीक तकनीक से लैस थैलासीमिया जांच किट का विकास किया है। आईसीएमआर के मुम्बई स्थित राष्ट्रीय प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह तकनीक माता-पिता और गर्भस्थ शिशु में थैलासीमिया के लक्षणों का पता लगाने में मदद करेगी जिससे इस बीमारी से पीड़ित बच्चे के जन्म को रोका जा सकेगा। इससे प्रसवपूर्व गर्भस्थ शिशु में इसका निदान करके उपयुक्त सलाह दी जा सकेगी जिससे थैलासीमिया संभावित शिशु के जन्म को रोका जा सकेगा। यह तकनीक पीसीआर जैसी बुनियादी सेवाओं से लैस संस्थानों जैसे- जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के लिए बहुत उपयोगी है।  सर्वाइकल कैंसर हेतु एवी मैग्नीविज़ुअलाइज़र जांच युक्ति विकसित सर्वाइकल अर्थात गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से अभी भी ग्रामीण और अर्द्धशहरी अनेक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। अनुमानत: प्रतिवर्ष सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित लगभग 1,32,000 रोगियों की पहचान की जाती है। इनमें इसके कारण लगभग 74,000 मौतें हो जाती हैं। वर्तमान में सर्वाइकल कैंसर की जांच सुविधा केवल क्षेत्रीय कैंसर संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध है जो मंहगी है। आईसीएमआर के नोएडा स्थित कौशिकी एवं निवारक अर्बुदशास्त्र संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एवी मैग्नीविज़ुअलाइज़र एक कम मूल्य वाली पर प्रभावशाली युक्ति है जिसके माध्यम से जिला और उपजिला स्तर पर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर प्रयोग किया जा सकेगा। एक 12 वोल्ट की बैटरी से परिचालित यह युक्ति फील्ड में भी उपयोग की जा सकती है। इस युक्ति से कैंसर पूर्व स्थितियों की शीघ्र पहचान हो जाने से समय से चिकित्सा प्रबंध के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में सर्वाइकल कैंसर ग्रस्त रोगियों का प्रारंभिक अवस्था में निदान करके उनका जीवन बचाया जा सकेगा। मधुमेह जांच प्रणाली और परीक्षण स्ट्रिप्स आईसीएमआर की वित्तीय सहायता से संपन्न शोध कार्य के परिणामस्वरूप बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी के हैदराबाद कैम्पस के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित रक्त ग्लूकोज़ मॉनीटरिंग प्रणाली 'क्विकचेक' और मुम्बई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान एवं बायोसाइंस द्वारा विकसित 'सुचेक' स्ट्रिप्स नामक युक्तियां विकसित की गईं। आज भारत में लगभग 13 करोड़ लोग मधुमेह पूर्व अवस्था अथवा मधुमेह से ग्रस्त हैं। स्वदेशी विकसित इन सस्ती युक्तियों और परीक्षण स्ट्रिप्स से मधुमेह की जांच और इसका निदान व्यापक पैमाने पर संभाव्य और वहनयोग्य है। ये युक्तियां मधुमेह की तेजी से बढ़ती चुनौतियों का सामना करने में भारत को आत्म-निर्भर बनाने की दिशा में शुरुआती कदम है। एलाइज़ा आधारित सीरम फेरीटिन आकलन किट यह लोगों में लौह की स्थिति, डिब्बाबंद भोजन तथा अन्य औषधियों / न्युट्रास्युटिकल्स में इसकी जैव उपलब्धता की जांच में सहायक है। यह लौह अल्पता जन्य अरक्तता अर्थात एनीमिया नियंत्रण कार्यक्रम को मज़बूत बनाने एवं लौह अल्पता जन्य आबादी में लौह की स्थिति की जांच के परिणामस्वरूप उसके स्तर को सुधारने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ड्राइड ब्लड स्पॉट (डीबीएस) संग्रह किट राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित डीबीएस संग्रह किट रक्त नमूना एकत्र करने तथा परिवहन के लिए क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के लिए एक सुविधाजनक विधि है। यह किट दूर दराज क्षेत्रों की आबादी में विटामिन ए की सब-क्लीनिकल कमी की जांच में सहायक है। इस किट से बच्चों को होने वाली असुविधा कम होती है। यह अंधता अनेक अन्य बीमारियों से बचाव के लिए कारगर है। इससे विटामिन ए की कमी वाली आबादी में इसे उपयुक्त मात्रा में सेवन करने की सलाह दी जा सकेगी और बड़ी संख्या में बच्चों को अंधता से बचाया जा सकेगा। पीसीआर आधारित रोगाणु (पैथोजन) जांच किट राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह किट भोजन और पानी में घातक बैक्टीरिया (जीवाणु) की त्वरित पहचान करने में कारगर, सुग्राही, विशिष्ट और किफायती है। यह समय, धन और श्रम बचाने में सहायक है। यह जांच किट खाद्य पदार्थों में घातक जीवाणुओं की त्वरित पहचान करके, उसे जीवाणु मुक्त बनाकर सुरक्षित रखने में मदद करेगी। इस तरह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों और इसकी वित्तीय सहायता में संपन्न शोध कार्यों के परिणामस्वरूप विकसित उपर्युक्त प्रौद्योगिकियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में सम्मिलित किए जाने के लिए तैयार हैं जो जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में अत्यन्त सहायक साबित होंगी।

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यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला। आज जहां से यमुना का प्रवाह है, वहा वह सदा से प्रवाहित नहीं होती रही है। पौराणिक अनुश्रुतियों और ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है, कि यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला है। जबकि यमुना पिछले हजारों वर्षो से हमारे जीवन की धारा के रूप में विधमान है, तथापि इसका प्रवाह समय समय पर परिवर्तित होता रहा है। महाभारत काल से वर्तमान तक यमुना की बदलती धारा के विषय में ज्ञात होता है कि यमुना कभी नन्दगांव, बरसाना गोर्वधन के निकट से होकर बहती थी। यमुना ने अपने दीर्घ  जीवन काल में इसने कितने स्थान वदले है, उनमें से बहुत कम की ही जानकारी हो सकी है। मगर एक प्राचीन महाभारत काल के एक मानचित्र के अनुसार यह अवश्य ज्ञात होता है कि यमुना की धारा गोर्वधन के निकट से बहती थी। प्राचीन काल में यमुना मधुबन के समीप से बहती थी, जहां उसके तट पर शत्रुध्न जी ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के निकट था । सत्रहवीं शताबदी में भारत आने वाले यूरोपीय विद्वान टेवर्नियर ने कटरा के समीप की भूमि को देख कर यह अनुमानित किया था कि वहां किसी समय यमुना की धारा थी।  इस संदर्भ में मथुरा के तत्कालीन जिला कलेक्टर मथुरा के अजायब घर के संस्थापक ग्राउज का मत है कि ऐतिहासिक काल में कटरा के समीप यमुना के प्रवाहित होने की संभावना कम है, किन्तु अत्यन्त प्राचीन काल में वहाँ यमुना का प्रवाह अवश्य था। इस बात से यह सिद्ध होता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के समीप ही था। कनिधंम का अनुमान है, यूनानी लेखकों के समय में यमुना नदी की एक मुख्य धारा या उसकी एक बड़ी शाखा कटरा केशव देव की पूर्वी दीवाल के नीचे से बहती होगी। जव मथुरा में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हो गया और यहाँ यमुना के दोंनों ओर अनेक संधाराम बनाये गये, तव यमुना की मुख्य धारा कटरा से हटकर प्रायः उसी स्थान पर बहती होगी, जहाँ वह अब है, किन्तु उसकी कोई शाखा अथवा सहायक नही कटरा के निकट भी विधमान रही होगी। ऐसा अनुमान है, यमुना की वह शाखा बौद्ध काल के बहुत बाद तक संभवतः सोलहवीं शताब्दी तक केशव देव मन्दिर के नीचे बहती रही थी। पहिले दो वरसाती नदियाँ ‘‘सरस्वती’’ और ‘‘कृष्ण गंगा’’ मथुरा के पश्चिमी भाग में प्रवाहित होकर यमुना में गिरती थीं, जिनकी स्मृति में यमुना के सरस्वती संगम और कृष्ण गंगा नामक धाट आज भी इतिहास के गबाह वने हुए हैं। संभव है यमुना की उन सहायक नादियों में से ही कोई कटरा केशव देव के पास से होकर बहती रही हो। प्राचीन ग्रन्थों से ज्ञात होता है, प्राचीन वृन्दाबन में यमुना गोबर्धन के निकट प्रवाहित होती थी। जवकि वर्तमान में वह गोबर्धन से लगभग कई मील दूर हो गई है। गोवर्धन के निकटवर्ती दो छोटे ग्राम ‘‘जमुनावती’’ और परसौली है। वहाँ किसी काल में यमुना के प्रवाहित होने के उल्लेख मिलते हैं। बल्लभ कुल सम्प्रदाय के वार्ता साहित्य से ज्ञात होता है कि सारस्वत कल्प में यमुना नदी जमुनावती ग्राम के समीप बहती थी। उस काल में यमुना नदी की दो धाराऐं थी, एक धारा नंदगाँव, वरसाना, संकेत के निकट वहती हुई गोबर्धन में जमुनावती पर आती थी और दूसरी धारा पीरधाट से होती हुई गोकुल की ओर चली जाती थी। आगे दानों धाराएँ एक होकर वर्तमान आगरा की ओर बढ़ जाती थी। परासौली में यमुना नदी की धारा प्रवाहित होने का प्रमाण स. १७१७ तक मिलता है। यद्यपि इस पर विश्वास करना कठिन है। श्री गंगाप्रसाद कमठान ने ब्रजभाषा के एक मुसलमान भक्तकवि कारबेग उपमान कारे का वृतांत प्रकाशित किया है। काबेग के कथनानुसार जमुना के तटवर्ती परासौली गाँव का निवासी था और उसने अपनी रचना सं १७१७ में श्रजित की थी।

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रंजीता ठाकुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में संपन्न हुई नेपाल यात्रा, 3—4 अगस्त 2014, दोनों देश के बीच द्विपक्षीय रिश्तों के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित होने वाला दौरा है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की 17 साल उपरांत की गई नेपाल यात्रा थी। इससे पहले, वर्ष 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने नेपाल यात्रा की थी। उसके बाद से नेपाल की ओर से भारत से शीर्ष स्तर पर दौरे को लेकर अनुरोध होता रहा। लेकिन यह एक हकीकत में नहीं बदल पाया। हालांकि इस दौरान भी नेपाल के प्रधानमंत्री भारत आते रहे। भारत के साथ उनके रिश्ते सामान्य रहे। लेकिन दौरे से जो करीबी लाई जा सकती थी उसको लेकर थोड़ी सुस्ती जरूर दिखी। इतने लंबे समय के बाद जब प्रधानमंत्री वहां गए तो ऐसा लगा जैसे नेपाली शासन, प्रशासन और जनता इन सभी वर्षो के इंतजार की बेसब्री और दिए जाने वाले समर्थन, सहयोग को एक पल में देने को बेताब थी। प्रधानमंत्री का नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोईराला ने प्रचलित मान्यता और प्रथा को तोड़ते हुए न केवल एयरपोर्ट पहुंचकर स्वयं स्वागत किया बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां गए वहां पर उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। उन्होंने नेपाल की संविधान सभा को भी संबोधित करने का मौका मिला। जर्मनी के बाद ऐसा करने वाले वह दूसरे विदेशी शासनाध्यक्ष बन गए। इस अवसर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने नेपाल के साथ भारत के रिश्ते को लेकर न केवल भूतकाल और वर्तमान की बात की बल्कि यह भी कहा कि दोनों देश के बीच रिश्ते ऐसे हैं कि एक दूसरे के बिना वह पूरे नहीं होते हैं। उन्होंने नेपाल की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह एक अच्छा कदम है कि कुछ दल शस्त्र छोड़कर शास्त्र की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने नेपाल की ओर से बनाए जा रहे नए संविधान को आने वाले कल के लिए एक प्रेरक और ऐतिहासिक कदम करार देते हुए कहा कि दुनिया इससे सीख लेगी। उन्होंने नेपाल आने को अपने लिए एक अप्रीतम मौका कहते हुए हर नेपाली जनता के दिल में जगह बनाने का प्रयास किया। इसमें वह सफल भी रहे। मोदी ने कहा कि उन्होंने सोमनाथ की धरती पर जन्म लिया। राष्ट्रीय राजनीति में काशी से प्रवेश किया और आज वह पशुपतिनाथ जी के चरणों में आए हैं। उन्होंने दिलों को जोड़ने वाले एक अन्य वाक्य में कहा कि वह नेपाल की उस बहादुर जनता को सलाम करते हैं जिसने भारत की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया है। उन्होंने नेपाल को 10 हजार करोड़ नेपाली रुपये की क्रेडिट लाइन देने का भी ऐलान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में हाईवे बनाने में सहयोग देने से लेकर उन्हें सूचना तकनीक क्षेत्र में सहयोग करने के साथ ही बिजली उत्पादन क्षमता को दोगुना करने में सहयोग का इरादा भी संविधान सभा संबोधन में किया। उनके उदबोधन का न केवल सत्ता पक्ष बल्कि अन्य सभी दलों के सदस्यों ने भी मेज थपथपाकर स्वागत किया। यह पहली बार था जब नेपाल के सभी दल एकमत से किसी भारतीय नेता के उदबोधन पर सहमत दिखे।   यह एकरूपता उनकी नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कुमार कोईराला, यूसीपीएन एम नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड, सीपीएन यूएमएल चेयरमेन केपी ओली, नेपाली कांग्रेस नेता शेर बहादुर देउबा, आरपीपी एन के चेयरमेन कमल थापा और मधेसी नेताओं से मुलाकात में भी दिखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी इस यात्रा को एक पक्ष की जगह समग्र नेपाल से जोड़ने का प्रयास किया। यही वजह है कि उन्होंने संविधान सभा के संबोधन के समय एक प्रचलित कहावत जिसमें कहा जाता है कि पहाड़ का पानी और जवानी किसी के अपने काम नहीं आती है का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और नेपाल को अब इस मान्यता को बदलना होगा। दोनों को मिलकर कार्य करना होगा। उन्होंने पहाड़ शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि वह जानते हैं कि नेपाल में भी भारत के उत्तराखंड की तरह पहाड़ और मैदान के लोगों के बीच खींचतान की राजनीति है। उन्होंने अपनी यात्रा को सभी वर्ग से जोड़ने का एक और सफल प्रयास किया। उन्होंने अपने उदबोधन में समग्र नेपाल की बात की। जब किसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने संबोधन में एक बार भी मधेसी शब्द या वर्ग का उल्लेख नहीं किया। जबकि वह लोग भारत के अधिक करीब है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके जवाब में कहा कि भारत संपूर्ण नेपाल को एक राष्ट्र की तरह देखता ही नहीं है बल्कि उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रति कृतसंकल्पित भी है। ऐसे में वह ऐसा कोई शब्द अपने शब्दकोष में शामिल ही नहीं कर सकता है जो वर्गों को अलग करने वाला हो। उन्होंने कहा कि एक वर्ग के बिना दूसरा अधूरा है। इससे उन्होंने एक साथ पहाड़ और मैदान दोनों वर्गो को जीतने में सफलता हासिल की। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री के सम्मान में न केवल नेपाली प्रधानमंत्री बल्कि राष्ट्रपति रामबरन यादव ने भी भोज रखा। उन्होंने इन दोनों अवसरों को भी सदुपयोग किया। उन्होंने इन भोज के दौरान वहां के नेताओं की शंकाओं का व्यक्तिगत जवाब देकर यह साबित करने का प्रयास किया कि भारत का शीर्ष स्तर तक नेपाल की चिंताओं को लेकर सदैव उपलब्ध है। जब प्रधानमंत्री नेपाल पहुंचे तो उन्होंने अपने काफिला के रास्ते से ही लोगों के दिल में जगह बनानी शुरू कर दी। वह अपने काफिला में कई जगह रुके और लोगों से मिले। यह आत्मीय मिलन ही दोनों देशों की शक्ति है इसे उन्होंने प्रधानमंत्री सुशील कोईराला के भोज के दौरान वहां के प्रतिनिधियों के बीच प्रमुखता से रखा भी। नेपाल को प्रधानमंत्री यह संदेश देने में पूरी तरह सफल रहे कि वह पड़ोसी मुल्कों और विशेषकर नेपाल के साथ रिश्तों को लेकर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इसका प्रमाण उन्होंने अपनी यात्रा से पहले ही उस समय दे दिया था जब उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नेपाल सहित सभी दक्षेस देशों के प्रमुखों को आमंत्रित करने के अलावा 23 साल से लंबित भारत—नेपाल ज्वाइंट कमीशन की बैठक को हरी झंडी दी। इसके लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज स्वयं नेपाल गईं। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के शुरुआती संकेत भी थे। दोनों देश के बीच रिश्ते अपने चरम पर जाए इसके लिए नरेंद्र मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान सभी संभव प्रयास किए। उन्होंने न केवल सत्तारूढ़ दल बल्कि वहां के सभी प्रमुख पार्टियों से मुलाकात की। इसमें वामपंथी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड भी शामिल थे। नेपाल के वाम दलों को चीन के नजदीक माना जाता रहा है। ऐसे में वाम दलों के नेताओं से उनकी मुलाकात अहम है। भारत अपने इस पड़ोसी मुल्क के साथ करीब 1751 किमी लंबी सीमा साझा करता है। ऐसे में उसके लिए यह जरूरी है कि वह वाम दलों को विश्वास में ले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसमें पूरी सफलता भी पाई।   उनकी यात्रा किस कदर सफल रही इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी यात्रा के दौरान कई ऐतिहासिक समझौते हुए। यह आपसी करार दोनों मुल्कों को और नजदीक लाएंगे। इनमें सबसे अहम है 5600 मेगावॉट की पंचेश्वर पनबिजली परियोजना। नेपाल की क्षमता 83000 मेगावॉट बिजली पैदा करने की है। भारत इसका लाभ लेना चाहता है। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी ने कहा कि दोनों देश इस क्षेत्र में एक दूसरे का अंधेरा दूर कर सकते हैं। इस परियोजना पर करीब 30 हजार करोड़ रुपये का अनुमानित खर्च आएगा। यह प्रोजेक्ट एक साल में शुरू करने के साथ ही इसके लिए तेजी से कार्य करने को लेकर एक प्राधिकरण बनाने पर भी सहमति बनी। इसके साथ ही भारतीय कंपनी जीएमआर भी यहां पर 900 मेगावॉट का प्लांट लगाना चाहती है। इस दिशा में भी तेजी से बढ़ने को लेकर दोनों देश के बीच सहमति बनी। इस योजना से भारत को 88 प्रतिशत बिजली मिलेगी। जबकि नेपाल को 12 प्रतिशत बिजली मुफ्त मिलेगी। भारत ने नेपाल को जनकपुर, बारा क्षेत्रा और लुंबिनी के विकास और लुंबिनी को बुद्धा सर्किट से जोड़ने पर भी सहमति बनी। भारत ने नेपाल के सभी दलों की भावनाओं को देखते हुए वर्ष 1950 की संधि में सुधार को लेकर भी सहयोग का आश्वासन दिया। इससे खासकर वाम दलों के निक्ट पहुंचने में भारत को मदद मिली। इसके तहत कई पदार्थों के कारोबार पर अलग असर पड़ता है।    दोनों देश सीमा कार्य समूह या बाउंडरी वर्किंग ग्रुप बनाने पर भी सहमत हुए। यह सीमा पर पिलर और अन्य चिह्न आदि से जुड़े मामलों को देखेगा और उनका हल निकालेगा। दोनों देश ने विदेश सचिव स्तर पर कालापानी और सुस्ता सहित अन्य सीमा मामलों को सुलझाने के लिए ज्वाइंट कमीशन के निर्देश को भी दोनों देशों ने सराहा और उसके अनुरूप कार्य करने पर सहमति दिखाई। भारत ने सीमा मानच़ित्र को जल्द पूरा करने पर जोर दिया। इस पर नेपाल ने सकारात्म्क संदेश दिया। दोनों देशों ने द्विपक्षीय रिश्तों को आगे ले जाने के लिए एक ऐसे गैर सरकारी प्रबुद्ध और नामचीन लोगों तंत्र की भी वकालत की जो द्विपक्षीय रिश्तों को आगे ले जाने में सहायक हो। यात्रा के दौरान एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु पर सहमति बनी। दोनों देश प्रत्यापर्ण संधि को अंतिम रूप देने पर सहमत हुए। इसके लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश भी दिए गए। भारत ने नेपाल के साथ पुलिस अकादमी को लेकर भी आपसी समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत भारत अपने इस पड़ोसी देश को पुलिस आधुनिकीकरण और उच्च क्षमता ट्रेनिंग में मदद देगा। भारत ने इस अवसर पर तराई क्षेत्र में सड़कों के निर्माण के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही भारत—नेपाल के बीच पहले से घोषित पांच रेलवे लाइन पर भी जल्द कार्य शुरू करने पर सहमति दिखाई। भारत ने पर्यटन के क्षेत्र में भी नेपाल को हरसंभव सहयोग का वादा किया। भारत ने नेपाल की ओर से छह अन्य सड़कों के निर्माण मे भी सहयोग पर भी सकारात्म्क रवैया अपनाने का भरोसा दिया। दोनों देश के बीच पोस्टल रोड बनाने के अलावा तराई रोड प्रोजेक्ट दो शुरू करने पर भी सहमति बनी। भारत ने नेपाल तक पेट्रोलियम पदार्थों की तेज और बाधा रहित पहुंच के लिए रक्सौल—अमलेखगंज पाइपलाइन प्रोजेक्ट को शुरू करने पर सहमति जताते हुए इसे अगले चरण में काठमांडू तक ले जाने को लेकर भी प्रतिबद्धता दिखाई। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबंधित अधिकारियों को रेलवे, सड़क के साथ ही कारोबार, आवागमन समझौतों पर तेजी से आपसी समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के निर्देश दिए। भारत ने नेपाल की ओर से जनकपुर, भैरहवा और नेपालगंज के बीच तीन अतिरिक्त वायु प्रवेश मार्ग उपलब्ध कराने, पोखरा—भैरहवा—लखनऊ के बीच सीधी उड़ान सेवा शुरू करने के अनुरोध पर भी तेजी से कार्य करने का भरोसा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबंधित अधिकारियों को इस पर अगले छह महीने में समुचित कदम उठाने के निर्देश दिए। दोनों देश ने सीमा पार बिजली लाइनों के विस्तार के लिए भी कर्य करने पर सहमति दर्शाई। भारत ने नेपाल के अनुरोध पर उसे सिंचाई और जल संसाधन के अन्य क्षेत्रों में मदद का वादा किया। कुल मिलाकर इतने अनुबंध, करार और आपसी समझौता से भारत ने यह साफ कर दिया कि वह नेपाल के साथ रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जाना चाहता है। यह यात्रा किस कदर सफल रही इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीनी मीडिया ने भी इसे सफलता से आगे की यात्रा करार दिया है। हालांकि अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार भी चीन का नाम नहीं लिया लेकिन कूटनीतिक क्षेत्रों में माना जा रहा है कि जिन क्षेत्रों में और जिस तरह के करार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली अधिकारिक नेपाल यात्रा के दौरान हुए हैं वह यह साबित करने वाले हैं कि भारत ने इस चरण में नेपाल में उपस्थिति दर्ज कराने के मामले में उससे आगे निकलने में सफलता हासिल कर ली है। नेपाल भारत रिश्तों को लेकर कहा जाता है कि यह रोटी—बेटी वाला रिश्ता है। इसकी वजह यह है कि भारत का नेपाल के साथ पड़ोसी का रिश्ता तो है ही, यह धार्मिक, सांस्कृतिक रूप से भी जुड़े हुए हैं। दोनों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते किस कदर मजबूत है इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि दोनों देश के बीच 60 साप्ताहिक उड़ान है। दोनों देश के बीच करीब 25 ऐसे मंच या स्तर है जिससे दोनों देश के बीच द्विपक्षीय बातचीत होती है। भारत का करीब 4.7 बिलियन का नेपाल में निवेश है। नेपाल में भारत का करीब 47 प्रतिशत एफडीआई है। भारत में करीब छह मिलियन नेपाली वर्कर हैं। भारत करीब 450 विकासपरक प्रोजेक्ट में नेपाल में शामिल है। नेपाल के पर्यटन में करीब 20 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत की है। वहीं, वहां के पर्यटन में शामिल होने वाले करीब 40 प्रतिशत लोग वाया भारत वहां जाते हैं। भारत करीब तीन हजार नेपाली छात्रों को छ़ात्रवृति देता है। इसमें इजाफा को लेकर भी दोनों देश के बीच बातचीत हुई है।

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मथुरा। संजय पब्लिक स्कूुल चैमुहाॅ में रक्षा-बन्ध्न के उपलक्ष्य में राखी व ग्रीटिंग कार्ड बनाओ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें विद्यालय के समस्त छात्रा-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। कक्षा प्रथम से चतुर्थ तक के छात्रा-छात्राओं के बीच ग्रीटिंग कार्ड बनाओ प्रतियोगिता सम्पन्न हुई। जिसमें बच्चों ने सुन्दर-सुन्दर कलाओं को प्रस्तुत किया। कक्षा द्वितीय के छात्रा इस प्रतियोगिता में विजयी रहे। इसमें करन सिंह, आकाश सिंह व तरुण राजपूत ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसके उपरान्त राखी बनाओ प्रतियोगिता,आयोजित की गई जिसमें कक्षा पाँच से सात तक के छात्रा-छात्राओं ने भाग लिया। इस प्रतियोगता के माध्यम से भी बच्चों ने अपनी कला को निखारने का प्रयास किया। इस प्रतियोगिता में चन्द्रकान्ता ने प्रथम स्थान, विशाल राजपूत ने द्वितीय स्थान व निशांत ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। बच्चों की ओर से बनी राखियों में से कुछ राखियाँ सीमा पर देश की रक्षा कर रहे जवानों के लिए भिजवाई गई और उनकी लम्बी उम्र की कामना की। इस प्रतियोगिता के चलते बच्चों में रक्षाबन्ध्न के पर्व को लेकर अत्यन्त उत्साह दिखाई दिया। विद्यालय के प्रधनाचार्य एस0के0वैष्णव ने रक्षाबंध्न के अहम महत्व को समझाया तथा राखी से संबन्ध्ति ऐतिहासिक जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन सुचारु रुप से किया गया जिसमें सभी अध्यापक-अध्यापिकाओं व छात्रों  का पूर्ण सहयोग रहा। कार्यक्रम में मुख्य संयोजक, चित्राकार किंग, श्रीकृष्ण कुन्तल,  जगराम रहे। इस अवसर पर एम0पी0गौतम, संतोष गौतम तथा अध्यापक एवं अध्यापिका श्रीमती गायत्राी वैष्णव, मयंक भारद्वाज, बिमल कुमार, गोबिन्द ब्रज मोहन, अनुराध शर्मा, शक्ति दीक्षित, नीता सक्सेना, रमा शर्मा आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शालिनी शर्मा, सुश्री संतोषी शर्मा उमाशंकर, द्वीप्ति सिंह ने किया। 

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मथुरा। जसवन्त सिंह भदौरिया पब्लिक स्कूल, कोसी खुर्द, भरतपुर रोड़, मथुरा मे ंभाई-बहिन के पवित्रा रिश्ते का प्रतीक राखी बाँध्ने का राखी-त्यौहार मनाया गया। विद्यालय की छात्राओं द्वारा भाईयों की कलाईयों पर रक्षासूत्रा बाँध्े गये। भाईयों ने भी बहिनों की रक्षा हेतु संकल्प लिया और वचन दिया। इस अवसर पर राखी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमे मनमोहक राखियाँ बना-बनाकर छात्राओं ने प्रस्तुति की। जिसमें कक्षा-5 से लेकर कक्षा-10 तक की छात्राओं ने प्रतिभाग किया और कक्षा-9 छात्रा प्रीति सिंह तरकर ने प्रथम स्थान, कक्षा-9 की छात्राओं प्रतिभा सिंह व रबीना कुन्तल ने संयुक्त रूप से द्वितीय स्थान तथा कृष्णा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रतियोगिता के संचालन हेतु राखी छौंकर व मन्जूलिका पाल ने छात्राओं को आर्कषक राखियाँ बनाने के लिए प्ररित किया।

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मथुरा। रोमैक्स इंटरनेशनल स्कूल मथुरा के विद्यार्थियों ने एक दूसरे को राखी बाॅंध् कर रक्षाबंध्न का त्यौहार मनाया। इस अवसर पर विद्यार्थियांे ने स्वयं राखीयाॅं बनाकर एक दूसरे की कलाई पर बाॅंध्ी एवं रक्षाबंध्न की बधई दी। नन्हे मुन्हे बच्चों द्वारा दी गयी विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने सभी का मन मोह लिया। इस अवसर पर विद्यालय प्रधनाचार्या श्रीमति शालिनी भट्ट ने रक्षाबंध्न के महत्व को बताते हुए अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर नैन्सी अरोड़ा, सुची गौतम, प्रीती बागड़ी, डौली शर्मा, गोयल, पदमा गोस्वामी, डौली शर्मा, रेखा शर्मा, श्रीमति ममता धर, विनय सोलंकी, प्रतिभा, मनोरमा अग्रवाल, सीमा, शिखा सारस्वत, आई0 एम0 डेविड, मुकेश चैध्री, कुलदीप वर्मा, सौरभ सक्सैना, आदि उपस्थित थे।

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मथुरा। माथुर चतुर्वेद समाज की गुरू गद्दी श्रीजी पीठ के तत्वावधन में विश्राम घाट पर श्रावणी पर्व मनाया गया। जिसमें प्रमुख रूप से श्रीजी पीठाध्ीश्वर 108 श्रीठाकुरजी बाबा महाराज ने शिष्य समुदाय सहित श्रावणी उपाकर्म मनाया। इस मौके पर श्रीजी पीठाचार्य पं0 मनीष बाबा व आचार्य पंडित दामोदर के सानिध्य में पहले शरीर की पंचगव्य के द्वारा शुद्वि की। इसके बाद बहिरंग शुद्वि के लिए हवन पूजन व दशविध् स्नान कर सप्त)षि पूजन सहित मां अरून्ध्ति का पूजन किया। पितृ पूजन व ध्र्मराज के लिए तर्पण किए गए। इस कार्यक्रम में उपस्थित सुनसुन सरदार हीरे सरदार पंण् कपिल बाबा पं0 लल्लूए नरेश दत्ता दिनेशदत्त पं0 आलोक बैंकट पं0 श्यामु पं. रामू कमली सीपू दाऊदयाल गणेश बिहारीलाल पप्पू सोनू गोपेश्वर नाथ पाला किशोर चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे। .

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मथुरा। थाना व गांव सुरीर में दो दोस्त शराब पीकर आपस में भिड़ गए और एक युवक ने दूसरे युवक को चाकू से गंभीर रूप से घायल कर दिया। जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद आरोपी मौके से भाग निकला। परिजनों ने आरोपी के खिलापफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई है।  प्राप्त जानकारी के अनुसार सुरीर निवासी रामकिशन पुत्रा घनश्याम की पड़ौस के ही चरणसिंह से मित्राता थी दोनों ने आज दिन में शराब का सेवन किया और किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई। इससे बौखलाए चरण सिंह ने चाकू से रामकिशन पर हमला कर दिया। जिससे घायल हुए 40 वर्षीय रामकिशन की मौके पर ही मौत हो गई। सूचना पाकर मौके पर पहुंची कोतवाली सुरीर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मृतक के परिजनों की तहरीर पर आरोपी चरण सिंह के खिलापफ नामजद मुकद्मा दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। 

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मथुरा। सावन-भादौं मेला के दृष्टिगत जनपद में श्र(ालुओं का आवागमन बढ़ा है। वहीं अध्कितर मुख्य मार्गो पर नीम हकीम व दवाओं के नाम पर गुमराह करने वाला गिरोह सक्रिय हो गया है। वृंदावन मुख्य मार्ग हो या शहर की सड़के, जहां एकांत मिला बस वहीं डाल लिया तम्बू। आकर्षक नामों से आकर्षित करने वाले बैनर खानदानी दवा खाना, हिमायलयन जड़ी आदि छद्दम नामों से सजी से दुकाने बृजवासियों के साथ यहां आने वाले श्र(ालुओं को भी गुमराह कर रही है। यहां हर बीमारी के इलाज का दावा करने वाले लोग जेब काटने में पीछे नहीं है। पुरानी से पुरानी बीमारी को जड़ी बूटियों के सहारे ठीक कराने के लालच में गरीब से लेकर अमीर तबके तक का व्यक्ति यहां एकांत क्षेत्रों में सजी इन दुकानों पर पहुंच रहा है। ज्यादातर लोग बांझपन व कामोत्तेजक दवाओं के लिए इन से सम्पर्क साध् रहे है। इसी तरह का एक नजारा कल औरंगाबाद रोड स्थित एक दवा खाने पर देखने को मिला। यहां एक इसी तरह के दवाखाने पर शहर के एक सज्जन अपनी चैपहिया गाड़ी खड़ीकर इलाज कराने वाले व्यक्ति से उलझते देखे गये। बताते है कि कामोत्तेजकजदी लेने के बाद ये सज्जन और भी बेकार हो गये अब मुंह छुपाते घूम रहे है। वहीं जब उनसे नाम जानने का प्रयास किया तो वे भागते नजर आये। इस तरह की बातों से सापफ स्पष्ट है कि इनके द्वारा दी जा रही ये जड़ी-बूटी या तो बिना किसी जानकारी में दी जा रही है या कुछ उल्टे प्रभाव सामने आ रहे है। शहर में इस तरह की जड़ी बूटियों की दुकान ज्यादातर मुख्य मार्गो पर देखी जा रही है। वहीं ये इलाज पुलिसकर्मियों के लिए मुनापफा का सौदा भी साबित हो रहे है। सूत्रा बताते है कि इनसे प्रतिदिन के रिसाब से कुछ तेजतर्रार सिपाही वसूली भी कर रहे है। साथ ही क्षेत्रा में दुकान चलाने की मना करते देखे जाते है। इस ओर स्वास्थ्य विभाग का भी ध्यान नहीं है। 

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