सविता पांडे
नंदगांव के हुरिहारे बरसाना की गोपिकाओं के साथ होली खेलने के लिए सजने लगे हैं। अपनी ढालों को सजाने लगे हैं। गोपिकाओं की लाठियों के प्रहार को सहने के लिए चिलम पीते हैंए भांग पीते हैं और हुक्के गुड़गुड़ाते हैं। ढोल.मंजीरों की ताल पर होली रसिया गाते बरसाना पहुंचते हैं।
गोपियां लहंगा. परिया पहने हुई हैं। आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनकी आंखों में काजलए हाथों में मेहंदी और पैरों में महावर सज रहे हैं। रंग. अबीर.गुलाल बरस रहे हैं। इनसे सराबोर हुरिहारों और गोपिकाओं के बीच हंसी.मजाक चलता है। यह ठिठोली होली है।
इस ठिठोली और होली के बाद लंबे.लंबे घूंघटों की आड़ से गोपिकाएं नंदगांव के हुरिहारों पर लाठियों से प्रहार करती हैं। यह लठमार होली है। इसमें लाठियों से भी रस रंग बरसता है। बरसारना में होली ऐसे ही रस बरसाती है। बरसाना की होली हमारी प्राचीन सभ्यता.संस्कृति और परंपरा का अप्रतिम उदहारण है। होली शास्न्निय है। कहीं रघुबिरा अवध में होली खेलते हैए तो कहीं कृष्ण गोपियों संग बरजोरी करते दिखते हैं।
होली हमारी अदिम पहचान है। होली रंग है। होली रस है। होली ठिठोली है। होली रंग जाने और रंग देने का भाव है। होली जीवन का अथाह उल्लास है। नाचना.गाना हुड़दंग करना है। होली सबका त्योहार है। सभी के लिए रम जाने का उत्सव। होली का खुमार बसंत.पंचमी के खत्म होते ही छाने लगता है। ढोल.मजीरे.घंटे.घड़ियालों के साथ होली.फाग.कबिरा.जोगीड़ा गाना आरंभ हो जाता है। इस तरह होली की मस्ती कई दिन पहले ही चढ़ जाती है और कई दिन बाद तक जारी रहती है। गुलाल की झोली और रंग की पिचकारी होली बनकर मन को हराकर जाते हैं। होली हमारा नववर्ष भी है। होलिका दहन के साथ ही पुराना वर्ष भस्मीभूत हो जाता है। नए वर्ष के साथ ही हम भी नए हो उठते हैंण्ण्ण् नई हवाए नई फसलए नई बारिशए नए.नए फूल.पौधों के साथ ही हमारा मन भी नया होने लगता है। रंगीन हो उठता है। आम की तरह बौरा जाता है। भौंरों की तरह गुनगुनाने लगता है। एक अद्भुत रस.रंग में डूब जाना चाहता है। यही रंगीनीए यही बौराहट होली है।
होली के भाव को निराला की इस कविता से समझा जा सकता हैरू
श्नयनों के डोरे लाल गुलाल भरेए
खेलि होली जागी रात सेज प्रिय पति संग
रति सनेह रंग होली
बीती रात सुखद बातों में प्राप्त पवन प्रिय डोली
उठी सभाल बालए मुख लट पट
दीप बुझा हंस बोली रही यह एक ठिठोली।श्
इस तरह होली स्त्री.पुरुष के मनोभावों में समाकर बिना रंग और गुलाल की रति सनेह रंग की होली बन जाती है। फागुन मास की पूर्णिमा तक मदन जवान रहता है और मन में हुलास बनकर घुमड़ता रहता है। यह मदन रस होली है।
त्योहारों में त्योहार है होली। शीत ऋतु के बाद बसंती हवा आलस्यता और ठहराव के साथ बहती है कि होली आ जाती है। सतरंगी रंग.अबीर.गुलाल हमारे रोम.रोम में समा मस्ती का गीत गाने लगते हैं। मनुष्य.मनुष्य की ओर मुखातिब होता है और सारे बाहरी आवरणों को दूर फेंक ऊंच.नीचए जाति.पातिए अमीर.गरीबए समाज.धर्म सबको भूलकर कहता है . श्आओ हम रंग जाएं। एक.दूजे को रंग डालें। यह प्रेम रंग कभी न छूटे। हमें निर्मल कर जाए।श् और एक आदिम गंध होली के रंगों में घुलमिल जाती है। आदमी आदमी. हो जाता है। चहरे पर पुते रंग उसकी व्यक्तिगत पहचान भूला देते हैं। रंगों में सराबोर इंसान असामाजिक हो जाता है। सारी औपचारिकताओं को पार कर जाता हैण्ण्ण् ष्होलीष् हो जाता है।
देशभर में अपने विभिन्न रूपों में होने के बावजूद होली एक है। होली का भाव एक है। टेसूए केसरए गेंदाए गुलाब एक है। लेकिन आज की तेज रफ्तार जिंदगी ने हमसे जाने क्या चुरा लिया है कि होली का सारा उत्साह कम होता जा रहा है। मठरीए गलियोंए दही.बड़ोंए पुओं का स्वाद जाने कहां बिलाता जा रहा है। फागए जोगीड़ाए कबिरा रागिनी के बोल किसे याद होंगे आजघ् उनकी जगह शोर मचाते कैसेटों के फूहड़ संगीत ने ली है। यह आज की डिमांड है।
आज होली ष्होली मिलनष् हो गई है। होली के रंग इतने पक्के हो गए हैं कि त्वचा छिल जाए आपका साथ नहीं छोड़ते। हम इतने छुई.मुई हो गए हैं कि रंगों से खुद को बचाने के लिए हाय. तौबा मचा देते हैं। हमारे कपड़े इतने कीमती और धुले हैं कि रंगों की बौछार सह ही नहीं पाते हैं।
यह कामरस तो जाने कब अश्लील बन गया। नंगा और बाजारू हो गया। अब होली वसन्तोत्सव या मदनोत्सव नहीं रह गई है। हमारे मन में उमंग जगाने वाला मदन रस अब नहीं बरसता। होली औपचारिकता हैण्ण्ण् छुट्टी का एक दिन। पार्टी का दिन। डीजे की धुनों पर नाचने और नचाने का दिन। पीने.पिलाने का रिद्मिक डे। राम के हाथ की कनक पिचकारी प्लास्टिक के खिलौनों में तब्दील हो गई है। लक्ष्मण के हाथ का अबीरा रासायनिक और घातक पदार्थों का चूरा बन गया है। कृष्ण गोपियों संग प्रेम भरी बरजोरी नहीं करते। सीधे चीर.हरण पर उतारू हो जाते हैं। होली को लेकर पद्माकर के सवैये मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं। एक सवैये में होली के उल्लास का चित्रण करते हुए पद्माकर कहते हैरू
श्फाग की भीर अभीरन ते गहि गोविदै लै गई भीतर गोरी
भाई करी पद्माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी
छीनि पीताम्बर कम्बर तें सुविदा दई मीड़ि कपोलनि रोरी।
नैन नचाय कह्यो मुसकाई लला फिर आइयो खेलन होरी।श्
भाव की गहनता से रंग जाने का यह दुर्लभ चित्रण मानवीय संदर्भ से भरा हुआ है और आज के समय में अप्रांसगिक जान पड़ता है। फिर भी होली होली है। अभिव्यति और मौज.मस्ती के तमाम साधनों के बदलने के बीच भी स्वाभाविकता की तरह कहीं न कहीं दिख ही जाती है। संगीत है। गीत है। नृत्य हैण्ण्ण् और होली है।
होली का दिन है। रंगों में सराबोर लिपे.पुते चेहरों वाले बच्चे कैसेटों की धुन पर नाच रहे हैं। उनके कुर्ते और मैले.कुचैले कपड़े तार.तार हो गए हैं। टिनों.डब्बों को पीटते गली.गली घूम रहे हैं। ये बच्चे होली की तरह मस्त और बिंदास हैं। पवित्र और निर्मल हैं।
उम्मीद हैए ये बच्चे इसी तरह होली की मस्ती और उल्लास बचा लेंगे। थोड़ी.थोड़ी होली अपने मनों मे समेट लेंगे। अबीर गुलाल की झोलियों और फटी जेबों में भर लेंगे होली। होली इसी तरह उनके गंदले बालों में रंग और नंगे पैरों में जोश भरती रहेगी। होली को बचाकर रखने वाले इन बच्चों की मुस्कुराहट में थोड़ी होली जरूर बची रहेगी। उम्मीदभरे ये बच्चे होली की हुड़दंग को अपनी मुट्ठियों और बंद पलकों में समेट लाएंगे। कैलेंडरों मे टांग देंगे। अगले बरस जब सोए होंगे होली चुपके.चुपके इनके कानों मे कूकेगी। ये बच्चे उठेंगे और होली बिखेर देंगे।
मन हर्षित सा रंग में डूबा हुल्लड़ मचाते इन बच्चों पर मोहित हो रहा है कि नन्ही बच्ची अपनी छोटी सी पिचकारी में भरा रंग डाल जाती है और तोतली आवाज में कहती है . श्बुरा न मानो होली हैश् यह होली बचाने का उसका नन्हा प्रयास है। हम दोनों हंस रहे हैं। उसकी हंसीए पिचकारी से झरता रंग और मेरी आंखों से झरती नमी होली है।
;ैंउपोीं ठींतजप छमूे ैमतअपबमद्ध
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