मनोरंजन

पीएन ओक ने अपनी पुस्तक 'ताज महल : द ट्रू स्टोरी' में दावा किया था कि यह स्मारक दरअसल एक प्राचीन शिव मंदिर 'तेजो महालय' है। इतिहासकारों ने अब तक इसे खारिज ही किया है। अदालतों ने भी इसे प्रमाणित इतिहास के विपरीत बताया। लेकिन, इसी विवाद को संभवतः पहली बार सिनेमाई पर्दे पर रचा गया है।

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कभी एक 'चाणक्य' ने एक 'चंद्रगुप्त' को बनाया था। क्या हो जब आज के दिन कोई शिक्षक उन्हीं पदचिह्नों पर चलते हुए ढेर सारे 'चंद्रगुप्त' बना दे! और, क्या होगा जब ये सभी 'चंद्रगुप्त' एक साथ मिलकर पूरे तंत्र को अपने हिसाब से चलाने में सक्षम बन जाएं। और, इसके बाद, यदि इनमें से एक 'चंद्रगुप्त' विद्रोह कर अपने ही 'चाणक्य' के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो...! यह पूरा ताना-बाना बुना गया है प्रकाश झा की नई वेब सीरीज 'संकल्प' में...।

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क्या कोई ऐसा मानक है कि फलां फिल्म ओटीटी पर रिलीज होगी और फलां सिनेमाघरों में!? यदि नहीं तो 'सूबेदार' को ओटीटी पर रिलीज करना एक 'भूल' ही कहा जाएगा। अनिल कपूर फिल्म के निर्माताओं में से एक हैं और पूरी फिल्म को अपने कंधों पर रखकर चलते हैं। फिर उन्होंने इसे सिनेमाघरों में रिलीज करने का 'जोखिम' क्यों नहीं उठाया! यह जोखिम ले लेते तो दर्शक शायद उन्हें निराश नहीं करते। उन्हें देखकर 'तेजाब' वाला 'मुन्ना' याद आ जाता है...

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भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ यौन हिंसा रिपोर्ट की जाती है। इसी भयावह आंकड़े को याद दिलाने के लिए फिल्म ‘अस्सी’  में हर 20 मिनट बाद लाल स्क्रीन पर ‘20 मिनट’ लिखा आता है, मानो दर्शकों को झकझोर कर यह बताने के लिए कि वे जिस कहानी को देख रहे हैं, उसका आधार यह वास्तविकता है। शायद, यही शीर्षक फिल्म के लिए अधिक सार्थक भी होता...

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​'दो दीवाने सहर में' हां, बिल्कुल सही लिखा है। शब्द 'सहर' है, 'शहर' नहीं। सहर का अर्थ उर्दू में 'सुबह' होता है। हालांकि, इस 'सुबह' से फिल्म का कोई लेना-देना नहीं है। अब, चूंकि फिल्म का हीरो 'श' को 'स' बोलता है, तो फिल्म के टाइटल में भी 'स' है। वैसे फिल्म की हीरोइन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका हीरो 'श' को 'स' बोले या 'फ'। फिल्म के अंत तक वह अपने रिश्ते को लेकर 'फ्योर', मतलब 'स्योर', नहीं हो पाती है। निर्देशक रवि उदयवार की कारकिर्दगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही लगती है।

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बॉलीवुड की ‘आत्मा’ हिंदी फिल्मों में वापस लौट रही है, और ऐसा लगता है कि पिछले कम से कम दो दशकों से हिंदी के दर्शक जिस चीज को बेइंतहा 'मिस' कर रहे थे, उसे अब वापस परोसा जाने लगा है। बात चाहे संगीत की हो, धुआंधार एक्शन की हो या फिर वास्तविक दुनिया से दूर, कहीं बहुत ऊंचाई पर खड़े, अविश्वसनीय खलनायकों की। पिछली कई फिल्मों के बाद, 'ओ रोमियो' भी इसे साबित करती है...

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