मनोरंजन

हिंदी फिल्मों के कुछ गीत ऐसे हैं, जिन्हें सुनते हुए आंखों के सामने पहाड़ों की हरियाली, झरनों का संगीत और प्रेम में डूबे दो दिलों की तस्वीर उभरने लगती है। साल 1981 में रिलीज हुई फिल्म ‘प्यासा सावन’ का गीत ‘इन हसीं वादियों से दो चार नजारे...’ ऐसा ही एक गीत है। इसमें प्रकृति की सुंदरता को केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि प्रेम के अनुभव का हिस्सा बनाया गया है। विशाल आकाश से कुछ सितारे चुरा लेने और खूबसूरत वादियों से कुछ नजारे अपने साथ ले जाने की कल्पना गीत को एक सहज रोमांटिक रंग देती है...

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भारतीय सिनेमा में कुछ रचनाएं इस तरह प्रयोग में लाई जाती हैं कि इनके पर्दे पर आते ही किसी दृश्य का प्रभाव पूरी तरह बदल जाता है। 'हनुमान चालीसा' भी उनमें से एक है। इस रचना का हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल कभी भय और संकट के बीच आस्था जगाने के लिए हुआ, तो कभी किसी पात्र की भीतरी शक्ति को जाग्रत होते दिखाने के लिए...। कुछ फिल्मों में इसका पाठ कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना तो कहीं इसकी धुन ने सामान्य से दिखने वाले दृश्य को भी यादगार बना दिया...

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ब्रजभूमि और वृंदावन से गहरा जुड़ाव रखने वाले रहस्यमयी संत देवराहा बाबा की जिंदगी अब बड़े पर्दे पर आ रही है। नीब करौरी बाबा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सफलता के बाद देवराहा बाबा के जीवन और उनसे जुड़े रहस्यमयी प्रसंगों पर फिल्म ‘मचान बाबा’ का निर्माण शुरू किया गया है। हाल ही में, फिल्म के निर्माताओं ने फिल्म का टाइटल पोस्टर जारी किया है और इसे 2027 में रिलीज करने की योजना है।

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कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके जरिये प्रेम में डूबे किसी युवा को अपने दिल की आवाज सुनाई देती है तो उम्र के अनुभवों से गुजर चुके व्यक्ति को उनमें अपने बीते दिनों की कसक महसूस होती है। साल 1981 में आई फिल्म ‘कुदरत’ का गीत ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ इसी श्रेणी का गीत है। इसके शब्दों में प्रेम की गहराई है, धुन में एक अनकही बेचैनी और गायकी में ऐसा भावनात्मक ठहराव है, जो सुनने वाले को 'स्वयं' से जोड़ देता है...

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यदि नाना पाटेकर को सही में समझना हो तो शायद उनके पुरस्कारों, फिल्मों और यादगार संवादों की सूची से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। उन्हें समझने का बेहतर रास्ता उनके जीवन को देखने से निकलता है। एक ऐसा जीवन जिसमें गरीबी, संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, प्रसिद्धि, सेना के साथ बिताए दिन, किसानों के लिए काम, कविता, हास्य, सादगी और विवाद, सब एक साथ दिखाई देते हैं। इन सबके बीच एक बात लगातार यह उभरती है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी एक तय खांचे में नहीं जिया। जब उन्हें लगा कि कुछ करना चाहिए, उन्होंने किया; कई बार वह काम उनकी सार्वजनिक छवि से बिल्कुल अलग था।

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कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते हैं बल्कि वे अपने समय की एक स्मृति बन जाते हैं। ‘पग घुंघरू बांध…’ ऐसा ही एक गीत है। साल 1982 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘नमक हलाल’ का यह लगभग बारह मिनट लंबा गीत जब सामने आया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि इसमें शामिल शास्त्रीय सरगम, डिस्को की थाप, क़व्वाली का रंग, संवादों की नाटकीयता और किशोर कुमार की खिलंदड़ी आवाज़ मिलकर आने वाले दशकों के लिए एक ऐसा गीत रच देंगे, जिसे आज भी लोग केवल एक पुराने फिल्मी गीत के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति के रूप में याद करते हैं...

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कुछ गीत ऐसे होते हैं, जो अपनी लोकप्रियता की सभी सीमाएं लांघकर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। वे केवल मनोरंजन का माध्यम ही नहीं रह जाते, बल्कि भावनाओं, यादों और रिश्तों की आवाज बन जाते हैं। वर्ष 1986 में प्रदर्शित और महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नाम’ का गीत ‘चिट्ठी आई है...’ भी ऐसा ही एक गीत है। पंकज उधास की दर्द में डूबी आवाज, आनंद बख्शी के सरल लेकिन हृदयस्पर्शी शब्द और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का भावपूर्ण संगीत इस गीत को इतनी ऊंचाई पर ले गए, जहां पहुंचना हर गीतकार, संगीतकार और गायक का सिर्फ सपना होता है...

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कुछ फिल्में अपनी कहानी, प्रस्तुति और तकनीकी खूबियों के कारण दर्शक को बांध लेती हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती हैं कि अगर इसके कुछ किरदारों के लिए कलाकारों का चुनाव अलग होता तो क्या यह फिल्म कहीं ज्यादा प्रभावशाली हो सकती थी? ‘मैं वापस आऊंगा’ ऐसी ही फिल्म है। इसमें एक मजबूत कहानी, शानदार संपादन और कई प्रभावशाली अभिनय क्षण मौजूद हैं, लेकिन इसकी कास्टिंग कई जगह फिल्म की संभावनाओं को सीमित करती दिखाई देती है...

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कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनते हुए लगता है जैसे समय ठहर गया हो। जैसे, किसी पुराने महल की दीवारों में सदियों से कैद कोई प्रेमकथा अचानक सांस लेने लगी हो। जैसे, किसी विरहिणी के दिल में दबे हुए आंसू सुर बनकर बाहर आ गए हों। और, जैसे, संगीत के सामने राजसत्ता, वैभव और दुनिया की तमाम चकाचौंध छोटी पड़ गई हो।

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गोपालस्वामी दोरईस्वामी नायडू का व्यवसायिक दर्शन भारतीय औद्योगिक इतिहास में एक अनोखी मिसाल है। अपने समय में उन्होंने यह साबित किया कि व्यापार केवल लाभ कमाने का साधन ही नहीं है, बल्कि समाज को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी है। उनके जीवन का मूल मंत्र तकनीकी नवाचार, व्यावहारिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी था...

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