मनोरंजन

बॉलीवुड की ‘आत्मा’ हिंदी फिल्मों में वापस लौट रही है, और ऐसा लगता है कि पिछले कम से कम दो दशकों से हिंदी के दर्शक जिस चीज को बेइंतहा 'मिस' कर रहे थे, उसे अब वापस परोसा जाने लगा है। बात चाहे संगीत की हो, धुआंधार एक्शन की हो या फिर वास्तविक दुनिया से दूर, कहीं बहुत ऊंचाई पर खड़े, अविश्वसनीय खलनायकों की। पिछली कई फिल्मों के बाद, 'ओ रोमियो' भी इसे साबित करती है...

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कभी 'खिलाड़ी', 'बाजीगर', 'सोल्जर', 'अजनबी' और 'हमराज' जैसी 'कल्ट' फिल्में देने वाले वाले अब्बास-मस्तान को 'किस किसको प्यार करूं' जैसी फिल्में बनाते देखने से दिल को बहुत दर्द होता है। इतना ही नहीं, दोबारा 'किस किसको प्यार करूं2' जैसी फिल्म बनाने की क्या मजबूरी रही होगी, समझ से बाहर है...

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नायिका के नायकत्व को उभारने के लिए हर बार डायलॉग मारने की जरूरत नहीं होती है। मौन का भी बड़ा महत्व होता है। ध्यान ही होगा कि पहले फिल्म 'धुरंधर' में और बाद में ‘छावा’ में अक्षय खन्ना का मौन क्या 'कहर' ढा देता है।

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पुणे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, यानी पिफ्फ, का 24वां आयोजन महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता गुरु दत्त को समर्पित होगा। 

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निर्देशक कमलेश के मिश्रा की नई फिल्म, 'काकोरी' साल 1925 के महान 'काकोरी रेल एक्शन' को समर्पित एक शताब्दी श्रद्धांजलि है। यह एक ऐसा साहसिक कार्य था जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गति और दिशा को बदल कर रख दिया था...

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हमारे गांव में जब पहली बार वीसीआर आया, तब हमें सिनेमा के ‘स’ का भी पता नहीं था। वीसीआर के ‘मालिक’ एक बड़े हॉल में टिकटें बेचकर, एक रंगीन टीवी पर फिल्में दिखाते थे। वह हमारे पिता के मित्र थे तो एक दिन उन्होंने हम सभी बच्चों को फिल्म दिखाने के लिए बुलवाया। हम सब, पूरा परिवार, फिल्म देखने गए। फिल्म थी, ‘जय संतोषी मां’ और मेरी उम्र तब तीन या चार साल रही होगी...

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