हमारे गांव में जब पहली बार वीसीआर आया, तब हमें सिनेमा के ‘स’ का भी पता नहीं था। वीसीआर के ‘मालिक’ एक बड़े हॉल में टिकटें बेचकर, एक रंगीन टीवी पर फिल्में दिखाते थे। वह हमारे पिता के मित्र थे तो एक दिन उन्होंने हम सभी बच्चों को फिल्म दिखाने के लिए बुलवाया। हम सब, पूरा परिवार, फिल्म देखने गए। फिल्म थी, ‘जय संतोषी मां’ और मेरी उम्र तब तीन या चार साल रही होगी...
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