कभी लोकतंत्र का सशक्त चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता, आज जनसंपर्क के शोरगुल, कॉर्पोरेट संदेशों की मिलावट और झूठी खबरों के दलदल में हांफ रही है। यह क्षरण उस स्थानीय पत्रकारिता में और भी गहरा है, जहां गांवों की अनकही पीड़ा, पर्यावरण की चीख और हाशिए पर धकेले गए समुदायों की आवाजें स्पष्ट और संवेदनशील रूप से गूंजनी चाहिए थीं।
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