साहित्य / मीडिया

एक "लाइक" के लिए कितने और बच्चे मरने चाहिए? यह सवाल दिल दहला देने वाला है। लेकिन, भारत को इसका सामना करना पड़ेगा। 

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रेडियो का अपना एक अनोखा आकर्षण रहा है। यह अंतरंग होते हुए भी व्यापक और सरल होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली हैं। यह बिना किसी आडंबर के हमारे दैनिक जीवन में सहज रूप से घुलमिल जाता है। यह बहुत कम अपेक्षा करता है, बस थोड़ा-सा साथ और बदले में जानकारी, संवेदना तथा अपनत्व का अहसास देता है...

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जब हम जेम्स ऑगस्टस हिक्की, उस जांबाज़ आयरिश शख़्स की भावना को याद करते हैं, जिसने 29 जनवरी 1780 को भारत का पहला अख़बार ‘हिक्कीज़ बंगाल गज़ट’ शुरू किया था, तो आज की पत्रकारिता को देखकर ‘कन्फ्यूजन’ होता है, खासतौर पर डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता देखकर।

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पीटर पैन 1902 में लिखे एक उपन्यास का नायक है। राहुल गांधी की छवि की तुलना अकसर 'पीटर पैन' से की जाती है, यानी, वह काल्पनिक लड़का जो बड़ा होने से लगातार इंकार करता है...

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भारतीय इतिहास में संत सुधारकों ने गहन और जटिल आध्यात्मिक ज्ञान को जनसाधारण की भाषा में अनुवादित कर जनसंचार का एक अनोखा माध्यम विकसित किया। यह प्रक्रिया न केवल ज्ञान को सुलभ बनाती थी, बल्कि उसे लोकप्रिय बनाकर समाज में गहराई से स्थापित करती थी...

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कभी अख़बार का संपादक एक संस्था हुआ करता था। उसकी एक पंक्ति से सत्ता की नींव हिल जाया करती थी। लेकिन, आज हालात इतने बदल गए हैं कि अगर पाठकों से पूछा जाए, तो उन्हें अपने पसंदीदा अख़बार के संपादक का नाम तक नहीं मालूम। पत्रकारिता के मूल्यों का सूरज ढल रहा है और उसकी जगह पर बाजारू दबावों का अंधेरा छा गया है। खबर अब महज़ एक उत्पाद है, जिसकी बिक्री और टीआरपी ही सब कुछ तय करती है...

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