साहित्य / मीडिया

हिंदी भाषा की बढ़ती लोकप्रियता और व्यापक स्वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही है, बल्कि अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। हिंदी को भारत की लोक भाषा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली भाषा बनाने में साहित्यकारों, हिंदी संस्थानों और भाषा प्रेमियों का योगदान बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन जनसंचार माध्यमों, विशेष रूप से बॉलीवुड और टेलीविजन चैनलों की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता...

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ऐसी दुनिया जहां स्वतंत्र पत्रकारिता निहित स्वार्थों से खतरे में है, हिंसक दमन और प्रौद्योगिकी के ‘बिग ब्रदरली’ चालों से घिरी हुई है, वहां इतिहास की गूंज एक बार फिर सुनाई दे रही है...

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कुछ रोज़ पहले, क्रिकेट खिलाड़ी अश्विन रवि चंद्रन ने चेन्नई में एक छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा न मानते हुए सिर्फ राष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा बताया। तमिल नाडु में भारतीय जनता पार्टी का भी यही मानना रहा है...

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पिछले हफ्ते, बीजापुर के एक युवा स्वतंत्र पत्रकार मुकेश चंद्राकर की चौंकाने वाली हत्या ने भ्रष्टाचार को उजागर और संघर्ष से प्रभावित, खासकर माओवादी क्षेत्रों में ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के सामने आने वाले गंभीर खतरों को एक बार फिर सामने रखा है...

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भारत जैसे खुले लोकतांत्रिक समाज में, मास मीडिया कई तरह की भूमिकाएं निभाता है। यह एक निगरानीकर्ता के रूप में कार्य करता है, सत्ता को जवाबदेह बनाता है, और सरकार और जनता के बीच एक पुल का काम करता है। 

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लंबे समय से शास्त्रीय पत्रकारिता के अध्येता कहते आ रहे हैं कि पत्रकारों को न तो किसी के पक्ष में बोलना चाहिए और न ही किसी के विरोध में। मतलब एक पत्रकार को ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। लेकिन, हाल के वर्षों में हमारे देश की मीडिया बेवजह की बहस में पड़कर विभिन्न मुद्दों पर लगातार पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती आ रही है...

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