विविधा

एक शताब्‍दी से भी अधिक गुजरे जब महात्‍मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्‍होंने चरखा देखा तक नहीं था। मगर स्‍वदेशी आंदोलन के दौरान वह राष्‍ट्रीय जीवनशैली का अनुसरण करते हुए बड़े मनोयोग से चरखा चलाने लगे थे। (Read in English: Khadi In Vogue Again, Wheels Of Charkhas Bustling Afresh)

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साल 1942 का साल... हिन्‍द महासागर से उठी मानसून की हवाएं भारत पहुंच चुकी थीं। उनके साथ ही घमासान नौसैनिक युद्ध की खबर भी पहुंची। विश्‍व दो ध्रुवों में बंट चुका था। भारत भी उबल रहा था और सदियों पुरानी दासता की बेड़ियों को तोड़ डालने का इंतजार कर रहा था। ऐसे वक्‍त में विश्‍व युद्ध में ब्रिटेन को भारत के समर्थन के बदले में औपनिवेशिक राज्‍य का दर्जा देने के प्रस्‍ताव के साथ सर स्‍टैफर्ड क्रिप्‍स का भारत आगमन हुआ। ब्रिटेन ने महारानी के प्रति निष्ठा के बदले में भारत को स्‍वशासन देने का प्रस्‍ताव किया लेकिन उनको इस बात का अहसास नहीं था कि शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने देश को उपनिवेश बनता देखने के लिए अपने जीवन का वलिदान नहीं किया था। देशभर के स्‍वतंत्रता सेनानियों की एक ही मांग थी, और यह थी पूर्ण स्‍वराज। इसलिए 8 अगस्‍त 1942 की पूर्व संध्‍या पर गांधीजी ने देशवासियों के समक्ष शंखनाद करते हुए कहा, ‘ये एक छोटा-सा मंत्र है जो मैं दे रहा हूं। आप चाहें तो इसे अपने हृदय पर अंकित कर सकते हैं और आपकी हर सांस के साथ इस मंत्र की आवाज आनी चाहिए। ये मंत्र है –‘करो, या मरो’। (Read in English: Quit India: Movement That Prepared Ground For Future Politics In India)

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8 अगस्‍त, 1942 को पारित ‘भारत छोड़ो’ संकल्‍प से भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ की शुरुआत हुई। गांधी जी को लगा कि सत्‍य और अहिंसा के आदर्श की अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गई है। विश्‍व युद्ध का दौर था। भारत पर कठोर साम्राज्‍यवादी शासन की तानाशाही जारी थी। धुरी राष्‍ट्रों से हमारी मातृभूमि पर हमले की धमकियां मिल रही थीं। ऐसे माहौल में स्‍वतंत्रता सेनानी एक ऐसी मानवीय रणनीति बनाने में लगे थे जिसमें हत्‍याओं, विनाश और विश्‍वासघात की कोई जगह न हो, ताकि पुरानी सभी गलतियों को सही किया जा सके। उन्‍होंने अपनी इस मुहिम में जीत हासिल कर न सिर्फ अपने आप को सही साबित किया बल्कि मानवता को सभ्‍यता का एक अनोखा पाठ भी सिखाया।

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आपाधापी भरे इस युग में जन-सामान्‍य बहुत कुछ हासिल करने की चाह में मानसिक अशांति और शारीरिक व्‍याधियों को आमंत्रण दे रहा है। लेकिन, विकास की प्रक्रिया में साझीदार होना वक्‍त की आवश्‍यकता है पर अंधाधुंध दौड़ना शरीर और मन को देने वाली यंत्रणा है। 21 जून को विश्‍व अन्‍तर्राष्‍ट्रीय योग दिवस के अवसर पर जन-मानस में योग के प्रति जो सकारात्‍मक भावनाएं उत्‍पन्‍न हो रही हैं वे वास्‍तव में एक सुखद अनुभव है। भारत भूमि में वर्षों से योग प्रचालित रहा है और आज विश्‍व भी इसे मान्‍यता प्रदान कर रहा है। राजयोग एक ऐसी मानसिक अवस्‍था है जिसे शांत चित्‍त से कोई भी कर सकता है।

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अर्थप्रधान एवं अतिव्‍यस्‍त आधुनिक जीवन शैली अपनाने के कारण आज का मानव न चाहते हुए भी दबाव एवं तनाव, अविश्राम, अराजकता, रोग ग्रस्‍त, अनिद्रा, निराशा, विफलता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्‍या तथा अनेकानेक कष्‍टपूर्ण परिस्थितियों में जीवन निर्वाह करने के लिए बाध्‍य हो गया है। जल, वायु, ध्‍वनि तथा अन्‍न प्रदूषण के साथ-साथ ऋणात्‍मक दुर्भावनाओं का भी वह शिकार बन चुका है। परिणामस्‍वरूप अनेकानेक शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक असंतुलन, चिंताएं, उदासी, सूनापन एवं दुर्भावनात्‍मक विचार उसे चारों ओर से घेर लेते हैं। उसके मन की शान्ति भंग हो जाती है लेकिन इन परिस्थितियों का दृढ़ता के साथ सामना करने के लिए हमारी भारतीय पौराणिक योग पद्धति सहायता कर सकती है।

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बाबा साहेब अम्‍बेडकर के जीवन और कार्यों के बारे में व्‍यापक अनुसंधान, अध्‍ययन और लेखन हो चुका है। आज हम बाबा साहेब को स्‍वतंत्रता आंदोलन के महानतम नेताओं में से एक के रूप में देखते हैं, जो न केवल एक क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में महान थे, बल्कि शैक्षिक दृष्टि से एक महान बुद्धिजीवी थे। बाबा साहेब नेताओं की उस श्रेणी से संबद्ध थे, जिन्‍होंने ऐसे विशिष्‍ट कार्य किए, जिनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बल्कि उन्‍होंने स्‍वयं भी उपयोगी विषयों पर व्‍यापक लेखन किया, जो भावी पीढ़ियों के लिए पढ़ने  योग्‍य है।

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