विविधा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के पश्चात भारत की एकजुटता के लिए पुरजोर तरीके से पूरी मज़बूती के साथ काम किया। इससे एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। देश की एकता की रक्षा करने के समक्ष कई चुनौतियां स्पष्ट रूप से विद्यमान थीं। सरदार पटेल ने लाजवाब कौशल के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हुए देश को एकता के सूत्र में बांधने के कार्य को पूरा किया और एकीकृत भारत के शिल्पकार के रूप में पहचान हासिल की। ऐसे में 31 अक्टूबर के दिन उनकी बहुमूल्य विरासत का जश्न मनाने के लिए देश उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है।

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स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष को परिणति तक पहुंचने के ऐन पहले 500 से ज्यादा देसी रियासतों में बंटे भारत वर्ष को एकसूत्र में पिरोकर भारत संघ में शामिल करना एक असंभव काम था। इसके लिए रियासतों को राजी करना, फिर आजादी के साथ ही मिले विभाजन के बेहद खुरदरे जख्म पर मखमली मरहम लगाना, ये सारे काम सबल राष्ट्र की मजबूत नींव के लिए जरूरी था। इन शुरुआती दुरूह कामों को पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी सरदार वल्लभ भाई झवेरी भाई पटेल ने अपने कंधे पर ली। उनकी अथक मेहनत का नतीजा है कि आज भारतीय गणतंत्र की दुनियाभर में तूती बोल रही है।

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सार्वजनिक स्‍वच्‍छता एक ऐसा विषय था, जिसके बारे में महात्‍मा गांधीजी की जीवन पर्यन्‍त गहरी दिलचस्‍पी रही। गांधीजी ने भारतीयों को स्‍वच्‍छता के महत्‍व के बारे में प्रेरित करने के लिए अपने जीवन का महत्‍वपूर्ण समय समर्पित किया और इस महत्‍वपूर्ण मुद्दे की ओर राष्‍ट्र की चेतना को जगाने का प्रयास किया। यह बहुत महत्‍वपूर्ण है कि गांधीजी का प्रकाशित साहित्‍य पूरी तरह सार्वजनिक स्‍वच्‍छता के मुद्दे की ओर महत्‍वपूर्ण ध्‍यान देने के लिए समर्पित है। इसमें सत्याग्रह, अहिंसा और खादी पर समान रूप से ध्‍यान केन्द्रित किया गया है।

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साल 1990 में जब सद्दाम हुसैन की ईराकी सेनाओं ने कुवैत पर हमला किया तो मुतुन्नि मैथ्‍यूज ने, जिन्‍हें टोयोटा सनी के नाम से अधिक पहचाना जाता है, मसीहा मैथ्‍यूज बनकर वहां फंसे भारतीयों की जीवन रक्षा की। सनी ने जैसा अनोखा कार्य किया उससे कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 हजार भारतीयों को 488 उड़ानों के जरिए भारत लाने में बड़ी मदद मिली।

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एक शताब्‍दी से भी अधिक गुजरे जब महात्‍मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्‍होंने चरखा देखा तक नहीं था। मगर स्‍वदेशी आंदोलन के दौरान वह राष्‍ट्रीय जीवनशैली का अनुसरण करते हुए बड़े मनोयोग से चरखा चलाने लगे थे। (Read in English: Khadi In Vogue Again, Wheels Of Charkhas Bustling Afresh)

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साल 1942 का साल... हिन्‍द महासागर से उठी मानसून की हवाएं भारत पहुंच चुकी थीं। उनके साथ ही घमासान नौसैनिक युद्ध की खबर भी पहुंची। विश्‍व दो ध्रुवों में बंट चुका था। भारत भी उबल रहा था और सदियों पुरानी दासता की बेड़ियों को तोड़ डालने का इंतजार कर रहा था। ऐसे वक्‍त में विश्‍व युद्ध में ब्रिटेन को भारत के समर्थन के बदले में औपनिवेशिक राज्‍य का दर्जा देने के प्रस्‍ताव के साथ सर स्‍टैफर्ड क्रिप्‍स का भारत आगमन हुआ। ब्रिटेन ने महारानी के प्रति निष्ठा के बदले में भारत को स्‍वशासन देने का प्रस्‍ताव किया लेकिन उनको इस बात का अहसास नहीं था कि शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने देश को उपनिवेश बनता देखने के लिए अपने जीवन का वलिदान नहीं किया था। देशभर के स्‍वतंत्रता सेनानियों की एक ही मांग थी, और यह थी पूर्ण स्‍वराज। इसलिए 8 अगस्‍त 1942 की पूर्व संध्‍या पर गांधीजी ने देशवासियों के समक्ष शंखनाद करते हुए कहा, ‘ये एक छोटा-सा मंत्र है जो मैं दे रहा हूं। आप चाहें तो इसे अपने हृदय पर अंकित कर सकते हैं और आपकी हर सांस के साथ इस मंत्र की आवाज आनी चाहिए। ये मंत्र है –‘करो, या मरो’। (Read in English: Quit India: Movement That Prepared Ground For Future Politics In India)

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