विविधा

सड़कों पर रहने वाले बेघर बच्‍चों के लिए अब प्रसन्‍न होने का समय है। आमतौर पर ‘स्‍ट्रीट चिल्‍ड्रन’ कहे जाने वाले 20 लाख से अधिक भारतीय बच्‍चे सुरक्षित देखभाल,पोषण, स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा के बगैर जीते हैं। मेरे लिए वे सड़क पर नन्‍हे फूलों की तरह हैं जो हमारी सामूहिक उदासीनता के बावजूद जिंदा हैं।

Read More

30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी जब दैनिक प्रार्थना के लिए जा रहे थे तब वह गोली लगने से शहीद हो गए। वह भौतिक रूप से हमें छोड़ गए लेकिन उनकी शिक्षा, उनके निजी जीवन के तमाम प्रयोग, राजनीति और दर्शन आज भी भारत के और दूसरे देशों के लोगों के मस्तिष्क में ताजा हैं।

Read More

पश्चिमी राजस्थान में रहने वाले घेवर राम और गौरी देवी के पास केवल डेढ़ बीघा ज़मीन है। सूखे की मार के चलते उन्हें हर बार आजीविका की तलाश में इधर से उधर विस्थापित होना पड़ता था लेकिन अब यह सिलसिला थम गया है। दरअसल अब उन्होंने बागवानी-चारागाह प्रणाली को अपना लिया है। (Read in English)

Read More

हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िला प्रशासन ने इस वर्ष देश में अपनी किस्म की एक अनूठी पहल करते हुए एक वन बेटियों को समर्पित किया है और जनसाधारण को नारा दिया है- 'बेटी बचाओ, पेड़ लगाओ...। 

Read More

करीब 100 साल पहले जून 1916 में गुजरात के अहमदाबाद क्लब में पहली बार आए एक बेहद स्टाइलिश मेहमान के काठीवारी ड्रेस को लेकर गुजरात के ही एक बैरिस्टर ने मज़ाक उड़ाया। नए आए मेहमान ने क्लब के लॉन में मौज़ूद थोड़े-बहुत लोगों को संबोधित किया लेकिन बैरिस्टर अपने दोस्तों के साथ पत्ते खेलते रहे। बैरिस्टर को पता था कि संबोधित कर रहा शख्स कोई और नहीं बल्कि मोहनदास करमचंद गांधी हैं जो कि हाल ही में दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटकर अहमदाबाद में ही सत्याग्रह आश्रम की नींव रख चुके हैं। एक बेहद सफल वकील बन चुके बैरिस्टर को गांधी के कार्यों से कोई मतलब नहीं था लेकिन गांधी जब अहमदाबाद पहुंचे तो बैरिस्टर से बातचीत के लिए जोर दिया। बैरिस्टर ने भी बिना मन से ही सही, गांधी से मिलने का फैसला कर लिया। (Read in English)

Read More

बढ़ती जीवन प्रत्याशा की वजह से दुनियाभर में बुजुर्गों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। बुढ़ापा आने पर हर व्यक्ति में शारीरिक, सामाजिक, बीमारी संबंधी और मनोवैज्ञानिक रूप से कई बदलाव आते हैं जबकि उनकी जरूरतों, उनकी स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं उतनी तेजी से नहीं बदल पाती। हमारी व्यवस्था जीवनपर्यंत चलती रहती है और कभी-कभी इसमें बदलती जीवनचर्या के हिसाब से बदलाव भी लाया जा सकता है। (Read in English) 

Read More



Mediabharti