भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच का यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकता था किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं। वह सार्वजनिक जीवन में आए।
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भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच का यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकता था किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं। वह सार्वजनिक जीवन में आए।
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मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का नारा “आगे बढ़ो, हम भारत के लिए हैं और भारत भारतीयों के लिए है”, आजादी के लिए उनके जज्बे व जुनून को बयां करने के लिए काफी है। 1861 में मुंबई के धनी पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी कामा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य केंद्र बिंदु और पहली महिला क्रांतिकारी थी। मैडम कामा स्वतंत्रता की पुजारिन रहीं।
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प्रसिद्ध तिकड़ी-लाल, बाल, पाल में से एक लाला लाजपतराय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उनका जीवन निरंतर गतिविधियों से परिपूर्ण रहा और उन्होंने राष्ट्र की निस्वार्थ भाव से सेवा करने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।
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उपनिवेशी शासन के विरुद्ध भारत का संघर्ष लम्बा और कठिन था। विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी। विदेशी प्रभुत्व के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलु लोगों को अज्ञानता से बाहर निकालने की हमारे नेताओं की योग्यता और इसके परिणामस्वरूप एक भारतीय राष्ट्र के विचार का पुनरुत्थान था।
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देश के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रांत की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का एक मुख्य राज्य है और इसकी देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका रही है। 1857 का विद्रोह हो या गांधीजी के नेतृत्व में चला स्वतंत्रता संग्राम, इन आंदोलनों को उत्तर प्रदेश में भरपूर समर्थन मिला।
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उमसभरी गर्मी के मौसम में 72 साल की मतंगिनी हाजरा लोगों के एक बड़े हुजूम के साथ कचहरी और थाने को घेरने के लिए जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, ब्रितानी हुकूमत की जमीन दरकती जा रही थी। एक बुजुर्ग महिला के साहस ने तामलूक प्रशासन को इस कदर कंपा दिया कि उसे अपने बचाव में फायरिंग के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझा। पुलिस की फायरिंग ने मतंगिनी हाजरा को शहीद जरूर कर दिया लेकिन इस बात की मुनादी भी कर दी कि ब्रितानी हुक्मरानों के पास अब 'भारत छोड़ना' ही अंतिम विकल्प था।
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