विविधा

प्रसिद्ध तिकड़ी-लाल, बाल, पाल में से एक लाला लाजपतराय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्‍यक्ति थे। उनका जीवन निरंतर गतिविधियों से परिपूर्ण रहा और उन्‍होंने राष्‍ट्र की निस्‍वार्थ भाव से सेवा करने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।

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उपनिवेशी शासन के विरुद्ध भारत का संघर्ष लम्‍बा और कठिन था। विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी। विदेशी प्रभुत्‍व के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलु लोगों को अज्ञानता से बाहर निकालने की हमारे नेताओं की योग्‍यता और इसके परिणामस्‍वरूप एक भारतीय राष्‍ट्र के विचार का पुनरुत्‍थान था।

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देश के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रांत की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का एक मुख्य राज्य है और इसकी देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका रही है। 1857 का विद्रोह हो या गांधीजी के नेतृत्व में चला स्वतंत्रता संग्राम, इन आंदोलनों को उत्तर प्रदेश में भरपूर समर्थन मिला।

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उमसभरी गर्मी के मौसम में 72 साल की मतंगिनी हाजरा लोगों के एक बड़े हुजूम के साथ कचहरी और थाने को घेरने के लिए जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, ब्रितानी हुकूमत की जमीन दरकती जा रही थी। एक बुजुर्ग महिला के साहस ने तामलूक प्रशासन को इस कदर कंपा दिया कि उसे अपने बचाव में फायरिंग के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझा। पुलिस की फायरिंग ने मतंगिनी हाजरा को शहीद जरूर कर दिया लेकिन इस बात की मुनादी भी कर दी कि ब्रितानी हुक्मरानों के पास अब 'भारत छोड़ना' ही अंतिम विकल्प था।

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साल 1870 के दशक के मध्य में तकरीबन 30 वर्ष की आयु के आसपास एक सुगठित डील-डौल वाले गौर वर्ण के व्यक्ति को पुणे की गलियों में एक थाली और चम्मच हाथों में लेकर दौड़ते हुए देखा जा सकता था। चम्मच से थाली को बजाते हुए वह अपने अगले भाषण के बारे में घोषणा करता रहता था। वह अनुरोध करता था, "सभी को शाम को शनिवार-वाड़ा मैदान में आना है। हमारे देश को आज़ाद होना ही चाहिए। अंग्रेज़ों को भगाया जाना चाहिए। मैं अपने भाषण में बताऊंगा कि यह कैसे किया जाना है।"

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सम्पूर्ण भारत वर्ष की तरह राजस्थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास 19वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गए थे। यहां की जनता पर अंग्रेजों की हुकूमत की बेड़ियां तो थी ही, साथ ही उन्हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्यों से भी जूझना पड़ता था। इस दोहरी मार के परिणामस्वरूप ऐसे अनेक आंदोलन हुए जिनका प्रभाव स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्पष्ट दिखाई दिया।

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