विविधा

यह आजादी से पूर्व के भारत की एक कहानी है जब पंजाब का एक बेहद युवा क्रांतिकारी फांसी के तख्‍ते पर भेजे जाने की अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था। यह मात्र 19 वर्ष का करतार सिहं सराभा था जो लाहौर विवाद में अपनी कथित भूमिका में शामिल अन्‍य 27 क्रांतिकारियों में से एक था। उसके दादाजी उससे मिलने लाहौर जेल आए। उन्‍होंने कहा, ‘‘करतार सिंह, हमें अभी भी विश्‍वास नहीं होता कि देश को तुम्‍हारी कुर्बानी से फायदा होगा। तुम अपनी जिंदगी क्‍यूं बर्बाद कर रहे हो? अपने जवाब में करतार सिंह ने अपने दादाजी को कुछ रिश्‍तेदारों की याद दिलाई जो हैजा, प्‍लेग अथवा अन्‍य बीमारियों से मर गए थे तो क्‍या आप चाहते हैं कि आपका पोता एक ऐसी कष्‍टकारक बीमारी से मरे? क्‍या यह मौत उससे हजार गुना बेहतर नहीं है? बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की वाणी को मौन करते हुए उसने पूछा।

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जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं। शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है। ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है। 

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यह बात उस समय की है जब साल 1777 में भारत पर मुगलों का शासन था। यह वही दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत व्यवसाय की आड़ में हिंद की सरजमीं पर अपनी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत कर रही थी। देखते ही देखते अंग्रेजी हुकूमत ने देश के तमाम राजकीय और शासकीय व्यवस्थाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया और 1857 तक आते-आते अंग्रेजी हुकूमत के परचम हर जगह लहराने लगे। 

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भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच का यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकता था किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी  ने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं। वह सार्वजनिक जीवन में आए।

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मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का नारा “आगे बढ़ो, हम भारत के लिए हैं और भारत भारतीयों के लिए है”, आजादी के लिए उनके जज्बे व जुनून को बयां करने के लिए काफी है। 1861 में मुंबई के धनी पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी कामा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य केंद्र बिंदु और पहली महिला क्रांतिकारी थी। मैडम कामा स्वतंत्रता की पुजारिन रहीं। 

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प्रसिद्ध तिकड़ी-लाल, बाल, पाल में से एक लाला लाजपतराय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्‍यक्ति थे। उनका जीवन निरंतर गतिविधियों से परिपूर्ण रहा और उन्‍होंने राष्‍ट्र की निस्‍वार्थ भाव से सेवा करने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।

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उपनिवेशी शासन के विरुद्ध भारत का संघर्ष लम्‍बा और कठिन था। विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी। विदेशी प्रभुत्‍व के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलु लोगों को अज्ञानता से बाहर निकालने की हमारे नेताओं की योग्‍यता और इसके परिणामस्‍वरूप एक भारतीय राष्‍ट्र के विचार का पुनरुत्‍थान था।

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देश के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रांत की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का एक मुख्य राज्य है और इसकी देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका रही है। 1857 का विद्रोह हो या गांधीजी के नेतृत्व में चला स्वतंत्रता संग्राम, इन आंदोलनों को उत्तर प्रदेश में भरपूर समर्थन मिला।

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उमसभरी गर्मी के मौसम में 72 साल की मतंगिनी हाजरा लोगों के एक बड़े हुजूम के साथ कचहरी और थाने को घेरने के लिए जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, ब्रितानी हुकूमत की जमीन दरकती जा रही थी। एक बुजुर्ग महिला के साहस ने तामलूक प्रशासन को इस कदर कंपा दिया कि उसे अपने बचाव में फायरिंग के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझा। पुलिस की फायरिंग ने मतंगिनी हाजरा को शहीद जरूर कर दिया लेकिन इस बात की मुनादी भी कर दी कि ब्रितानी हुक्मरानों के पास अब 'भारत छोड़ना' ही अंतिम विकल्प था।

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साल 1870 के दशक के मध्य में तकरीबन 30 वर्ष की आयु के आसपास एक सुगठित डील-डौल वाले गौर वर्ण के व्यक्ति को पुणे की गलियों में एक थाली और चम्मच हाथों में लेकर दौड़ते हुए देखा जा सकता था। चम्मच से थाली को बजाते हुए वह अपने अगले भाषण के बारे में घोषणा करता रहता था। वह अनुरोध करता था, "सभी को शाम को शनिवार-वाड़ा मैदान में आना है। हमारे देश को आज़ाद होना ही चाहिए। अंग्रेज़ों को भगाया जाना चाहिए। मैं अपने भाषण में बताऊंगा कि यह कैसे किया जाना है।"

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