विविधा

लेखिका महाश्वेता देवी का आदिवासी जीवन पर लिखा ‘चोट्टि मुंडा और उसका तीर' उपन्यास आदिवासी जीवन के साथ ही उनके जिस नायक के संघर्ष पर केन्द्रित है, वह हैं बिरसा मुंडा। इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने आदिवासियों द्वारा अपनी आजादी छिन जाने की आहट से बेचैन होने और बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उस आजादी को बचाने के संघर्ष को बड़ी खूबसूरती से गूंथा है। बिरसा मुंडा वास्तव में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के महानायक थे।

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सन् 1857 का भयावह काल वास्तव में भारतीय राष्ट्र की अनगिनत क़ुर्बानियों व बलिदानों की दास्तान है। करीब 90 साल की इस लम्बी लड़ाई में बहादुर शाह ज़फ़र से लेकर हर उस स्वतंत्रता सेनानी के लिए श्रद्धा से हमारा सर झुक जाता है जिसने देश को स्वराज दिलाने में भूमिका निभाई। इन गतिविधियों का मुख्य केंद्र अवध बना रहा। 

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अल्‍लूरी सीताराम राजू भारत भूमि में जन्म लेने वाले ऐसे महान व्यक्ति हैं जिन्होंने मातृ भूमि के बंधनों को तोड़ने के लिए अपने प्राण दे दिए। आज भी तेलुगू प्रांत के लोगों को राम राजू के प्रेरणादायक प्रसंग प्रेरित करते हैं। हालांकि, अंग्रेजों के साथ उनकी लड़ाई दो साल तक ही चली लेकिन उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी और देशवासियों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। (Read in English)

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यह आजादी से पूर्व के भारत की एक कहानी है जब पंजाब का एक बेहद युवा क्रांतिकारी फांसी के तख्‍ते पर भेजे जाने की अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था। यह मात्र 19 वर्ष का करतार सिहं सराभा था जो लाहौर विवाद में अपनी कथित भूमिका में शामिल अन्‍य 27 क्रांतिकारियों में से एक था। उसके दादाजी उससे मिलने लाहौर जेल आए। उन्‍होंने कहा, ‘‘करतार सिंह, हमें अभी भी विश्‍वास नहीं होता कि देश को तुम्‍हारी कुर्बानी से फायदा होगा। तुम अपनी जिंदगी क्‍यूं बर्बाद कर रहे हो? अपने जवाब में करतार सिंह ने अपने दादाजी को कुछ रिश्‍तेदारों की याद दिलाई जो हैजा, प्‍लेग अथवा अन्‍य बीमारियों से मर गए थे तो क्‍या आप चाहते हैं कि आपका पोता एक ऐसी कष्‍टकारक बीमारी से मरे? क्‍या यह मौत उससे हजार गुना बेहतर नहीं है? बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की वाणी को मौन करते हुए उसने पूछा।

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जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं। शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है। ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है। 

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यह बात उस समय की है जब साल 1777 में भारत पर मुगलों का शासन था। यह वही दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत व्यवसाय की आड़ में हिंद की सरजमीं पर अपनी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत कर रही थी। देखते ही देखते अंग्रेजी हुकूमत ने देश के तमाम राजकीय और शासकीय व्यवस्थाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया और 1857 तक आते-आते अंग्रेजी हुकूमत के परचम हर जगह लहराने लगे। 

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