विविधा

जयप्रकाश नारायण आधुनिक भारत के इतिहास में एक अनोखा स्थान रखते हैं क्योंकि वह अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनको देश के तीन लोकप्रिय आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने का अनोखा गौरव प्राप्त है। उन्होंने न केवल अपने जीवन जोखिम में डालते हुए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी बल्कि सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार और अधिनायकवाद के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और इसके पहले 50 और 60 के दशकों में लगभग 10 वर्ष तक भूदान आन्दोलन में भाग लेकर हृदय परिवर्तन के द्वारा बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन लाने का कार्य भी किया।

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मध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा कस्बे के अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंह को मालवा क्षेत्र में विशेष रूप से नमन किया जाता है। मालवा की धरती पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से मुकाबला करने वाले वह ऐसे नेतृत्वकर्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की सत्ता की नींव को कमजोर कर दिया था। उन्होंने राजशाही में जीने वाले लोगों को भी देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा दी। लंबे संघर्ष के बाद छलपूर्वक अंग्रेजों ने उन्हें कैद कर लिया। 10 फरवरी 1858 में इंदौर के महाराजा यशवंत चिकित्सालय परिसर के एक नीम के पेड़ पर उन्हें फांसी पर लटका दिया। 

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काप्‍पालोत्तिया तमिलन (तमिलों के कर्णधार) और सेक्किजुट्ठा सेम्‍माल (तेल के कोल्‍हू पर यातनाएं झेलने वाले विद्वान) के नाम से विख्‍यात वलिनायगम ओल्‍गानाथन चिदंबरम पिल्लई, असाधारण रूप से प्रतिभाशाली आयोजक एवं प्रचारक थे तथा वह एक ऐसी शख्सियत थे जो राष्‍ट्रवादी ध्‍येय के लिए जनता को उद्देलित करने के लिए सभी उपलब्‍ध संसाधनों का उपयोग करने में विश्‍वास रखते थे। जब तक वीओ चिदम्‍बरम का तूतीकोरिन में आगमन नहीं हुआ, तब तक तिरूनेलवेली में स्‍वदेशी आंदोलन को ताकत और गति न मिल सकी। (Read in English)

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वर्ष 1847 से प्रारंभ होकर दो शताब्दियों तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने लगातार अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ, अपनी विचारधारा एवं आमजन की भागीदारी और निस्वार्थ जोश जैसे शस्त्रों के साथ संघर्षरत कई शानदार नायक पैदा किए हैं। वे न केवल देशवासियों के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि विश्व स्तर पर लब्धप्रतिष्ठित हस्तियां भी हैं।

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लेखिका महाश्वेता देवी का आदिवासी जीवन पर लिखा ‘चोट्टि मुंडा और उसका तीर' उपन्यास आदिवासी जीवन के साथ ही उनके जिस नायक के संघर्ष पर केन्द्रित है, वह हैं बिरसा मुंडा। इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने आदिवासियों द्वारा अपनी आजादी छिन जाने की आहट से बेचैन होने और बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उस आजादी को बचाने के संघर्ष को बड़ी खूबसूरती से गूंथा है। बिरसा मुंडा वास्तव में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के महानायक थे।

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सन् 1857 का भयावह काल वास्तव में भारतीय राष्ट्र की अनगिनत क़ुर्बानियों व बलिदानों की दास्तान है। करीब 90 साल की इस लम्बी लड़ाई में बहादुर शाह ज़फ़र से लेकर हर उस स्वतंत्रता सेनानी के लिए श्रद्धा से हमारा सर झुक जाता है जिसने देश को स्वराज दिलाने में भूमिका निभाई। इन गतिविधियों का मुख्य केंद्र अवध बना रहा। 

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