देश

हाल ही में दक्षिण भारत के एक शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु सम्मान कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। बड़ी संख्या में डॉक्टर, व्यापारी, प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हिन्दू संस्कृति, गौरव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन उत्साहित कर रहा था।

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"आगरा से नोएडा डेढ़ घंटा, और नोएडा परी चौक से इंदिरा गांधी हवाई अड्डा दो घंटा। 1972 में भी आगरा से दिल्ली पहुंचने में चार-पांच घंटे लगते थे। आज हालात और बदतर हैं, प्रदूषण से आंखें जलती हैं, गले में खराश है, नाक बह रही है।"

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एक सड़क बता दो, जहां इत्मीनान से, बिना कुचले जाने के खौफ के, आप साइकिल की सवारी कर सकते हैं। यूरोप के तमाम शहरों में आज भी ज्यादातर लोग साइकिल की सवारी करते हैं!

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कुल 140 करोड़ भारतीयों में से कितने लोग बड़ी कारें या फैंसी मोबाईक खरीद सकते हैं? खरीद भी लें किश्तों पर, तो भी पेट्रोल कौन सा मुफ्त मिल रहा है! हकीकत यह है कि एक बड़ी संख्या में लोग आज भी सड़कों पर, शहर हो या देहात, पैदल ही चल रहे हैं या साइकिलों पर ही निर्भर हैं। लेकिन, इस बड़े समूह के हितों की रक्षा के लिए कभी कोई आवाज नहीं उठती...

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भारत की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां हर निगाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिकी है। क्या वह 75 साल की उम्र में स्वयं को पार्टी की उस 'अलिखित परंपरा' के हवाले करेंगे, जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों ने मार्गदर्शक की भूमिका निभाई थी? या फिर मोदी उस लकीर को मिटाकर नए राजनीतिक मानदंड गढ़ेंगे...

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अगली बार किसी मासूम निर्भया को मरते देखें, या सुनें तो जरूर सवाल करें कि क्या संस्कारी देशवासियों का जमीर मर चुका है, क्या आज के भारत में स्त्रियां अपनी मर्जी से जी सकती हैं, क्या परिवारों, मोहल्लों, स्कूलों और पुलिस थानों में लड़कियां सुरक्षित हैं...

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हमारा धर्म साझा विश्वासों, मूल्यों और परंपराओं के जरिए राष्ट्र को एकजुट कर सकता है। जब किसी देश में धर्म को राष्ट्र की नींव के रूप में देखा जाता है, तो यह सांस्कृतिक एकता और सामूहिक उद्देश्य की भावना को मजबूत करता है...

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24 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल, सशक्त, कामयाब, आज गुलाबी साड़ी में, जो हल्दी और फूलों की ख़ुशबू से अभी भी महक रही थी, पंखे से लटकी मिली। उसकी शादी को छह महीने ही हुए थे। मरने से पहले व्हाट्सएप स्टेटस डाला: "मैंने सब कुछ दिया, फिर भी कम पड़ा। माफ़ करना मां..."

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भारतीय राजनीति का रंगमंच और उस पर विपक्षी नेताओं का जलवा, यह कहानी किसी मसाला फिल्म से कम नहीं है! कांग्रेस के ‘युवराज’ के बयान आग की तरह फैलते हैं, मगर जब सच की कसौटी पर तौले जाते हैं, तो कई बार झूठ भी शरमा जाता है...

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कल्पना कीजिए, यदि भारत ने परिवार नियोजन कार्यक्रम न अपनाया होता तो आज आबादी 250 से 300 करोड़ के बीच होती। ऐसे में भूमि, जल और खाद्य संसाधनों पर भयानक दबाव पड़ता। पहले से ही सीमित कृषि क्षेत्र का विस्तार असंभव है, जबकि जल संसाधनों के 2030 तक 50 फीसदी घटने का अनुमान है। ऐसी परिस्थिति में भूख, पलायन और अराजकता का साम्राज्य होता...

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