संपादकीय

दृश्य- एक : नई दिल्ली में चहल-पहल भरी एक सुबह। घर में गजल गायक जगजीत सिंह की गाई गजल का रिकॉर्ड बज रहा है, "सूरज ठेकेदार सा सबको बांटे काम" भाई को कॉलेज के लिए तैयार होते देख निशा लगातार सोच रही है, आखिर मैं क्यों नही जाती कॉलेज? मां उसे जल्दी से भाई का कॉलेज बैग लाने के लिए कहती है, अनमनी सी वह थके कदमों से जाती है और एक फीकी सी मुस्कान के साथ बैग भाई को थमा देती है, और इस सारे मंजर को झाड़ू लगाते-लगाते ध्यान से देख रही है, घर में सफाई का काम करने वाली छोटी, यह सब देख उसे अपने घर की सुबह याद आ रही है जब मां ने छोटे भाई को तो तैयार हो स्कूल जाने के लिए कहा और उसे जल्दी से घर का काम निबटा कर मेम साब के यहां सफाई के लिए भेज दिया। 

Read More

लुईस लामॉर ने ठीक ही कहा है कि लोकतंत्र को प्रभावशाली बनाने के लिए हमारे अंदर भागीदारी की भावना होनी चाहिए। हमें केवल पर्यवेक्षक ही नहीं होना चाहिए। जो वोट नहीं डालता उसे शिकायत करने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र को जनता की भागीदारी के विस्‍तार के रूप में देखा जा सकता है। सरकार बनाने में सर्वोच्‍च शक्ति जनता के हाथ में होती है और जनता चुनाव की प्रतिनिधि प्रणाली के माध्‍यम से उस शक्ति का सीधे या परोक्ष रूप में उपयोग करती है। लोकतंत्र नागरिकों की उचित और निष्‍पक्ष भागीदारी के बिना विफल हो जाएगा। प्रत्‍येक वोट हमारे लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाता है।

Read More

भारत की जनसंख्‍या में पिछले 65 वर्ष में जबर्दस्‍त बदलाव आया और जनसंख्‍या बढ़कर 121 करोड़ पर पहुंच गई। विकास, साक्षरता और संचार का स्‍तर बढ़ने के कारण लोगों की आकांक्षाएं बढ़ गई जिससे शासन प्रणाली में परिवर्तन और नए-नए प्रयोग करना अनिवार्य हो गया। यहां तक कि अर्थव्‍यवस्‍था में भी बदलाव आया और कृषि हिस्‍सेदारी जबर्दस्‍त तरीके से गिरकर सकल घरेलू उत्‍पाद का 15 प्रतिशत से भी कम पर आ गई और निजी क्षेत्र उभरने लगे। 

Read More

देश की सत्ता के केन्द्र दिल्ली में भाजपा की करारी हार और आप को मिले जनमत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता के फैसले से बड़ा कुछ नहीं होता। इस जनमत ने भाजपा में ‘चाणक्य’ की भूमिका निभा रहे अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को न केवल रोका बल्कि यह चेतावनी भी दी कि यदि समय रहते न चेते तो उनके उत्कर्ष की क्या परिणिति हो सकती है।

Read More

रक्षा क्षेत्र में विदेशों पर निर्भरता कम करना और आत्‍मनिर्भरता प्राप्‍त करना सामरिक और आर्थिक दोनों कारणों से आज यह एक विकल्‍प के बजाय एक आवश्‍यकता है। 

Read More

भारत विश्व में सबसे ज्यादा युवाओं का देश है जिसकी लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है। उम्मीद की जाती है कि वर्ष 2020 तक भारत की आबादी की औसत आयु 28 वर्ष होगी जबकि अमेरिका की 35, चीन की 42 और जापान की औसत आयु 48 वर्ष होगी। वास्तव में युवा किसी भी देश की जनसंख्या में सबसे गतिशील और जीवंत हिस्सा होते हैं।

Read More

दुनियाभर में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 2.5 बिलियन से ज्यादा लोग स्वच्छता की उचित सुविधाओं से वंचित हैं और एक बिलियन से ज्यादा लोग शौचालय न होने के कारण खुले में शौच करने के लिए विवश हैं। हमारे देश के हालात भी बेहतर नहीं हैं जहां आधी से ज्यादा आबादी खुले में शौच करती है।

Read More

अटल जी के बारे लिखना उतना ही कठिन है जैसे गंगा की बहती धारा का वर्णन प्राय: शब्‍दातीत हो जाता है। कठोर होते हुए भी मृदुल, प्रतिपक्षी की आक्रामकता सहेजते हुए भी संबंधों में मैत्री की शालीनता, कठोर प्रहार करते हुए शब्‍द संयम और वाणी में सौम्‍यता, ऊँचाई होते हुए भी हरी दूब सी विनम्रता अटल जी को बस अटल जी बनाने वाले गुण हैं। 

Read More

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में ईश्वर से प्रार्थना की है कि वह उन्हें इतनी ऊंचाई पर न पहुंचाए जिससे कि वह सबसे दूर हो जाएं। प्रार्थना के विपरीत उन्हें एक सर्वस्वीकार्य राष्ट्र पुरुष जैसी ऊंचाई मिली। उनका यह सोच निराधार साबित हुई और वह इतनी ऊंचाई पाकर भी कहीं भारतीय जनमानस से दूर नहीं हुए। 

Read More

‘‘कांग्रेस सदस्यों में सरदार वल्लभभाई पटेल विभाजन के सबसे बड़े समर्थक थे लेकिन उन्हें भी विश्वास नहीं था कि भारत की समस्याओं का सबसे बेहतर समाधान विभाजन हो सकता है। उन्होंने अपने आप को बंटवारे के पक्ष से बाहर रखा। उनका कहना था कि इससे रंजिश और दंभ बढ़ेगा। उन्होंने अपने आप को हर कदम पर तब दुविधा में पाया जब तत्कालीन वित्‍तमंत्री लियाकत अली खां ने उनके प्रस्ताव ठुकरा दिए। बेहद गुस्से में उन्होने फैसला किया कि अगर कोई विकल्प न बचे, तो बंटवारे का प्रस्ताव मान लिया जाए। उनका विचार था कि अगर यह प्रस्ताव मान लिया गया तो यह मुस्लिम लीग के लिए एक कड़वा सबक होगा। पाकिस्तान थोड़े ही समय में लड़खड़ा जाएगा और जो सूबे भारत छोड़कर पाकिस्तान में शामिल हुए हैं उन्हें बहुत मुश्‍किलों का सामना करना होगा’’ - मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी आत्मकथा ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम’’ में यह बात आजादी मिलने के 10 साल बाद 1957 में लिखी। (Read in English: Maulana Abul Kalam Azad And Partition…)

Read More