... करीब दो घंटे की फिल्म 'मर्दानी ३' में कम से कम दो बार आगे की कहानी का 'अंदाजा' स्वत: ही लग जाता है।
कहानी के पहले हाफ में रामानुजन के किरदार का भेद खुलने से पहले ही महसूस हो जाता है कि यही आदमी 'खलनायक' है और दूसरे हाफ में फातिमा के 'अंडरकवर' होने का अंदाजा भी स्क्रीन पर भेद खुलने से पहले ही लग जाता है।
अंग्रेजी में पढ़ें : 'Mardaani 3' misses the 'Power of Silence'
फिल्म में रानी मुखर्जी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सामने तो जमकर 'प्रतिवाद' करती नजर आती हैं, लेकिन अपराधियों के सामने कम से कम दो जगहों पर 'सफाई' देती सी नजर आती हैं। इन जगहों पर संवादों की बजाय 'साइलेंस' यानी ‘मौन’ का इस्तेमाल किया जाता तो मजा ही आ जाता। नायिका के नायकत्व को उभारने के लिए हर बार डायलॉग मारने की जरूरत नहीं होती है। मौन का भी बड़ा महत्व होता है। ध्यान ही होगा कि पहले फिल्म 'धुरंधर' में और बाद में ‘छावा’ में अक्षय खन्ना का मौन क्या 'कहर' ढा देता है।
‘अम्मा’ के किरदार में मल्लिका प्रसाद शुरू में तो दमदार लगती हैं लेकिन जैसे-जैसे उनका किरदार रानी मुखर्जी के किरदार से 'मजबूत' होने लगता है तो फिर उनसे 'कमान' छीनकर वापस ‘शिवानी शिवाजी रॉय’ के किरदार को दे दी जाती है। शायद, रानी मुखर्जी को एक 'धांसू हीरोइन' के रूप में पेश करने की 'मजबूरी' रही होगी।
‘रामानुजन’ के रूप में प्रजेश कश्यप और ‘फातिमा’ के रूप में जानकी बोदीवाला और बेहतर हो सकते थे। फिल्म के अंत में खलनायक का कुछ 'अलग' हश्र मजेदार रहा। जिशू सेनगुप्ता फिल्म में क्यों हैं, पता नहीं। कुल मिलाकर, स्क्रिप्ट को ढंग से लिख लेते तो एक बढ़िया पैसा वसूल फिल्म बन सकती थी।






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