रहस्यों से भरा है मुरैना का चौसठ योगिनी मंदिर


मध्य प्रदेश के मुरैना में मौजूद चौसठ योगिनी मंदिर अपनेआप में अनूठा है। यह मंदिर चौसठ योगिनियों की पूजा के लिए समर्पित है, जिन्हें हिंदू धर्म में शक्तिशाली देवी माना जाता है। मंदिर की वास्तुकला, इतिहास और महत्व चौसठ योगिनी मंदिर को भारत के सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक मंदिरों में से एक बनाते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया हुआ है।

योगिनियों के बारे में कहा जाता है कि जब रक्तबीज असुर ने पृथ्वी पर हर जगह अपना आतंक मचाया हुआ था, तब सभी देवी-देवता भगवान शिव के पास गए और अपनी समस्या भगवान को शिव को सुनाई। तब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि अब आप ही रक्तबीज का वध करेंगी। देवी पार्वती ने भगवान शिव की बात मानी और रक्तबीज को हराने के लिए पृथ्वी लोक पहुंची।

रक्तबीज की शक्ति देखकर मां पार्वती ने काली का रूप धारण किया, लेकिन जब रक्तबीज की शक्तियां कई गुना ज्यादा बढ़ गईं तो मां काली ने उसका वध करने के लिए 64 योगिनियों का निर्माण किया। उन्होंने मां काली का साथ देकर रक्तबीज का वध करने में मदद की। रक्तबीज के वध के बाद वे भगवान शिव की समाधि मे हमेशा के लिए लीन हो गईं।

मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 1323 ई. में प्रतिहार वंश के राजपूत राजा देवपाल ने कराया था। मंदिर चौसठ योगिनियों के सम्मान में बनाया गया था, जिन्हें देवी काली के चौसठ रूप माना जाता है। प्रत्येक रूप अपनी अद्वितीय शक्तियों और क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करता है।

कहा जाता है कि राजा देवपाल को देवी के दर्शन हुए और उनके सम्मान में मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया। मौजूदा मंदिर मूल रूप से एक बड़े परिसर का हिस्सा था। इसमें कई अन्य मंदिर और भवन शामिल थे। लेकिन, उनमें से अधिकांश समय के साथ नष्ट होतो चले गए।

यह मंदिर हमारे पूर्व संसद भवन जैसी दिखने वाली एक गोलाकार संरचना है, जो अपने स्थापत्य में अद्वितीय है। कई लोगों का निष्कर्ष है कि यह मंदिर संसद भवन के पीछे का प्रेरणा स्रोत रहा होगा। मंदिर एक चबूतरे पर बना है और बाहरी दीवारें योगिनियों की नक्काशी से सजी हैं। मंदिर का गोलाकार आकार महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। दीवारों में 64 आले खुदे हुए हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक योगिनी स्थापित है। मंदिर में एक ही प्रवेश द्वार है, जो दो संरक्षक मूर्तियों - गंगा और यमुना - से घिरा हुआ है।

मंदिर के बीचों बीच एक गर्भगृह हैं। इसमें एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है और गर्भगृह के चारों ओर 64 कक्ष हैं जिसके प्रत्येक कमरे मे एक शिवलिंग है, और हर कक्ष के बाहर एक योगनी की मूर्ति है। इनमें से कुछ मूर्तियां चोरों द्वारा चुरा ली गई हैं और बची हुई मूर्तियां चोरी होने के भय से दिल्ली स्थित एक संग्राहलय में रख दिया गया है।

मंदिर 170 फीट की त्रिज्या के साथ लगभग 100 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। इस पर पहुंचने के लिए 200 से ज्यादा सीढ़िया चढ़नी पड़ती हैं। पूरा मंदिर 101 स्तंभों पर खड़ा है। इससे पूरे मंदिर का संतुलन बना हुआ है। मंदिर की संरचना इस प्रकार है कि यह कई भूकम्प के झटके झेलने के बाद भी सुरक्षित है।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह मन्दिर प्राचीन काल में रहस्यमयी शक्तियों के जागरण का केंद्र रहा होगा। माना जाता है कि यहां दैवीय शक्तियों को जागृत किया जाता होगा। इस मंदिर के प्राचीन निशानों से पता चलता है कि यहां प्रचंड ब्रह्मांडीय शक्तियों यानी योगिनियों को जागृत किया जाता रहा होगा। यह मंदिर काल गणना और पंचांग निर्माण का सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था। यहां ज्योतिष, गणित, संस्कृत साहित्य और तंत्र विज्ञान का अध्ययन करने के लिए देश-विदेश से छात्र आया करते थे। खुले आसमान के नीचे ग्रह और नक्षत्रों की गणना की शिक्षा दी जाती थी। 10वीं शताब्दी का यह मंदिर उस समय का आयुर्वेद विद्यालय भी हुआ करता था।

प्राचीन काल में चौसठ योगिनी मंदिर में देश-विदेश से शक्ति साधकों का जमावड़ा लगता था। वे वर्षों तक इस मंदिर में रहकर योगिनियों को जागृत करते थे। यह मंदिर किसी समय अद्भुत मांत्रिक एवं चमत्कारिक शक्तियों को सिद्ध करने का भव्य केन्द्र रहा होगा। इस कारण इसे तांत्रिक विश्वविद्यालय भी कहा जाने लगा। कहते हैं कि आज भी इस मंदिर में मांत्रिक शक्तियों की उपस्थिति का आभास होता है। यहां रात में रुकने की इजाजत नहीं है।

यह भी कहा जाता है कि आठ सौ वर्ष ईसा पूर्व के आसपास इस क्षेत्र में शासन कर रहे क्षत्रिय राजाओं को प्राचीन भारतीय गुप्त विद्याओं में विशेष रुचि थी। यहां के विद्वान इनसे संबंधित प्राचीन पुस्तकों एवं साधनाओं के माध्यम से निरन्तर शोध कार्यों में रत रहते थे। उन्होंने साधनाओं द्वारा तमाम शक्तियां भी प्राप्त कर ली थी। कहते हैं कि वे मध्य और पश्चिम एशिया से आए अपने विदेशी दुश्मनों से युद्ध करने में भी इन गुप्त विद्याओं का उपयोग करने से नहीं चूकते थे।

भारत की प्राचीन चमत्कारिक शक्तियों की खोज एवं उनके विकास के लिए उन्हे ऐसे शिक्षा केंद्र की आवश्यकता थी, जहां पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को इन विद्याओं का ज्ञान दे सके। इसलिए उन्होंने ऐसी शक्तियों से जुड़ी हुई तमाम साधनाओं एवं विद्याओं के शिक्षण, प्रशिक्षण के लिए चौसठ योगिनी मंदिर की स्थापना की।

यह मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्त्रैण दिव्यता और देवी की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर में हर साल हजारों भक्त आते हैं, जो देवी का आशीर्वाद लेने और उनकी प्रार्थना और प्रसाद चढ़ाने आते हैं।

मंदिर भ्रमण का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक है। इस समय यहां मौसम सुहावना होता है और भीड़ भी कम होती है। हालांकि, यदि आप मंदिर की सुंदरता का पूरी तरह से आनंद लेना चाहते हैं, तो सुबह जल्दी या देर दोपहर के दौरान यात्रा करने का प्रयास करें। मंदिर सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक खुला रहता है।

मंदिर मुरैना से लगभग सात किमी की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा ग्वालियर में है जो लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गोहद रोड रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 18 किलोमीटर है।



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