समंदर के किनारे आस्थाओं की लहरों का मचलना देखना हो तो आपको मेलबर्न के इस्कॉन मंदिर चलना होगा। एक शाम यहां गुजारी तो कई नई मजेदार बातें मालूम हुईं। वृन्दावन के इस्कॉन मंदिर में ‘हरे कृष्ण’ का उद्घोष करते विदेशी ज्यादा दिखाई देते हैं। इस मंदिर को अंग्रेज़ों का मंदिर कहकर भी काम चलाया जाता है लेकिन मेलबर्न के मंदिर में हज़ारों भारतीय कृष्ण – राधा का स्मरण करते दिखाई देते हैं और अंग्रेज बहुत कम…। सेंट किल्डा बीच के पास बड़ी रिहायशी कालोनी में सैकड़ों भारतीय केवल इसलिए रहना पसंद करते हैं क्योंकि यहां इस्कॉन मंदिर है। कई भारतीय नौजवान (अधिकांश सॉफ्टवेयर इंजिनियर) जो मंदिर में हाथ में पकड़ी पोटली में रखी माला का जाप करते मिले। बेहतर जीवन की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों से आए ये नौजवान भगवद्गीता के विभिन्न प्रसंगों का उद्धरण बात – बात में देते हैं। सभी विशुद्ध शाकाहारी हैं। लॉर्ड कृष्ण के प्रति इतने आस्थावान कि कृष्ण के सिर्फ अवतारी चरित्र की व्याख्या करना और सुनना पसंद करते हैं। एक भक्त से चुटकी लेते हुए जब पूछा कि ‘हर कोई अपनी मातृभूमि को मरते दम तक याद करता है जबकि भगवान कृष्ण ने 22 साल की अवस्था में मथुरा से करीब 1200 किमी दूर द्वारिका पलायन कर लिया और रणछोर कहलाए… महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र आए जो मथुरा से मात्र 200 किमी दूर है लेकिन मथुरा आने और वहां का हालचाल लेने की नहीं सूझी, ऐसा क्यों?’ भक्त तत्काल बोला, ‘जहां आस्था हो, वहां सवाल – जवाब नहीं होते…।’ इससे मुझे वृन्दावन के बांके बिहारी मंदिर का एक किस्सा स्मरण हो आया। मेरे मित्र डॉ. केएम शर्मा एक दिन मंदिर गए। भगवान के ठीक सामने भरपूर दर्शन के इन्तजार में आंख मूंदे खड़े हो गए। तभी उन्हें आभास हुआ कि उनके कोट की जेब में कोई हाथ डाल रहा है। प्रोफ़ेसर साहब ने कोई हील-हुज्जत नहीं की। मन ही मन सोचा कि आज ठाकुरजी की यही इच्छा है कि मेरी जेब कटे। मंदिर के बाहर निकले तो मालूम हुआ कि कोई साथी भक्त उनकी जेब में रखे पर्स को ले उड़ा। मित्र की आस्थाओं की पराकाष्ठा का यह किस्सा मेलबर्न के इस्कॉन मंदिर में अचानक याद आ गया। परदेश में बसे भारतवंशियों की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जीवन की सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के बाद अपनेपन का अभाव खलने लगता है। भारत जैसी सामाजिकता तो यहां है नहीं, ऐसे में इस्कॉन मंदिर में आकर कृष्ण की कथाओं में डूब जाने का अपना अलग आनंद है। यह रास्ता अपनेपन की कमी का विकल्प भी है।
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