मथुरा

राजस्थान के कुम्हेर तहसील के छोटे से गांव पाउआ में सन 1920 में जन्मे स्वतं़त्राता सेनानी का जीवन विशेष कठनाइयों से गुजरा हुआ है जब भंवर सिंह चार वर्ष के थे। तो उनके माता पिता का निधन हो गया गंभीर परिस्थितियों में भंवर सिंह के मामा जोरावर राम इनको अपने साथ लेकर गोवर्धन आ गये मामा जोरावर ने भंवर सिंह को किशोर अनाथालय में सुपुर्द कर दिया। अनाथालय में अपने तीस अन्य साथियों के साथ मिडिल पास के उपरांत भवर सिंह ने सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और एक साल का काराबास व 50 रू जुर्माना अंग्रेजी हुकुमत को दिया। लेकिन इस सत्याग्रह से भंवर सिंह का जुनून भारत को आजाद कराने के लिऐ बढ़ता गया। और इस स्वतंत्राता सेनानी ने भारत के आजादी के जुनून को लेकर 25 जनवरी 1943 को अंग्रेजो भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया। जहा पिफर एक बार अंग्रेजी हुकुमत की तानाशाही के चलते कठोर दण्ड के साथ साथ एक साल का पुनः जेल जाना पडा। इसके पश्चात स्वतंत्राता सेनानी भंवर सिंह राजस्थान के एक स्कूल में मास्टर हो गये दो साल तक बच्चों को विद्याअध्यन कराने के पश्चात सन 1946 में माहात्मा गांधी जी से मिलने के लिऐ गांधी सेवा आश्रम गऐ। जहां उन्होने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ सीखा इसके पश्चात भंवर सिंह ने सन 1954 से 55 तक पंचायत सेकेट्री का कार्यभार सभाला लेकिन वहां के कुछ घूंस खोर अपफसरों की मनमानी के चलते सेकेट्री की नौकरी छोड दी इसके बाद सन 1957 में ब्रज गांव सेवा मण्डल खादी भण्डार में मेनेजर के पद पर तैनात रहे 1960 में गोवर्धन नगर पंचायत के अधिशाषी अधिकारी के पद पर कार्य किया और सन 1982 में सेवानिवृत हो गये।

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मथुरा। सीवीलाईजड सीटीजन क्लब के तत्वाधान में आजादी की 68वीं वर्षगंाठ पर भगत सिंह पार्क में रंगारंग कार्यक्रम। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व लोकनिर्माण राज्य मंत्राी रामप्रसाद कमल होगा। कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुति गायक मनोज शर्मा द्वारा होगी। यह जानकारी सचिव कार्यक्रम के सचिव राजेश अग्रवाल ने दी। 

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुबंई स्थित नौसेना गोदी में 'आईएनएस कोलकाता' का निरीक्षण करते हुए आईएनएस कोलकाता राष्‍ट्र के ''बुद्धि बल'' का प्रमाण है भारत का लक्ष्‍य ऐसी रक्षा क्षमता हासिल करने का है प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज देश में निर्मित युद्धपोत आईएनएस कोलकाता राष्‍ट्र को स‍मर्पित किया। देश में ही निर्मित उन्नत किस्म के युद्धपोत आईएनएस कोलकाता का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मु्म्बई के नौसेना गोदी में जलावतरण किया। इसे देश को समर्पित करते हूए उन्होंने इसे देश की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। युद्धपोत के जलावतरण के बाद मुम्‍बई में नौसेना गोदी में नौसेना के अधिकारियों और नाविकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने आईएनएस कोलकाता को राष्‍ट्र के ''बुद्धि बल'' का प्रमाण बताया। उन्‍होंने कहा कि भारत का लक्ष्‍य ऐसी रक्षा क्षमता हासिल करने का है कि कोई उसकी ओर बुरी नज़र से न देख सके। नरेन्‍द्र मोदी ने इस बात पर बल दिया कि सशस्‍त्र सेनाओं के लिए जितना महत्‍वपूर्ण बाहुबल है उतना ही महत्‍वपूर्ण ''बुद्धि बल'' यानी वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमता है। प्रधानमंत्री ने आईएनएस कोलकाता को सबसे बड़ा स्‍वदेशी रक्षा उत्‍पादन बताया। उन्‍होंने कहा कि ''इस जहाज को राष्‍ट्र को समर्पित करते हुए हम विश्‍व को अपने ''बुद्धि बल'' और विनिर्माण क्षमताओं से अवगत करा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि जब हम महाराष्‍ट्र में हों और नौसेना की बात कर रहे हों तो ऐसे में छत्रपति शिवाजी को स्‍मरण किए बिना नहीं रहा जा सकता, जो एक महान मराठा सम्राट थे जिन्‍होंने नौ सेना को भारत के समुद्री व्‍यापारिक हितों के लिए एक महत्‍वपूर्ण साधन समझा था। उन्‍होंने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा वैश्विक व्‍यापार का एक महत्‍वपूर्ण पक्ष है, और भारत वैश्विक व्‍यापार को सुरक्षित बनाने में अपनी भूमिका अदा कर रहा है। उन्‍होंने कहा कि आईएनएस कोलकाता एक महत्‍वपूर्ण संचार प्‍लेटफार्म है और यह समुद्र में भारत के व्‍यापारिक हितों को बढ़ावा देने में उपयोगी सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री ने समुद्री रक्षा प्रतिष्‍ठानों के लिए हाल में बजट में किए गए प्रावधानों की चर्चा की और कहा कि भारत में विनिर्माण सुविधाओं के लिए दुनियाभर से सर्वोत्‍कट हथियार और उपकरण विनिर्माओं को आमंत्रित किया जायेगा और एक दिन आयेगा कि भारत रक्षा उत्‍पादन के क्षेत्र में आत्‍म-निर्भर बन जायेगा। प्रधानमंत्री ने भारतीय सशस्‍त्र सेनाओं की वीरता की सराहना की और जवानों को आश्‍वासन दिया कि समूचा राष्‍ट्र उनके साथ खड़ा है और उन्‍हें विश्‍वास है कि वे देश की रक्षा करने में कोई खामी नहीं छोड़ेगे। प्रधानमंत्री ने आईएनएस कोलकाता पर लगी विभिन्‍न सुविधाओं का जायजा भी लिया और आगन्‍तुक पुस्तिका पर हस्‍ताक्षर भी किए। 

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आगरा : देश के 68वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिलाधिकारी पंकज कुमार ने कलेक्ट्रेट में झण्डारोहण किया और राष्ट्रीय गान के पश्चात वहां उपस्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को नमन करते हुए श्यामबाबू शर्मा, ईलम सिंह, सरोज कुमारी, चिम्मनलाल, विजयशंकर चतुर्वेदी तथा नरेशचन्द्र सेठ को फूल माला पहनाकर घड़ी, मिष्ठान तथा शॉल देकर सम्मानित किया। जिलाधिकारी ने कहा कि हमारे देश में भिन्न जाति, धर्म, भाषा संस्कृति होने के बावजूद भी हम लोगों ने बहुत तरक्की की है और आज भी भारत देश के रूप में एकजुट हैं। यहां हर पांच साल में लोकतांत्रिक चुनाव होता है जिसका अर्थ मजबूत लोकतन्त्र है। यदि कोई अच्छा कार्य कर रहा है तो उसकी मदद करें। इस अवसर पर जिलाधिकारी ने कलक्ट्रेट परिसर में ही वृक्षारोपण भी किया। जिलाधिकारी के विशेष कार्याधिकारी दिनेश कुमार वर्मा ’’सारथी’’ ने आजादी पर तथा प्रशासनिक अधिकारी ओएन वर्मा ने ’’मां तुझे सलाम’’ काव्य का पाठ करते हुए अमर शहीद ऊधम सिंह, सरदार भगत सिंह, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, लाला लाजपत राय तथा जलियांवाला बाग में मारे गए शहीदों के बलिदानों की याद दिलाई। लोक कलाकार महावीर सिंह चाहर ने अमर शहीदों को नमन करते हुए लोक गीतों के माध्यम से देश पर जान गंवाने वाले वीर जवानों को याद किया। कार्यक्रम का संचालन कलेक्ट्रेट संघ के महामंत्री हरिकान्त शर्मा ने किया। इस अवसर पर समस्त अपर जिलाधिकारी, नगर मजिस्ट्रेट कुमार विनीत, सेवा निवृत्त एडीएम राधाकृष्ण, मुख्य कोषाधिकारी डॉ. अमर सिंह, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी भारत सिंह तथा सहायक मनोरंजन कर आयुक्त स्वतंत्र कुमार सहित कलेक्ट्रेट के समस्त अधिकारी व कर्मचारी गण उपस्थित थे।

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ग्रामीण विकास विभाग स्‍व-रोजगार एवं मजदूरी रोजगार के सृजन, ग्रामीण निर्धनों के लिए आवास एवं सिंचाई परिसम्‍पत्ति के प्रावधान, निराश्रितों को सामाजिक सहायता एवं ग्रामीण सड़कों के लिए स्‍कीमों का कार्यान्‍वयन करता है। इसके अतिरिक्‍त, विभाग डीआरडीए प्रशासन को सुदृढ़ करने हेतु सहायता, पंचायती राज संस्‍थान, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान, मानव संसाधन विकास, स्‍वैच्छिक कार्यवाही का विकास आदि कार्य भी करता है।  ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख कार्यक्रम हैं – प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई), ग्रामीण आवास (आरएच),  महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), स्‍वर्ण जयंती ग्राम स्‍वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) / राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) और राष्‍ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी)। महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ऐसा मांग आधारित मजदूरी रोजगार कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्‍य अकुशल शारीरिक श्रम करने इच्‍छुक व्‍यस्‍क सदस्‍यों वाले प्रत्‍येक ग्रामीण परिवार को एक वित्‍तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के मजदूरी रोजगार की गारंटी देकर आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है। इस योजना के प्रमुख उद्देश्‍य इस प्रकार है: •        ग्रामीण क्षेत्रों में मांग के अनुसार प्रत्‍येक परिवार को एक वित्‍तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन का अकुशल मजदूरी कार्य उपलब्‍ध कराना, जिससे निर्धारित गुणवत्‍ता और स्‍थायित्‍व वाली उपयोगी परिसंपत्‍तियों का निर्माण हो। •        गरीबों की आजीविकाओं को बढ़ावा देना। •        सक्रियतापूर्वक सामाजिक समावेशन सुनिश्‍चित करना तथा •        पंचायती राज संस्‍थाओं का सुदृढ़ीकरण करना। इस कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्‍धियां इस प्रकार हैं : •                 वर्ष 2006 में इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक सीधे ग्रामीण कामगार परिवारों को मजदूरी भुगतान के रूप में 1,63,754.41 करोड़ रुपये की राशि वितरित की गई है। •                 1,657.45 करोड़ श्रम दिवसों के रोजगार का सृजन हुआ है। •                 वर्ष 2008 से हर वर्ष औसतन पांच करोड़ ग्रामीण परिवारों को मजदूरी रोजगार प्राप्‍त हुआ है। •                 31 मार्च, 2014 तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की भागीदारी 48 प्रतिशत रही है। •                 कुल सृजित श्रम दिवसों में महिलाओं के श्रम दिवस 48 प्रतिशत रहे हैं। महिलाओं की यह भागीदारी इस अधिनियम में यथापेक्षित 33 प्रतिशत की अनिवार्य सीमा से काफी अधिक है। •                 इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक इस अधिनियम के अंतर्गत 260 लाख कार्य शुरू किए गए हैं। •                 इस कार्यक्रम की शुरुआत से प्रति श्रम दिवस औसत मजदूरी 81 प्रतिशत बढ़ी है। अधिसूचित मजदूरी दरें मेघालय में न्‍यूनतम 153 रुपये से हरियाणा में अधिकतम 236 रुपये तक हैं। त्‍वरित और पारदर्शी संचालन सुनिश्‍चित करने के लिए इलैक्‍ट्रानिक निधि निगरानी प्रणाली (ईएफएमएस) और इलैक्‍ट्रानिक मस्‍टर प्रबंधन प्रणाली (ईएमएमएस) शुरू की गई है। इनके अतिरिक्‍त कामगारों के खातों में आधार समर्थित प्रत्‍यक्ष इलैक्‍ट्रानिक अंतरण में बैंकों और बिजनेस कारेस्‍पेंडेंटों के बीच कार्य संचालन का प्रावधान भी है। राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) आबंटन और कवरेज की दृष्‍टि से एनआरएलएम मंत्रालय का दूसरा सबसे बड़ा कार्यक्रम है और इसका उद्देश्‍य वर्ष 2021-22 तक 8-10 करोड़ गरीब ग्रामीण परिवारों को स्‍व-सहायता समूहों और गांवों तथा इससे ऊपर के स्‍तरों के संघों में संगठित करके लाभान्‍वित करना है। एनआरएलएम में भागीदारीपूर्ण प्रक्रियाओं के माध्‍यम से और ग्राम सभा के अनुमोदन से निर्धारित किए गए समाज के गरीब और कमजोर वर्गों की पर्याप्‍त कवरेज सुनिश्‍चित की जाती है। पंचायती राज संस्‍थाओं के साथ गहन तालमेल इस कार्यक्रम की अहम विशेषता है। वर्ष 2013-14 के दौरान आजीविका-एनआरएलएम के अंतर्गत सभी अपेक्षाओं की पूर्ति, कार्यान्‍वयन संरचना की स्‍थापना, उन्‍हें व्‍यापक प्रारंभिक प्रशिक्षण और क्षमता विकास सहायता प्रदान करके उनका सुदृढ़ीकरण करके एनआरएलएम शुरू करने में राज्‍य मिशनों की सहायता करने पर जोर दिया गया। मार्च, 2014 तक 27 राज्‍यों और पुदुचेरी संघ राज्‍य क्षेत्र में एनआरएलएम शुरू कर दिया है और एसआरएलएम स्‍थापित कर दिए हैं। वर्ष 2012-13 के दौरान शुरू किए गए संसाधन ब्‍लॉक ने सामुदायिक संस्‍थाओं और सामाजिक पूंजी के सृजन की गुणवत्‍ता के संदर्भ में प्रभावी परिणाम दर्शाए हैं। एनआरएलएम ने विकलांग व्‍यक्‍तियों, बुजुर्गों, अत्‍यधिक कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी), बंधुआ मजदूरों, मैला ढ़ोने वालों, अनैतिक मानव व्‍यापार पीड़ितों जैसे समाज के सर्वाधिक उपेक्षित और कमजोर समुदायों तक लाभ पहुंचाने वाली विशेष कार्यनीतियां तैयार करने तथा प्रायोगिक परियोजनाओं पर जोर दिया है। इस वर्ष के दौरान मानव संसाधन नियमावली, वित्‍तीय प्रबंधन नियमावली के अंगीकरण के माध्‍यम से तथा ब्‍याज सब्‍सिडी कार्यक्रम शुरू करके संस्‍थागत प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण पर जोर दिया गया। आजीविका की सहायता से लगभग 1.58 लाख युवाओं ने अपने उद्यम स्‍थापित कर लिए हैं। 24.5 लाख महिला किसानों को भी सहायता दी गई है। कौशल विकास आजीविका कौशल भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की कौशल और रोजगार परक पहल है। आजीविका कौशल राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम)- आजीविका का एक घटक है। यह घटक ग्रामीण गरीबों को आय के विविध स्रोत उपलब्‍ध कराने की जरूरत पूरी करने तथा ग्रामीण युवाओं की व्‍यावसायिक आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्‍य गरीब ग्रामीण युवाओं के कौशलों का विकास करके उन्‍हें न्‍यूनतम मजदूरी या उससे अधिक दरों पर नियमित मासिक मजदूरी वाले रोजगार दिलाना है। इस कार्यक्रम में ग्रामीण युवाओं की कौशल विकास और उन्‍हें औपचारिक क्षेत्र में रोजगार दिलाने पर जोर दिया जाता है। वर्ष 2013-14 में पांच लाख ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया था, जिनमें से 2,08,843 युवाओं को मार्च, 2014 तक प्रशिक्षित किया गया और 1,39,076 को रोजगार दिलाया गया। भारत ग्रामीण आजीविका फाउंडेशन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 सितंबर, 2013 को आयोजित अपनी बैठक में भारत ग्रामीण आजीविका फाउंडेशन (बीआरएलएफ) नामक एक स्‍वतंत्र पंजीकृत सोसायटी स्‍थापित करने का निर्णय लिया था। फाउंडेशन का गठन, एक ओर सरकार और दूसरी ओर निजी क्षेत्र की परोपकारी संस्‍थाओं, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (कॉर्पोरेट क्षेत्र के सामाजिक दायित्‍व के अंतर्गत) के बीच साझेदारी के रूप में किया गया है। राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसायटी (एनआरएलपीएस) राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसायटी (एनआरएलपीएस) की स्‍थापना एक स्‍वायत्‍त एवं स्‍वतंत्र निकाय के रूप में जुलाई 2013 में की गई। एनआरएलपीएस एनआरएलएम के विभिन्‍न स्‍तरों पर मुख्‍य/अग्रणी तकनीकी सहायता एजेंसी के रूप में कार्य करती है। सोसायटी का मुख्‍य उद्देश्‍य कार्यक्रम की आयोजना, कार्यान्‍वयन और निगरानी में राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन (एसआरएलएम) का सतत क्षमता निर्माण करना है। यह एसआरएलएम के लिए ज्ञान संसाधन केंद्र के रूप में भी कार्य करती है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) हालांकि, संविधान में राष्‍ट्रीय राजमार्गों को छोड़ कर अन्‍य सड़कें राज्‍य सूची में हैं, फिर भी राज्‍यों को सहायता देने के लिए भारत सरकार ने गरीबी उपशमन कार्यनीति के अंतर्गत केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में 25 दिसंबर, 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम का मुख्‍य उद्देश्‍य कोर नेटवर्क में शामिल तथा सड़क मार्गों से न जुड़ी 500 तथा उससे अधिक (2001 की जनगणना) जनसंख्‍या वाली सभी पात्र बसावटों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है। पर्वतीय राज्‍यों (पूर्वोत्‍तर, सिक्‍किम, हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू एवं कश्‍मीर तथा उत्‍तराखंड), मरुभूमि क्षेत्रों (मरुभूमि विकास कार्यक्रम में यथानिर्धारित), जनजातीय (अनुसूचीV) क्षेत्रों तथा पिछड़े जिलों (गृह मंत्रालय और योजना आयोग द्वारा निर्धारित) में 250 तथा उससे अधिक की जनसंख्‍या (जनगणना 2001 के अनुसार) वाली बसावटों को सड़क मार्गों से जोड़ने का उद्देश्‍य है। इस कार्यक्रम में एक बारहमासी सड़क-संपर्क की परिकल्‍पना की गई है। अब देश में ऐसी सड़कों का लगभग 4,04,000 कि.मी. का नेटवर्क निर्मित किया गया है। खेत से सीधे बाजार तक सड़क संपर्क की सुनिश्‍चितता की दृष्टि से इस कार्यक्रम में वर्तमान थ्रू रूटों और प्रमुख ग्रामीण संपर्कों के विनिर्दिष्‍ट मानकों के अनुसार उन्‍नयन का प्रावधान है, हालांकि यह केंद्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत नहीं आता है। पीएमजीएसवाई के अंतर्गत 50,000 पात्र परियोजनाओं में से 10,725 परियोजनाएं मंजूर की गई हैं। दिनांक 31 मार्च, 2014 तक 97,838 बसावटों को सड़कों से जोड़ा गया है। 2,48,919 किमी के नए सड़क संपर्कों का निर्माण कर लिया गया है। ग्रामीण सड़कों की महत्‍ता का अंदाजा सड़क निर्माण अथवा निर्माण के शीघ्र पश्‍चात नहीं लगाया जा सकता। कुछ वर्षों के उपरांत ही विशेष रूप से जब यातायात की आवाजाही बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था में बाजार तक पहुंच का पूरा दोहन किया जाता है तब सड़कों के लाभ का पूरा पता चलता है। ग्रामीण सड़कों के नियमित रखरखाव से ही सामाजिक-आर्थिक विकास का पूरा लाभ प्राप्‍त होता है और गरीबी कम होती है। इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) मंत्रालय के गरीबी उपशमन के प्रयासों की व्‍यापक कार्यनीति के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय की इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) नामक प्रमुख योजना शुरुआत से ही बेघर या अपर्याप्‍त आवासीय सुविधाओं वाले बीपीएल परिवारों को सुरक्षित और टिकाऊ आश्रय के निर्माण के लिए सहयाता देती रही है। ‘सभी के लिए आश्रय’ की मंत्रालय की प्रतिबद्धता को तब और रफ्तार मिली, जब भारत ने जून, 1999 में मानव बस्‍ती संबंधी इस्‍तांबुल घोषणा पर हस्‍ताक्षर करके यह स्‍वीकार किया कि सुरक्षित स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक आश्रय तथा आधारभूत सेवाओं की उपलब्‍धता व्‍यक्ति के शारीरिक, मनौवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक कल्‍याण के लिए बेहद जरूरी हैं। पर्यावास दृष्टिकोण का उद्देश्‍य सभी, विशेषकर वंचित शहरी और ग्रामीण गरीबों के लिए अवसंरचना, सुरक्षित पेयजल, स्‍वच्‍छता, बिजली इत्‍यादि जैसी आधारभूत सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने वाले प्रयासों के माध्‍यम से पर्याप्‍त आश्रय सुनिश्‍चित करना है। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए कि ग्रामीण आवास उपेक्षितों के लिए किया जाने वाला प्रमुख गरीबी उपशमन उपाय है, केंद्र सरकार सभी के लिए आश्रय उपलब्‍ध कराने के प्रयासों के तहत इंदिरा आवास योजना चला रही है। मकान केवल आश्रय और निवास स्‍थान नहीं होता बल्कि यह एक ऐसी संपत्‍ति है, जिससे आजीविका के साधन उपलबध होते हैं और जो सामाजिक स्‍थिति का प्रतीक होने के साथ-साथ सांस्‍कृतिक अभिव्‍यक्ति का एक रूप भी होता है। वर्ष 2013-14 में 13.73 लाख मकानों का निर्माण किया गया।               महिला सशक्‍तीकरण  वर्ष 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत महिला कामगारों की भागीदारी 53 प्रतिशत थी, जबकि सांविधिक न्‍यूनतम आवश्‍यकता 33 प्रतिशत है। एनआरएलएम के सभी लाभ केवल ग्रामीण गरीब महिलाओं के लिए हैं। एनआरएलएम के महिला किसान सशक्‍तीकरण परियोजना नामक उपघटक का उद्देश्‍य महिला किसानों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्‍य से उन  महिलाओं हेतु स्‍थायी आजीविका के अवसर सृजित करना है। आजीविका कौशल के अंतर्गत 33 प्रतिशत प्रत्‍याशी महिलाएं होनी चाहिएं। इंदिरा आवास योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार आईएवाई मकानों का आवंटन विधवा/अविवाहित/पति से अलग रह रही महिला के मामले को छोड़कर अन्‍य सभी मामलों में पति और पत्‍नी के संयुक्‍त नाम से किया जाना चाहिए। राज्‍य चाहें तो इन मकानों का आवंटन केवल महिलाओं के नाम पर भी कर सकते हैं। एनएसएपी की विभिन्‍न योजनाओं के अंतर्गत बीपीएल श्रेणी के विधवाओं और वृद्ध महिलाओं को सहायता दी जाती है। महिलाओं के लाभार्थ कम से कम 30 प्रतिशत योजनागत संसाधनों का निर्धारण करने के लिए ग्रामीण विकास विभाग ने जेंडर बजट प्रकोष्‍ठ की स्‍थापना कर दी है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्‍पसंख्‍यकों के लिए प्रयास सभी के लिए विशेषकर लाभवंचित समूहों के व्‍यक्‍तियों के लिए समान अवसर किसी भी विकास संबंधी पहल का एक अनिवार्य घटक है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का मुख्‍य उद्देश्‍य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी को कम करना है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सहित समाज के सर्वाधिक लाभवंचित वर्गों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से यह मंत्रालय विशेष रोजगार सृजन कार्यक्रमों के माध्‍यम से विभिन्‍न योजनाओं/कार्यक्रमों को क्रियान्‍वित कर रहा है। मंत्रालय ने इस संबंध में दिशानिर्देशों में विशेष प्रावधान किए हैं। तदनुसार, आईएवाई और एनआरएलएम के अंतर्गत अनुसूचित जाति उप-योजना (एससीएसपी) और जनजातीय उप-योजना (टीएसपी) के लिए निधियां निर्धारित की गई हैं। आजीविका में, कम से कम 50% महिला लाभार्थी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से तथा 15% महिला लाभार्थी अल्‍पसंख्‍यक समुदायों से होंगी। इसके अलावा, राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका परियोजना (एनआरएलपी) के अंतर्गत संसाधनों के व्‍यापक उपयोग के लिए ऐसे 13 राज्‍यों का चयन किया गया है जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित ग्रामीण निर्धनों की आबादी काफी अधिक है। एसजीएसवाई के अंतर्गत, स्‍व-सहायता समूहों के लगभग 86 लाख अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सदस्‍यों को आर्थिक कार्यकलाप करने के लिए सहायता प्रदान की गई थी। एनआरएलएम के हिस्‍से के रूप में, स्‍व-सहायता समूहों में मुख्‍य रूप से 5.16 लाख अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तथा 50,000 अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के सदस्‍यों को प्रोत्‍साहित किया गया था। कौशल विकास के अंतर्गत, अनुसूचित जाति के 2.21 लाख, अनुसूचित जनजाति के 1.04 लाख और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के 54136 ग्रामीण युवा सदस्‍यों को प्रशिक्षण दिया गया था। इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए कम से कम 60% तथा अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए 15% निधियों का उपयोग किया जाना अपेक्षित है। वर्ष 2013-14 में, स्‍वीकृत किए गए कुल 18.66 लाख मकानों में से 6.89 लाख मकान अनुसूचित जाति के लिए, 5.20 लाख मकान अनुसूचित जनजाति के लिए और 2.36 लाख मकान अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए मंजूर किए गए हैं। वर्ष 2013-14 के दौरान 10151.99 करोड़ रु. के कुल व्‍यय में से 6296.52 करोड़ रु. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए तथा 1270.13 करोड़ रु. अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए खर्च किए गए हैं। मनरेगा योजना के अंतर्गत, वर्तमान वर्ष के दौरान सृजित किए गए रोजगार के कुल 126.36 करोड़ श्रमदिवसों में से अनुसूचित जाति के लिए 29.65 करोड़ श्रमदिवस (23%) और अनुसूचित जनजाति के लिए 19.53 करोड़ श्रमदिवस (15%) सृजित किए गए थे। विशेष क्षेत्रों के लिए लक्षित उपाय हालांकि 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992)  में ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्‍थाओं (पीआरआई) की स्‍थापना के व्‍यापक विधिक – संवैधानिक फ्रेम वर्क का प्रावधान किया गया है, लेकिन सही मायने में विभिन्‍न राज्‍यों में इस अधिनियम के कार्यान्‍वयन में अंतर रहा है। इस अंतर के परिणामस्‍वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में स्‍थानीय स्‍तर पर एक ही जैसी संस्‍थागत संरचनाओं की संस्‍थागत क्षमताओं में अंतर था। विशेषकर जिन क्षेत्रों में इन संस्‍थाओं को सार्वजनिक वस्‍तुओं और सेवाओं की प्रदायगी में प्रमुख भूमिका दी गई, उन क्षेत्रों में विकास संबंधी परिणामों में अंतर आने का कारण भी कुछ हद तक यह अंतर ही है। केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) के उद्देश्‍य और प्रचालन दिशा-निर्देश तो एक समान हैं लेकिन उनके कार्यान्‍वयन के परिणाम विभिन्‍न क्षेत्रों में अलग-अलग हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की सभी योजनाओं में पूर्वोत्‍तर के विशेष श्रेणी वाले आठ राज्‍यों पर विशेष जोर दिया गया है। केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के बजट (सकल बजटीय सहायता) का 10 प्रतिशत निर्धारित करने और केंद्रीय संसाधनों का व्‍यपगत न हो सकने वाला पूल तैयार किए जाने का लाभ हाल के वर्षों में प्राप्‍त हुआ है। वर्ष 2013-14 के दौरान मनरेगा के अंतर्गत केंद्र सरकार के हिस्‍से के रूप में पूर्वोत्‍तर राज्‍यों को 2801.49 करोड रुपये रिलीज किए गए, जबकि जबकि एनआरएलएम के अंतर्गत 228.20 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) आवंटित किए गए, जिसमें से 110.87 करोड़ रुपये रिलीज किए गए। वर्ष 2013-14 के दौरान पीएमजीएसवाई के अंतर्गत पूर्वोत्‍तर राज्‍यों को 353.31 करोड़ रुपये रिलीज किए गए। एनएसएपी के अंतर्गत सर्वव्‍यापी कवरेज की परिकल्‍पना की गई थी और प्रत्‍येक राज्‍यों को निधियों का आवंटन लाभार्थियों की अनुमानित संख्‍या के आधार पर किया गया। वर्ष 2013-14 के दौरान 82 समेकित कार्य योजना (आईएपी) जिलों में मनरेगा के अंतर्गत 86.07 लाख परिवारों को रोजगार मिला; 4039.50 लाख श्रम दिवसों का सृजन हुआ और 702196.12 लाख रुपये खर्च किए गए। समेकित कार्ययोजना जिलों में योजना के प्रभावी कार्यान्‍वयन के लिए इस योजना के प्रावधानों में कई छूट दी गई हैं। लक्षित 88 समेकित कार्ययोजना जिलों में 56,257 बसावटों को पीएमजीएसवाई के अंतर्गत सड़क से जोड़े जाने का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्‍य में से अब तक 41.379 बसावटें स्‍वीकृत की गई हैं और 24,057 बसावटें (स्‍वीकृत बसावटों का 58 प्रतिशत) सड़कों से जोड़ी गई हैं। इसी प्रकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 82 जिलों को भी दुर्गम क्षेत्रों की श्रेणी में शामिल किया गया है और इन जिलों में आईएवाई लाभार्थियों को एक मकान के निर्माण के लिए 75 हजार रुपये की बढ़ी हुई सहायता दी जाती है। वामपंथी उग्रवाद से सर्वाधिक प्रभावित 27 जिलों में युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार दिलाने के लिए आजीविका कौशल के अंतर्गत रोशनी नामक विशेष पहल 7 जून, 2013 को शुरू की गई। एनआरएलएम में आईएपी जिलों को लाभान्‍वित करने को प्राथमिकता दी गई है। अब तक कई आईएपी जिले एनआरएलएम गहन जिले भी हैं। 88 आईएपी जिलों में से 53 जिले पहले से ही एनआरएलएम की गहन कवरेज में शामिल हैं। जम्‍मू और कश्‍मीर के लिए विशेष पहल के अंतर्गत 223 करोड़ रुपये रिलीज किए गए हैं तथा 5186.66 किमी लंबाई वाले 962 सड़क कार्यों का निर्माण कार्य संपन्‍न किया गया। आजीविका कौशल के अंतर्गत हिमायत कौशल विकास की विशेष योजना है। ग्रामीण विकास का उद्देश्‍य पांच वर्षों की अवधि (2011-12 से 2016-17 तक) में जम्‍मू और कश्‍मीर के एक लाख युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करके संगठित क्षेत्रों में रोजगार दिलाना है। आशा है कि एनआरएलएम में उम्‍मीद कार्यक्रम के अंतर्गत राज्‍य सरकार पांच वर्षों की अवधि में लगभग नौ लाख महिलाओं को लाभान्‍वित करेगी। ये महिलाएं दो तिहाई ग्रामीण परिवारों का प्रतिनिधित्‍व करती हैं।  इस कार्यक्रम में राज्‍य के 22 जिलों के 143 ब्‍लॉकों में सभी 3292 ग्राम पंचायतों की नौ लाख महिलाओं को लाभान्‍वित किया जाएगा। पर्यावरण के अनुकूल प्रयास अच्‍छी पारिस्थितिकीय प्रणालियां ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर उपेक्षित समुदायों के लिए कृषि आधारित आजीविकाओं तथा पेयजल, स्‍वच्‍छता और स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख जैसी आवश्‍यक सेवाओं की उपलब्‍धता बढ़ाने में सहायक होती हैं। प्राकृतिक संसाधनों में निवेश से समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और उनमें प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता विकसित करने में भी मदद मिलती है। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय की कार्यनीति में एक बड़ा बदलाव है। स्‍थायी गरीबी उपशमन के लक्ष्‍य की प्राप्‍ति में योगदान की क्षमताओं का उपयोग करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के किफायती उपयोग के लिए मंत्रालय निम्‍नलिखित पर ध्‍यान दे रहा है : •         जल निकायों और जलाशयों सहित पारिस्थितिकीय प्रणालियों की गुणवत्‍ता और वहन क्षमता बढ़ाना तथा प्राकृतिक संसाधनों के क्षय की रोकथाम करना; •         प्राकृतिक संसाधनों के स्‍थाई उपयोग पर आधारित स्‍थायी आजीविकाओं को बढ़ावा देना; •         पारिस्थितिकीय प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना ताकि विनाशकारी मौसमी परिस्‍थितियों में कमी आए तथा जलवायु परिवर्तन की समस्‍या से निपटा जा सके •         ऊर्जा, सामग्री, प्राकृतिक संसाधनों के किफायती उपयोग और नवीकरणीय सामग्री के अधिक प्रयोग के माध्‍यम से विभिन्‍न कार्यकलापों के पारिस्‍थितिकीय तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों की रोकथाम करना। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2009-10 से 2011-12 के बीच के एक वर्ष के दौरान ग्रामीण मासिक प्रति व्‍यक्‍ति उपभोग व्‍यय (एमपीसीई) 5.5 प्रतिशत की तेज रफ्तार से बढ़ा (एनएसएसओ-2012)। हालांकि औसत ग्रामीण एमपीसीई शहरी औसत से लगभग आधी रही, लेकिन ग्रामीण आय और व्‍यय में वृद्धि ग्रामीण गरीबी अनुपात में भारी कमी दर्शाती है। यह अनुपात मात्र दो वर्षों में 34 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत से भी कम हो गया है। क्रय शक्‍ति बढ़ने के परिणामस्‍वरूप ग्रामीण बाजार अब बाकी बचे सामान का खुदरा बाजार नहीं रह गए हैं। विशेष रूप से ग्रामीण मांग की पूर्ति के लिए उत्‍पाद तैयार किए जा रहे हैं। ग्रामीण भारत अब अपनी उपस्‍थिति का अहसास करा रहा है। इसके अतिरिक्‍त बड़े गांव भी शहरी केंद्रों से जुड़े सक्रिय विकास केंद्रों के रूप में तेजी से उभर रहे हैं।

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डॉ. विश्व मोहन कटोच किसी रोग का इलाज उसके निदान पर निर्भर करता है अर्थात यदि समय पर और सटीक निदान कर लिया जाए तो जहां चिकित्सक द्वारा उपयुक्त इलाज की शीघ्र शुरुआत करना आसान हो जाता है वहीं रोगी में उभरने वाली गंभीर जटिलताओं और उनके इलाज पर होने वाले व्यय भार से भी बचा जा सकता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग / भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) का उद्देश्य रोगों के निदान, चिकित्सा विधियों और रोगनिवारण के लिए वैक्सीन से संबंधित अनुसंधान और नवाचारों के माध्यम से लोगों तक आधुनिक स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी को पहुंचाना, शोध परिणामों को उत्पादों और प्रक्रियाओं में रूपांतरित करना है और संबंधित संगठनों के सहयोग में इन नवाचारों को जन स्वास्थ्य प्रणाली में सम्मिलित कराना है। हाल के वर्षों में आईसीएमआर / स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा नवाचारों एवं प्रौद्योगिकियों के माध्यम से निम्नलिखित प्रमुख उपलब्धियां प्राप्त की गईं: जापानी मस्तिष्कशोथ के लिए स्वदेशी विकसित वैक्सीन का लोकार्पण भारत में तीव्र मस्तिष्कशोथ संलक्षण (एक्यूट एनसिफैलाइटिस सिण्ड्रोम) एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में वेल्लोर में प्रकाश में आया। जेई विषाणु देश के 19 राज्यों के 171 जिलों में फैल गया। अभी तक जेई की वैक्सीन चीन से आयात की जाती है। आईसीएमआर के पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (पब्लिक) और भारत बायोटेक (प्राइवेट) की भागीदारी में जेनवैक नामक प्रथम स्वदेशी जापानी मस्तिष्कशोथ वैक्सीन विकसित की गई। राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान, पुणे द्वारा स्वदेशी विषाणु उपभेद (स्ट्रेन) पृथक किया गया और उसकी विशेषता ज्ञात की गई। इसे वैक्सीन निर्माण के लिए हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक को उपलब्ध कराया गया। आईसीएमआर एवं भारत बायोटेक की भागीदारी में विकसित जेनवैक नामक वैक्सीन को भारत सरकार के औषधि नियंत्रक द्वारा लाइसेंस प्रदान किया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में इस स्वदेशी जेनवैक वैक्सीन के सम्मिलित होने से देश के विशेषतया जेई प्रभावित क्षेत्रों में जनता को पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध कराई जा सकेगी और स्वावलम्बिता प्राप्त की जा सकेगी। थैलासीमिया के आण्विक निदान हेतु जांच किट बीटा थैलासीमिया मेजर बचपन में होने वाला एक गंभीर आनुवंशिक एनीमिया है। यह भारत में प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों को प्रभावित करता है। थैलासीमिया से पीड़ित बच्चा प्राय: छह माह से दो वर्ष की आयु में पीला पड़ जाता है और पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता। ऐसे बच्चों को नियमित रक्ताधान की आवश्यकता पड़ती है। जिससे उसके शरीर में आयरन (लौह) की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इस आयरन का निष्कासन अति आवश्यक है जो बहुत खर्चीला होता है। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है। भारत में प्रतिवर्ष थैलासीमिया मेजर के साथ पैदा होने वाले 10,000 से 12,000 बच्चों के साथ लगभग तीन से चार करोड़ थैलासीमिया के संवाहक हैं। प्रत्येक वर्ष 5000 से अधिक बच्चे सिकिल सेल एनीमिया के साथ पैदा होते हैं। इस विकार के संवाहकों को पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि माता-पिता दोनों थैलासीमिया (थैलासीमिया ट्रेट) के वाहक हैं तो 25 प्रतिशत मामलों में उनके बच्चे में यह वंशानुक्रम विकार होता है। बीटा थैलासीमिया और सिकिल सेल एनीमिया की जांच के लिए आईसीएमआर ने सटीक तकनीक से लैस थैलासीमिया जांच किट का विकास किया है। आईसीएमआर के मुम्बई स्थित राष्ट्रीय प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह तकनीक माता-पिता और गर्भस्थ शिशु में थैलासीमिया के लक्षणों का पता लगाने में मदद करेगी जिससे इस बीमारी से पीड़ित बच्चे के जन्म को रोका जा सकेगा। इससे प्रसवपूर्व गर्भस्थ शिशु में इसका निदान करके उपयुक्त सलाह दी जा सकेगी जिससे थैलासीमिया संभावित शिशु के जन्म को रोका जा सकेगा। यह तकनीक पीसीआर जैसी बुनियादी सेवाओं से लैस संस्थानों जैसे- जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के लिए बहुत उपयोगी है।  सर्वाइकल कैंसर हेतु एवी मैग्नीविज़ुअलाइज़र जांच युक्ति विकसित सर्वाइकल अर्थात गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से अभी भी ग्रामीण और अर्द्धशहरी अनेक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। अनुमानत: प्रतिवर्ष सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित लगभग 1,32,000 रोगियों की पहचान की जाती है। इनमें इसके कारण लगभग 74,000 मौतें हो जाती हैं। वर्तमान में सर्वाइकल कैंसर की जांच सुविधा केवल क्षेत्रीय कैंसर संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध है जो मंहगी है। आईसीएमआर के नोएडा स्थित कौशिकी एवं निवारक अर्बुदशास्त्र संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एवी मैग्नीविज़ुअलाइज़र एक कम मूल्य वाली पर प्रभावशाली युक्ति है जिसके माध्यम से जिला और उपजिला स्तर पर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर प्रयोग किया जा सकेगा। एक 12 वोल्ट की बैटरी से परिचालित यह युक्ति फील्ड में भी उपयोग की जा सकती है। इस युक्ति से कैंसर पूर्व स्थितियों की शीघ्र पहचान हो जाने से समय से चिकित्सा प्रबंध के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में सर्वाइकल कैंसर ग्रस्त रोगियों का प्रारंभिक अवस्था में निदान करके उनका जीवन बचाया जा सकेगा। मधुमेह जांच प्रणाली और परीक्षण स्ट्रिप्स आईसीएमआर की वित्तीय सहायता से संपन्न शोध कार्य के परिणामस्वरूप बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी के हैदराबाद कैम्पस के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित रक्त ग्लूकोज़ मॉनीटरिंग प्रणाली 'क्विकचेक' और मुम्बई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान एवं बायोसाइंस द्वारा विकसित 'सुचेक' स्ट्रिप्स नामक युक्तियां विकसित की गईं। आज भारत में लगभग 13 करोड़ लोग मधुमेह पूर्व अवस्था अथवा मधुमेह से ग्रस्त हैं। स्वदेशी विकसित इन सस्ती युक्तियों और परीक्षण स्ट्रिप्स से मधुमेह की जांच और इसका निदान व्यापक पैमाने पर संभाव्य और वहनयोग्य है। ये युक्तियां मधुमेह की तेजी से बढ़ती चुनौतियों का सामना करने में भारत को आत्म-निर्भर बनाने की दिशा में शुरुआती कदम है। एलाइज़ा आधारित सीरम फेरीटिन आकलन किट यह लोगों में लौह की स्थिति, डिब्बाबंद भोजन तथा अन्य औषधियों / न्युट्रास्युटिकल्स में इसकी जैव उपलब्धता की जांच में सहायक है। यह लौह अल्पता जन्य अरक्तता अर्थात एनीमिया नियंत्रण कार्यक्रम को मज़बूत बनाने एवं लौह अल्पता जन्य आबादी में लौह की स्थिति की जांच के परिणामस्वरूप उसके स्तर को सुधारने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ड्राइड ब्लड स्पॉट (डीबीएस) संग्रह किट राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित डीबीएस संग्रह किट रक्त नमूना एकत्र करने तथा परिवहन के लिए क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के लिए एक सुविधाजनक विधि है। यह किट दूर दराज क्षेत्रों की आबादी में विटामिन ए की सब-क्लीनिकल कमी की जांच में सहायक है। इस किट से बच्चों को होने वाली असुविधा कम होती है। यह अंधता अनेक अन्य बीमारियों से बचाव के लिए कारगर है। इससे विटामिन ए की कमी वाली आबादी में इसे उपयुक्त मात्रा में सेवन करने की सलाह दी जा सकेगी और बड़ी संख्या में बच्चों को अंधता से बचाया जा सकेगा। पीसीआर आधारित रोगाणु (पैथोजन) जांच किट राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह किट भोजन और पानी में घातक बैक्टीरिया (जीवाणु) की त्वरित पहचान करने में कारगर, सुग्राही, विशिष्ट और किफायती है। यह समय, धन और श्रम बचाने में सहायक है। यह जांच किट खाद्य पदार्थों में घातक जीवाणुओं की त्वरित पहचान करके, उसे जीवाणु मुक्त बनाकर सुरक्षित रखने में मदद करेगी। इस तरह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों और इसकी वित्तीय सहायता में संपन्न शोध कार्यों के परिणामस्वरूप विकसित उपर्युक्त प्रौद्योगिकियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में सम्मिलित किए जाने के लिए तैयार हैं जो जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में अत्यन्त सहायक साबित होंगी।

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