मथुरा

एक सच्‍चे गांधीवादी नेल्‍सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति की सरकार से मानवाधिकार, स्‍वतंत्रता और अश्‍वेतों की भागीदारी हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाए। नेता के रूप में नेल्‍सन मंडेला की महात्‍मा गांधी, इटली के गरिबाल्‍डी और सोवियत संघ के लेनिन जैसे प्रखर सुधारवादियों से तुलना की जा सकती है। इन सुधारवादियों ने स्‍वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए जीवन पर्यन्‍त संघर्ष किया। मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका के शासकों की जातीय भेदभाव की रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष किया। उनके अथक संघर्ष से अश्‍वेत लोगों को समान अधिकार मिले। अश्‍वेत लोगों को समानता, स्‍वतंत्रता, मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार से वंचित रखा जाता था। नेल्‍सन मंडेला ने श्‍वेत शासकों के दमन का विरोध किया और उन्‍हें 27 वर्ष जेल में काटने पड़े। अंतत: 1990 में शीतकाल में प्रिटोरिया सरकार ने मंडेला को रिहा किया। भारत सरकार ने नेल्‍सन मंडेला को 1980 में नेहरू शांति पुरस्‍कार और 1990 में देश के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से नवाज़ा। भारत रत्‍न का सम्‍मान अब तक केवल दो विदेशियों को दिया गया है। डॉक्‍टर मंडेला से पहले भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सीमान्‍त गांधी खान अब्‍दुल गफ्फार खां को यह सम्मान दिया गया था। समूचे विश्‍व ने नेल्‍सन मंडेला की महान नेता के रूप में प्रशंसा की। इस नेता ने अफ्रीकी नेशलन कांग्रेस के साथ मिलकर अपने देश में अश्‍वेत नागरिकों की मुक्ति के लिए रचनात्मक विद्रोह शुरू किया। विश्‍व ने स्‍वतंत्रता के मंडेला के संघर्ष को मान्‍यता दी और उन्‍हें नोबेल शां‍ति पुरस्‍कार दिया गया। मंडेला स्‍वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए साहस और संघर्ष की प्रतिमूर्ति थे। उन्‍होंने दक्षिण अफ्रीका में सत्‍ता के सुचारू हस्‍तांतरण में सहायता दी और इस दौरान रक्‍तपात तथा नफरत से देश को बचाया। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ 18 जुलाई मंडेला दिवस के रूप में मनाता है।  बचपन-नेल्‍सन मंडेला का जन्‍म 18 जुलाई 1918 को हुआ था और वे वहां मादिबा के रूप में लोकप्रिय थे। उनके पिता तेम्‍बू जनजाति के मुखिया थे। नेल्‍सन मंडेला ने कानून के युवा विद्यार्थी होते हुए अल्‍पसंख्‍यक श्‍वेत शासन का राजनीतिक विरोध करना शुरू किया। नेल्‍सन मंडेला की युवाकाल में मुक्‍केबाजी में रूचि थी और उन्‍हें भारी वजन श्रेणी में रखा जाता था। उन्‍हे बाद में विद्यालय के शिक्षक ने अंग्रेजी नेल्‍सन नाम दिया जबकि उनके दादा का नाम मंडेला था। राजनीतिक संघर्ष-मंडेला 1942 में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में शामिल हुए और गतिशील युवा लीग की 1944 में सह-अध्‍यक्ष के रूप में स्‍थापना की। उनके पिता थेम्‍बू जनजाति के प्रमुख थे और थेम्‍बू नरेश के सलाहकार भी थे। नेल्‍सन मंडेला ने अश्‍वेत लोगों पर श्‍वेत शासकों के अत्‍याचारों का स्‍वयं अनुभव किया। वे 22 वर्ष की आयु में जोहान्‍सबर्ग पहुंचे जहां उनकी मुलाकात सक्रिय क्रांतिकारी वाल्‍टर सिसुलू से हुई। मंडेला ने कानून की पढ़ाई शुरू की। उन्‍होंने सिसुलू और ओलीवर ताम्‍बो के साथ मिलकर श्‍वेत शासकों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जिसे प्रिटोरिया प्रशासन ने कुचल दिया। अफ्रिकानर प्रभुत्‍व वाली नेशनल पार्टी की 1948 के चुनाव में विजय के फलस्‍वरूप जा‍तीय आधार पर अलगाव की रंगभेद नी‍ति को कानून बनाया गया। मंडेला 1952 में अवज्ञा अभियान और 1955 में कांग्रेस ऑफ द पीपुल आंदोलन के कारण अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में प्रमुखता से जाने जाने लगे। कांग्रेस ऑफ द पीपुल ने स्‍वतंत्रता के घोषणापत्र को स्‍वीकार किया जिससे रंगभेद नीति विरोधी प्राथमिक कार्यक्रम बनाया जा सका। शुरू में इसे अहिंसक व्‍यापक संघर्ष के प्रति वचनबद्ध रखा गया और मंडेला और उनके सा‍थियों ने मार्च 1960 में शार्पविले में निहत्‍थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी के बाद सशस्‍त्र कार्रवाई करने की पहल की। उन्‍होंने रंगभेद नीति समूह पर प्रतिबंध लगाने का भी विरोध किया। 1961 में वह अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सशस्‍त्र शाखा, उमखोंतो वी सिज्‍वे के कमांडर बने। इसके बाद अगले साल अगस्‍त में उन्‍हें गिरफ्तार किया गया और वे 5 वर्ष तक जेल में रहे। जून 1964 में उन्‍हें सशस्‍त्र कार्रवाई की योजना बनाने में शामिल होने के लिए आजीवन कारावास की सजा दी गई। उन्‍होंने कुख्‍यात रोबेन द्वीप जेल में कैदी के रूप में रहने की शुरूआत की और केपटाउन तट से दूर छोटे द्वीप में इस जेल में कड़ी सुरक्षा थी। उन्‍हें अप्रैल 1984 में केपटाउन में पोलसमूर जेल में भेजा गया और दिसम्‍बर 1988 में पारर्ल के निकट विक्टर वरस्‍टर जेल में रखा गया जहां से उन्‍हें बाद में रिहा किया गया।   27 वर्ष की जेल यात्रा-     मंडेला ने अपनी जेल यात्रा के दौरान अफ्रीकांस बोलना सीखा और वहां के इतिहास की जानकारी ली। मंडेला ने जेल में रहते हुए ट्रांसकेई क्षेत्र की स्‍वतंत्रता स्‍वीकार करने की बानतुस्‍तान नीति को स्‍वीकार करने और वहां जाकर बसने की सहमति देने के बदले में सजा माफ किए जाने की जेलरों की पेशकश ठुकरा दी। दक्षिण अफ्रीका और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर रंगभेद नीति के विरोधियों में प्रमुख मंडेला स्‍वतंत्रता और समानता के सांस्‍कृतिक प्रतीक बन गए। वे फरवरी 1990 तक जेल में रहे और उन्‍हें अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के सतत् अभियान और अंतर्राष्‍ट्रीय दबाव के कारण रिहा किया गया। दक्षिण अफ्रीका के राष्‍ट्रपति एफ डब्‍लु डि क्‍लार्क ने 2 फरवरी 1990 को अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और अन्‍य रंगभेद विरोधी संगठनों पर लगा प्रतिबंध हटाया। मंडेला को 11 फरवरी 1990 को विक्‍टर वरस्‍टर जेल से रिहा किया गया। 1993 में रंगभेद व्‍यवस्‍था को समाप्‍त करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मंडेला और राष्‍ट्रपति डि क्‍लार्क को संयुक्‍त रूप से नोबेल शांति पुरस्‍कार दिया गया। मंडेला ने 1994 में अपनी आत्‍मकथा- लोंग वाक टू फ्रीडम में 1980 और 1990 के दौरान हिंसा में डि क्‍लार्क के कथित रूप से शामिल होने और रक्‍तपात में अपनी पूर्व पत्‍नी विन्‍नी मंडेला के बारे में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं किया। उन्‍होंने हालांकि बाद में मंडेला: द ऑथोराइज्‍ड बायोग्राफी में इन मुद्दों पर चर्चा की। जेल यात्रा के दौरान जब उन्‍हें फरवरी 1985 में श्‍वेत  शासकों ने बातचीत के लिए आमंत्रित किया तो उन्‍होंने कहा कि केवल स्‍वतंत्र व्‍यक्ति ही बातचीत कर सकता है और कैदियों को समझौते या अनुबंध करने का कोई हक नहीं है। आपकी स्‍वतंत्रता और मेरी स्‍वतंत्रता को जुदा नहीं किया जा सकता। जेल यात्रा के बाद का जीवन-मंडेला ने जेल से रिहा होने के बाद अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का नेतृत्‍व फिर संभाला और 1990 और 1994 के बीच बहुदलीय वार्ता में अपनी पार्टी का नेतृत्‍व किया जिसके फलस्‍वरूप देश में पहले बहुजातीय चुनाव कराए गए। देश के पहले अश्‍वेत राष्‍ट्रपति के रूप में 1994 से 1999 के बीच उन्‍होंने अल्‍पसंख्‍यक रंगभेद नीति वाली सरकार से सत्‍ता के हस्‍तांतरण को सुचारू बनाया। इस दौरान दक्षिण अफ्रीका के उनके पूर्व श्‍वेत विरोधियों तथा अन्‍य ने मंडेला के नेतृत्‍व की प्रशंसा की। 1999 में राष्‍ट्रपति के पद से निवृत्‍त होने के बाद मंडेला ने कई सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों के मुद्दों की जोरदार वकालत की। वह महत्‍वपूर्ण मुद्दों पर अपनी प्रखर राय देते हुए सम्‍मानित वरिष्‍ठ नेता और विचारविद् बन गए। एड्स के विरूद्ध संघर्ष मंडेला की प्राथमिक चिंताओं में शामिल था और उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय मंच पर एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने का बीड़ा उठाया। उन्‍होंने एड्स पर काबू पाने के 46664 धन संग्रह अभियानों का समर्थन किया। ये संख्‍या उनके जेल में रहने के दिनों की संख्‍या के बराबर मानी गई। उन्‍होंने कहा कि एड्स के बारे में खुले तौर पर चर्चा की जानी चाहिए। उन्‍होंने 2007 में एक गैर-सरकारी संगठन द ऐल्‍डर्स के अंतर्गत विश्‍व के प्रमुख नेताओं, शांति समर्थकों और मानवाधिकार की आवाज़ उठाने वाली हस्तियों जैसे कि कॉफी अन्‍नान, जिमी कार्टर, इला भटृ, ग्रो हरलेम ब्रंडटलैंड और ली झाओझिंग के साथ मिलकर आवाज उठाई। इस संगठन का मकसद वरिष्‍ठ हस्तियों की सामूहिक बुद्धिमत्‍ता के इस्‍तेमाल से विश्‍व की कुछ समस्‍याओं का समाधान निकालना था। हालांकि उन्‍होंने पड़ोसी देश जिम्‍बावे को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर बहुत कम राय जाहिर की। जोहान्‍सबर्ग में 2010 के फीफा वर्ल्‍ड कप के समापन समारोह में वह अंतिम बार सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए। उन्‍होंने गरीबों और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए नेल्‍सन मंडेला फाउंडेशन की शुरूआत की।   पुरस्‍कार और सम्‍मान-   विश्‍व में स्‍वतंत्रता में मंडेला के योगदान के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने उन्‍हें अभूतपूर्व सम्‍मान दिया। महासभा ने नवम्‍बर 2009 में घोषणा की कि 18 जुलाई मंडेला के जन्‍म दिवस को मंडेला दिवस के रूप में मनाया जाएगा। मंडेला के 94वें जन्‍म दिवस पर 18 जुलाई 2012 को दक्षिण अफ्रीका के एक करोड़ बीस लाख स्‍कूली बच्‍चों ने विशेष रूप से तैयार किए गए गीत के जरिए उनको सम्‍मानित किया। मंडेला की मानवाधिकार और स्‍वतंत्रता के लिए उनके बलिदानों के कारण अंतर्राष्‍ट्रीय सराहना की गई। उन्‍हें 1980 में भारत द्वारा नेहरू शांति पुरस्‍कार दिया गया। उन्‍हें 1990 में भारत में सर्वोच्‍च नागरिक सम्मान भारत रत्‍न से नवाजा गया। नेल्‍सन मंडेला जातीय भेदभाव के खिलाफ मानवीय संघर्ष के प्र‍तीक बन गए। पूर्वी जर्मनी ने उन्‍हें स्‍टार आफ इंटरनेशनल फ्रें‍डशिप और वेनेजुएला ने साइमन बोलिवर पुरस्‍कार से नवाजा। उन्‍हें सखारोव पुरस्‍कार और मानवाधिकार पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया गया। नेल्‍सन मंडेला विरोधकर्ता, कैदी और शांति स्‍थापित करने वाले थे। उनका निधन 5 दिसम्‍बर 2013 को हुआ और यह दिन समूची धरती पर सभी मानवों के लिए स्‍वतंत्र रूप से जीने का जश्‍न बन गया। वह राष्‍ट्रपिता, अंतर्राष्‍ट्रीय आदर्श और महान व्‍‍यक्तित्‍व बन गए। उन्‍होंने ये साबित किया कि नेतृत्‍व करने वाले भले ही चले जायें लेकिन उनकी बुद्धिमत्‍ता कायम रहती है। उनकी करूणा, विनम्रता, देखभाल करने की भावना, सहनशीलता से सुनने और कहने के गुण मानवीय इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए हैं। नेल्‍सन मंडेला ने महात्‍मा गांधी की प्रशंसा की। महात्‍मा गांधी ने 1890 में दक्षिण अफ्रीका में समानता और स्‍वतंत्रता के अहिंसक संघर्ष की शुरूआत की थी। मंडेला 1999 में जब देश के पहले अश्‍वेत राष्‍ट्रपति के पद से निवृत हुए तब उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था और उन्‍हें विश्‍व में धर्मनिरेपेक्ष संत, मानवीय महानता के प्रतिरूप और शांति तथा बुद्धिमत्‍ता के आदर्श के रूप में सर्वाधिक सम्‍मानित व्‍यक्ति माना गया। वह अफ्रीका के इतिहास में ऐसे दुलर्भ व्‍यक्त्तित्‍व बन गए जिन्‍होंने एक कार्यकाल के बाद दूसरी बार राष्‍ट्रपति चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। अमरीका के जॉर्ज वाशिंगटन की तरह उन्‍होंने यह समझा कि वह हरेक कदम जो आगे बढ़ायेंगे वह अन्‍य लोगों के लिए अनुसरण का आधार बना जायेगा। मंडेला आजीवन राष्‍ट्रपति बने रह सकते थे लेकिन वह जानते थे कि लोकतंत्र में ऐसा उचित नहीं है। राष्‍ट्रपति के रूप में उनके निवृत्‍त होने के बाद उनके जीवन में दो बार राष्‍ट्रपति का चुनाव हुआ लेकिन उनके बाद राष्‍ट्रपति बनने वाले उनके बराबरी नहीं कर सके और यही लोकतंत्र है। मंडेला हर लिहाज से महान थे। मंडेला की यह विरासत है कि उन्‍होंने मानवीय स्‍वतंत्रता का दायरा विसतृत किया। वह हर स्थिति में सहनशील थे फिर भी उनमें कुरीतियों के प्रति सहनशीलता थी। नेल्‍सन मंडेला ने न्‍याय में आजीवन विश्‍वास किया।

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मुंबई: देश के शेयर बाजारों में सोमवार को बढ़त दर्ज की गई। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 167.44 अंक की बढ़त के साथ 25,809.00 अंक पर और निफ्टी 41.70 अंक की बढ़त के साथ 7,705.60 अंक पर खुला। वहीं, रिलायंस इडिया, एचडीएफसी, संनफर्मा, टाटा स्टील, एचडीएफसी बैक, कोल इडिया, डॉ.रेड्डी, हिरो होंडा, और महेंद्रा एंड महेंद्रा के शेयर में उल्लेखनीय बढ़त तथा वहीं,  हिंडाल्को, टाटा मोटर्स, और लॉसन व टुब्रो के शेयर में गिरावट दर्ज की गई।

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ब्रज में भोजपुरी किन्नरों ने अधिवेशन में लिया बड़चड़ के भाग -  बिहार से सबसे अधिक दिखे किन्नर -    मथुरा। सदियों से समाज, प्रशासन और सरकार की नजर में हिकारत की नजर से देखे जा रहे किन्नर समुदाय के लोगों में भी अपने अधिकार को लेकर जागरूकता का जजबा जागा है अपने अधिकारों और मूलधारा से जुड़ने के लिए अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश में लगभग दस करोड़ टी.जी. किन्नर समुदाय है जो पुराने समय की तरह मात्र नाचगाना या शादी विवाहों आदि जैसे शुभकार्यों में बधाई देने तक ही सीमित नहीं है, अब किन्नर देश के विधायक पालिकाध्यक्ष, नगरपालिका मैम्बर तक बनने लगे हैं और प्रशासन चलाने की प्रभावी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं, एक लम्बी लड़ाई के बाद तिसरे जेन्डर की मान्यता मिल सकी है। परन्तु अभी पूर्ण अधिकार की लड़ाई बाकी है। सामाजिक चर्चित संस्था जागृति फाउण्डेशन द्वारा किन्नर, हिजड़ों और एम.एस.एमों पर उनके अधिकारों, कर्तव्यों एवं स्वास्थ्य पर एक लम्बे समय से महत्वपूर्ण कार्य कर रही है, इनके अधिकारों को लेकर समाज और सरकार से एक अर्से से संघर्ष जारी है।  किन्नर समुदाय को हाईकोर्ट ने पुरुष-स्त्री के अलावा सभी सरकारी दस्तावेजों में तीसरा कालम टी.जी.यों. के लिए मान्यता दे दी है परन्तु मान्यता प्राप्त होने के बाद भी इनके साथ भेदभाव गैर सरकारी स्थानों के अलावा सरकारी महकमों में भी भेद किया जाता है जिससे देश के नागरिक करोड़ों की संख्या में किन्नरों का शोषण होता है और अपमानित होना पड़ता है ऐसी आधी अधुरी आजादी का क्या मतलब?  इस विषय को लेकर जागृति फाउण्डेशन ने प्रख्यात समाज सेविका श्रीमती डाॅली जान के निर्देशन में किन्नरों का अधिवेशन 20-21 जुलाई को नगर के मध्य स्थित किसान भवन के सभागार में आयेाजित किया गया। अधिवेशन का उद्घाटन प्रख्यात रंगकर्मी रंगाचार्य पं. लोकेन्द्रनाथ कौशिक ने भगवान अद्धनारीश्वर के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर किया। प्रस्तुत अधिवेशन में देश के कौने-कौने से किन्नर समुदाय के कार्यकर्ता सैकड़ों की तादाद में भाग लेने एक दिन पूर्व ही जमा होने लगे। सबसे अधिक जोश और जज्बंें के साथ बिहार के विभिन्न जनपदों से अधिवेशन में भाग लेने पधारे किन्नरों में देखा गया, गीत संगीत के साथ अधिवेशन का शुभारम्भ हुआ, विभिन्न वेषभूषा में किन्नरे सजे-धजे महफिल के आनन्द के साथ-साथ अपने अधिकारों के प्रति सचेत देखे गए, फाउण्डेशन के पी.ओ. सौरभ कौशिक के अनुसार पूरे देश में इसी प्रकार आधा अधिकार यात्रा और अधिवेशनों का दौर जब तक चलेगा जब तक किन्नरों को देश की मूलधारा से नहीं जोड़ा जाता है तथा उनके अधिकारों से उन्हें वंचित रखा जाए। इस अवसर पर बिहार से आयी सामाजिक संस्था दोस्ताना सफर व नगर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की ओर से भी अधिवेशन में पधारे किन्नरों का सम्मान स्वागत अभिनन्दन किया गया। चर्चित गीतकार डाॅ. नटवरनागर ने किन्नरों की पौराणिकता, प्रमाणिकता और महत्ता पर मलाहार प्रस्तुत की प्रख्यात रंगकर्मी रंगाचार्य कौशिक ने अपने उद्बोधन में किन्नरों के शोषण, उत्पीड़न और हिकारत भरे जीवन से लेकर अब उनके अच्छे दिन आने के वातावरण को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। इस अवसर पर किन्नरों के संघर्ष भरी जीवन यात्रा पर विचार व्यक्त दूरदर्शन मथुरा के पूर्व प्रभारी अधिकारी आर.के.त्रिपाठी ने किए, चर्चित समाज सेवी याकूँब खाॅ, चन्द्रशेखर शर्मा, रसिक बिहारी शर्मा, भगवान सिंह, विजय भारद्वाज, सुनील तरकर, मुनब्बर खाॅ, चन्द्रमुखी सखी, प्रियादासी, मथुरा के ख्याली किन्नरे, मुन्ना किन्नर, मैम्बर हासिया किन्नर, रेशमा किन्नर, काजल किन्नर, साधना किन्नर के साथ-साथ भारी मात्रा में मीडिया भी उपस्थित था।  

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मथुरा।  बीएसए इंजीनियंिरग एण्ड टैक्नोलाॅजी, मथुरा इलैक्ट्रीकल इंजीनियरिंग विभाग के आई.ई.ई.ई. स्टूडेण्ट ब्रांच चैप्टर को आई.ई.ई.ई. यूएसए की रीजन टेन द्वारा विद्यार्थियों के उत्कृष्ट कार्य हेतु अनुदान दिया गया है। इस सन्दर्भ में जानकारी प्रदान करते हुए इलैक्ट्रीकल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डाॅ0 असीम चन्देल ने बताया कि यह संस्था इस क्षेत्र में विशेष एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाले छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न तकनीकि क्रियाकलापों में सहयोग के लिए अनुदान देती है। इस संस्था द्वारा विश्वस्तरीय तकनीकि संसाधन छात्रों को प्रदान कराया जाता है ताकि वे अग्रणी होकर अपना भविष्य उज्ज्वल कर सकें। इस उपलब्धि पर संस्था के चेयरमैन माधव शरण अग्रवाल, वाईस-चेयरमैन प्रदीप अग्रवाल, निदेशक डाॅ0 सुधीर कुमार गोयल, रजिस्ट्रार भगवान सिंह सहित समस्त विभागाध्यक्षों, शिक्षकांे एवं कर्मचारियों ने हर्ष व्यक्त किया है।

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मथुरा। बाबा जाहरवीर गोगाजी की यात्रा ग्रामीणों ने जगह-जगह श्रद्धालुओं द्वारा फूलों से स्वागत किया। उत्साह से भरे बाबा के भक्तों ने भजन-संकीर्तन का आयोजन किया। इसमें रसिक गायकों ने लोकगीतों के माध्यम से बाबा के साथ युगल को रिझाया। भक्तिरस से सराबोर पदयात्री सायं वेला में उस्फार से आराध्य का ध्यान करते रवाना हो गए। बाबा के सेवक संयोजक सुरेश गोयल ने बताया बाबा की जन्मभूमि ददरेवा, सिद्वमुंख,भादरा होते हुए गोरखटीला गोगामेडी पहुंचेगी। यात्री बाबा के दरबार में 20 जुलाई को जागरण के साथ भंडारा का आयोजन करेंगे।   

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मथुरा। थाना राया क्षेत्र के ग्राम गौगा में गोलकुंआ के पास ताश के पत्तों से हारजीत की वाजी लगातें दो जुआरियों को नगदी व ताश के पत्तों के साथ बन्दी बनाया हैं। मिली जानकारी के अनुसार थाना राया में तैनात उपनिरीक्षक महेन्द सिंह चाहर ने क्षेत्र के ग्राम गौगा स्थिसल गोलकुआ पर ताश के पत्तों से हारजीत की वाजी लगाते हुए कल्लू उर्फ कलुआ पुत्र अली हुसैन, खारी कुआ कोतवाली मथुरा सहित उसके एक अन्य साथी को गिरफ्तार कर उसके कब्जें से 52 ताश के पत्तें व 550 रूपयें की नगदी सहित बन्दी बनाया हैं। राया। माँट फाटक तिराहे पर कई दिन पूर्व टूटी पड़ी पुलिया को अब तक सही नहीं कराया गया है, जिसके कारण क्षेत्रीय लोगों मे रोष व्याप्त है क्योंकि आये दिन दुपहिया बाहन चालकों के साथ घटनायें होती रहती हैं रास्ता भी वनवे बन गया है जिससे राहगीरों को भी जाम का सामना करना पड़ रहा है क्षेत्रीय लोगों ने पुलिया को जल्द ठीक कराये जाने की माँग की है।   

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