भारत संस्कृति प्रधान देश है। भारतीय संस्कृति मे व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नई प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संवहन करते है। इससे मानवीय मूल्यों की गतिशीलता बनी रहती है और साथ ही संस्कृति का पोषण तथा संरक्षण भी होता रहता है।
सनातन वैदिक परंम्परा मे प्रायः सभी देवताओं की जयंती मनाई जाती है। लेकिन, वैष्णवों मे मुख्य चार विष्णु जयंतीया रामनवमी, नृसिंहचर्तुदशी, कृष्णजन्माष्टमी एवं वामनद्वादयशी व्रत पर्व तथा उत्सव तीनों के रुप मे संयुक्त मनानें की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। वैष्णवमत मे उत्सव का मुख्य आधार विष्णु है और नृसिंह अवतार उनका राज्याधिकार से वंचित प्रहलाद की शीलसंपंता की लोकहित मे वृद्धि के कारण ज्ञातव्य है।
नरहरि नृसिंह जयंती वैशाख मास की शुक्ल चर्तुदशी को मनाए जाने वाला पर्व है। वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशाइया भगवान् विष्णु को सदा प्रिय है। नृसिंह चर्तुदशी भगवान का भक्त को सुख देने के लिए किए गए परिश्रम का अवतार है, इसी कारण यह तिथि और मास पुण्य का कारक है। नृसिंह प्रहलाद की भक्ति को सिद्धि करने के लिए प्रकट हुए थे जब हिरण्यकशिपु नामक दैत्य ने ब्रहमा के वरदान के मद मे समस्त प्रकृति को अपने आधीन कर लिया तब उसके मान मर्दन और प्रहलाद की रक्षा के लिए सर्वव्यापी नारायण ने नृसिंह का नरहरि रुप ले हिरण्यकशिपु का संहार किया और प्रहलाद को शीलव्रत की अनुकंम्पा करी।
नृसिंह चतुर्दशी एक उत्सव न होकर धर्म के आधार पर अर्थात् एक शासक को मात्र जन के लिए ही नीति बनाने और उसके पालन करने की मर्यादा के साथ जुडा़ हुआ है। समस्त मानव जीवन धर्म संस्कृति नीति के आधार पर ही एक सुत्र मे बंधा हुआ है। शासन की नीति ही सभ्यता, रीतिरिवाज, वेश- भूषा, रहन- सहन, खानपान, व्रतपर्व तथा त्यौहारों को जीवंत रखने मे सहायता करती है वरन उसका उन्नयन भी करती है। इसी को आधार मान कर विष्णु ने नरहरि नृसिंह का रुप हिरण्यकशपु के द्वारा प्रताड़ित प्रकृति की रक्षा के लिए यह अवतार लिया। हिरण्यकशपु ने आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति, रितुओं के चक्र यहां तक मानव की शिक्षा स्मृति और सामान्य लोकधर्म भी अपनी इच्छानुसार संपादित कर दिए जिससे समस्त प्रकृति का च्रक असंतुलित होकर मात्र सत्ता के आधीन होकर रह गया। तब नृसिंह ने शरीर संसार से संबंध विच्छेद करके अर्थात मै मेरा और मेरे लिए की धारणा का संहार करते हुए कर्मयोग ज्ञानयोग तथा भक्तियोग की पुनः पृथ्वी पर स्थापना की।
हिरण्यकशपु ने ब्रहा से जो वर मांगे अर्थात दिन रात्री मे मृत्यु न हो, बहार भीतर, अस्त्र शस्त्र, मानव दानव पशु किसी भी प्रकार से प्रकृति के नियमानुसार मृत्यु न हो इसी मिथक के अवकाश के लिए हरि ने संध्या के समय नरहरि का अवतार लिया इसीलिए नृसिंह चतुर्दशी के पर्व को संध्या के समय न दिन हो न रात हो के समय मनाया जाता है। ब्रजमंडल के प्रायः सभी मंदिरों व वैष्णव घरों मे नृसिंह चर्तुदर्शी को सायं शालिगा्रम शिला का पंचामृत अभिषेक, विष्णुसहस्त्रनामावली के मंत्र उच्चारण के साथ रात्री जागरण करके संपंन होता है। ब्रज मे जगह जगह गणेश वाराह नृसिंह के मुखौटे लगा कर गली गली नृत्यगान होता है जो पूर्णिमा तक चलता है। मृदंग की थाप पर समाज गायन यथा राग केदार,
सारंग, तोडी़ तथा नायकी कानडा़ के स्वरों के साथ नृसिंह जयंती का उत्सव संपूर्ण भारतवर्ष मे मनाया जाता है। पुष्टिमार्ग व निंम्बार्क सम्प्रदाय के मंदिरों मे आज से ही सुगन्धित पुष्पों से सजे फूल बंगलों की शुरुआत होती है जो पूरे गीष्म मे शीतलता का अनुभव कराती है।
व्रत यों तो धार्मिक होते है पर व्रत शब्द से तात्पर्य है आत्मशोधन के लिए किए गए विधिसम्मत उपायों को अपनी परंपरानुसार अपनाए रहना। नृसिंह चर्तुदशी व्रत उत्सव का प्रायोजन दुगुणों का निष्कासन एवं संस्कारों का उदयन है। संस्कार संस्कृति के मार्ग पर व्रत सहायक होते है क्योकि व्रतोत्सवों से संकल्पशक्ति का विकास होता है। जब भक्त प्रभू के सुख के लिये अपने मन की कामनाओं, अभिलाषाओं, उमंगों का विशेष उत्साह और हर्ष के साथ विनियोग करता है तो वह मनोरथ होता है जैसे भक्त प्रहलाद ने नरहरि नृसिंह के
लिए किया था कि वह भक्त के लिए पाषाण खंभ से प्रकट हो गए। वास्तम मे भक्त को रसस्वरुप प्रभु प्रतिक्षण अपने अलौकिक सौन्दर्यका, दिव्यातिदिव्य भावों और अर्थो का नया नया बोध करवाते रहते है।
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मधुकर चतुर्वेदी
M. 9917106816
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