भारत जल संकट के दौर से गुजर रहा है यघपि भारत मे प्रचुर जल संसाधन है लेकिन कोई भी ऐसा नही है जिसे आज मानवकृत प्रदूषण ने नहीं घेरा हो इसके बावजूद भारत की किसी भी राजनैतिक पार्टी ने नदी प्रदूषण के मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्र मे शामिल तक नहीं किया और जल संकट के सवालो से बचने की कोशिश मे ही लगे रहे यह हाल तो जब है कि देश की 16वीं लोकसभा का असल मुकाबला इन्ही नदियों के किनारे लड़ा जा रहा है। भारत की दो प्रमुख नदियों मे से गंगा किनारे से नरेंद्र मोदी तथा मथुरा से यमुना किनारे ड्रीम गर्ल हेमा मालनी मैदान मे है। इन दोनों स्थानों पर आज प्रदूषण के कारण नदी तो मर ही रही है साथ मे संस्कृति विरासते और हम भी धीरे धीरे मरने के कागार पर खडें है दोनो ही नदियां हमारे आध्यात्मिक सामाजिक धरातल को संभाले हुए है। यहां की पुरातात्विक धरोहर, पर्यटन सब कुछ खतरे मे है कितने ही आंन्दोलन हो चुके है और कितने ही वादे भी हुए लेकिन चौतरफा विकास में दावों के बाद भी स्वच्छ पेयजल की सार्वजनिक प्रणाली का आज भी हमारे पास नितांत आभाव है। आमतौर पर हर चुनाव मे नेता बिजली पानी सड़क के सपने दिखाते है और चुनाव जीतने के बाद पूरे पांच साल अपनी जुगाड़ सैट करने मे नजर आते है। लेकिन, इस चुनाव मे क्या सत्ता और विपक्ष दोनों के पास घोषणा पत्र से लेकर आधे चुनाव संपन्न होने के बाद तक नदी की निर्मलधारा को लेकर कोई रोड़मैप तक नही है। प्रदेश की सरकार जिसके पास अभी तीन वर्ष का समय है और जो मुस्लिम व पिछड़ा वर्ग वोट बैंक के सहारे चुनाव मे अपनी पूरी ताकत झौकें हुए है स्वच्छ जल के लिए उसके हाथ भी खाली है। अधिकतर मंत्रियों की फौज विधानसभा चुनाव मे मिले समर्थन को दुबारा दोहराने मे लगे है लेकिन नदी का दुर्भाग्य देखिए उसे यहां भी निराशा हाथ लगी । विधानसभा के चुनाव से पहले इन्ही नेताओं ने नदी आंदोलनों के दौरान उसे स्वच्छ बनाने की कसमे खाई लेकिन वह लैपटौप और भत्ते के सहारे "यूपी हुई हमारी अब दिल्ली की बारी" की कार्ययोजना को बल देने मे ही लगे रहे। जल की विड़म्बना तो देखें फतेहपुर सीकरी जिसे अकबर ने अपनी राजधानी बनाया उसे बावलियों, कुंओ तथा तालाबों से भरा, हम उस तकनीक का ही संरक्षण कर लेते तो फतेहपुर सीकरी के साथ आगरा के भी जल संकट को दूर किया जा सकता था इस क्षेत्र से अमरसिंह पानी के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है और कसमे खा रहे है कि एक बार जिता दो पानी ही पानी कर देगें मजे की बात यह है कि पूरे चुनाव में वह हमेशा की तरह फिल्मी सितारों को ही पानी पिलाते रहे। और चुनाव बाद उनका ही जल संकट दूर करेगें। गंगा और यमुना की निर्मल धारा के लिए वर्षो से आंन्दोलन पहाड़ से मैदान तक हो चुके है मुलाकातों के दौर भी हुए बात सुप्रीम कोर्ट भी हो आई लेकिन परंपरानुसार आई गई भी हो गई। कांगेस ने अपने घोषणा पत्र मे स्वास्थ्य का अधिकार आवास का अधिकार पेशन और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार की बात कही है। लेकिन, कही पर भी मरती नदी की जलधारा को निर्मल बनाने की बात तक नही है आखिर हो भी क्यों दिल्ली के केन्द्र मे दोनों जगह वर्षो से सरकार होने के बाद भी वह यमुना के संकट को दूर नही कर पाए वहीं भाजपा के नरेंद्र मोदी भी अपने भाषणों मे आर्थिक विकास के नए कदमो पर जोर दे रहे है। लेकिन, नदी की निर्मल धाराओं पर कोई ठोस नीति सामने लाने मे वह विफल रहे नामांकन के दौरान मात्र इतना कह देने से कि मां गंगा ने मुझे बुलाया है गंगा साफ नही हो सकती है इससे पहले मौजूदा सांसद मुरली मनोहर जोशी जिन्हे गंगा मां ने सबसे ज्यादा आर्शीवाद दिया जो इलाहाबाद वाराणसी वाया वर्तमान मे फिर से गंगा किनारे कानपुर से चुनाव लड़ रहे है कभी भी गंगा के लिए संसद मे विशेष कुछ नहीं करवा सकें। संस्कृतियों के पोषक होने का दम भरने वालों के सामने ही आज तीर्थयात्री नदी के आचमन को तरस रहे है परंम्परा, संस्कृति, पर्यटन, कारोबार नष्ट होने के नजदीक आ पहुंचा है और हम दलबदलुओं के सहारे ब्रांड़ इंडिया के निर्माण के सपने देख रहे है। देश मे कभी प्राकृतिक जल स्रोत के इतने बडें भंडार थे कि यदि सही नीति बनती तो देश के कई इलाकों मे पानी की शायद कभी कमी नहीं होती। नेता जिन नदी किनारों से चुनाव लड़ते है शायद उन्हे मालूम भी नही होता होगा कि उनके क्षेत्र मे कितने तालाब, कितनी बावडि़या रही होगी और कितनी बची है। इन्होने संसद के आस पास चलते फब्बारों और हरियाली से भरपूर दालानों को देखकर भी नहीं समझा कि देश का वातावरण भी कभी इससे भी मनोरम था कितनी खुशहाली जल को प्रदूषण से मुक्त करने से हो सकती है। इनको विलुप्त होने से बचाने से भूजल स्तर को भी बढाया जा सकता है। आज इजराइल जैसे 25 सेमी से कम वर्षा वाले देश मे भी लोगों को पानी की उस किल्लत का सामना नही करना पड़ता जैसा भारत मे 121 सेमी से अधिक वर्षा पर करना पड़ता है, जहां पर जल के विपुल भंण्डा़र होने पर भी जनता और जीव मरने सड़ने को मजबूर होते है। देश के हर हिस्से मे नदियों मे प्रदूषण खतरनाक स्थिति मे है कुंओ,तालाबों,बावडी़ को पाट उन पर कब्जा करवाया जा रहा है और बाकी बचे जल सोत्रों का भी पाटन धड़ल्ले से किया जा रहा है। इसका एक ही कारण मुख्य है कि सरकारों ने आज तक नदी के महत्व को नही समझा और उसे मृतपाय ही रहने को छोड़ दिया। भारत भले दुनियां की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हो लेकिन नदी प्रदूषण को दूर करने मे तथा शुद्व पेयजल की सुविधा के मामले मे हम आज भी अविकसित देशों के ही ज्यादा करीब है । पानी की बढती किल्लत और दूषित जलधाराओं से जीवन संकट मे पड़ने,संघर्ष के नए क्षेत्र उभर कर सामने आ रहे है सरकार के साथ आम जन को भी नदी के किनारे जाना ही पडे़गा। लेखक मधुकर चतुर्वेदी
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