सोचो कहीं ऐसा हो तो क्या हो ? हेमा जी कभी रोड शो में वृन्दावन जायें, बन्दर चश्मा ले जाये और छत पर चढ़ जाये । बात लगभग 15-20 वर्ष पुरानी है, बहुत पुरानी भी नहीं है किन्तु बहुत ही गंभीर समस्या से सम्बन्धित है। इस समस्या की ओर न तब जन-प्रतिनिधियों और शासन-प्रशासन की रुचि थी और न आज है। वृन्दावन के विद्वान आचार्य प्रवर श्रीवत्स गोस्वामी इसके साक्षी हैं। इन्डियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिन्टन ( अमेरिका ) के प्रोफेसर डेविड हैबरमैन की विभिन्न धार्मिक आचार्यों विशेष रूप से चैतन्य सम्प्रदाय के रूप गोस्वामी के ग्रन्थों के प्रति खोज पूर्ण दृष्टि थी। वह अमेरिका से वृन्दावन आकर आचार्य श्रीवत्स जी के निर्देशन में कार्य करते थे। उन्होंने रूप गोस्वामी के भक्ति रसामृत सिन्धु का अंगे्रजी में अनुवाद किया था। उनके ब्रज चैरासी कोस की यात्रा, ब्रज के वृक्षों, प्रदूषित यमुना ( पोल्यूट यमुना ) आदि ब्रज सम्बन्धी ग्रन्थों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रज को प्रतिष्ठा प्रदान की थी। प्रो. डेविड हैवरमैन शोध कार्य के लिए प्रायः अमेरिका से वृन्दावन आते थे और आचार्य श्रीवत्स गोस्वामी जी के श्री चैतन्य प्रेम संस्थान में बैठकर अध्ययन किया करते थे। इस साधना में उन्हें सबसे अधिक कष्ट बन्दरों से होता था जो उनके मंदिरों के दर्शन करने जाते समय उनका चश्मा खींच ले जाते थे और तोड़ देते थे। उनका मुँह बन्दरों की खरौंच से भरा रहता था। वह एक दिन इतने दःुखी हुए कि मथुरा के तत्कालीन जिलाधिकारी श्री सदाकान्त से अपनी व्यथा बताते हुए रो पड़े थे। इन्हीं दिनों श्री स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी सहित 600 धर्मगुरुओं के हस्ताक्षरों से जिलाधिकारी मथुरा को ज्ञापन देकर बन्दरों के आतंक से मुक्ति दिलाने की माँग की गई थी। जिलाधिकारी महोदय ने वृन्दावन के हर आदमी से जुड़ी इस समस्या के निराकरण के गम्भीरता पूर्वक प्रयास किए और दिल्ली की पर्यावरण की एक संस्था से जुड़ी इकबाल मलिक नामक महिला के निर्देशन में 700-800 बन्दरों को पकड़ा गया। इन्होंने ही केन्द्रीय सचिवालय को बन्दरों के आतंक से मुक्त कराया था। बाद मंें कुछ स्थानीय लोगों के विरोध के कारण बन्दरों का पकड़ा जाना रुक गया । ज्ञानदीप के सचिव कक्ष में कुछ प्रबुद्ध जनों के मध्य यह चर्चा कर रहा था कि मेरे एक अतिथि ने बदहबाश सी स्थिति में प्रवेश किया। उन्होंने रुआँसा होकर बताया कि वह वृन्दावन में सेवा कुँज के दर्शन करके आ रहे थे कि बन्दर ने उनका चश्मा खींच लिया और दाँतों से चबाकर यह स्थिति कर दी, बेटी के हाथ से बिहारी जी के प्रसाद का डिब्बा भी खींच लिया। अतिथि महोदय की व्यथा-कथा सुनकर मैंने कहा कि सभी लोकसभा प्रत्याशी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने, भ्रष्टाचार मिटाने, हाईकोर्ट बैन्च स्थापित करने, हवाई अड्डा बनवाने आदि की हवाई बातें तो कर रहे हैं किन्तु जनता को हर दिन होने वाली इस कठिनाई को दूर करने की ओर ध्यान नहीं है । बन्दरों के आतंक की समस्या वृन्दावन में विशेष है किन्तु पूरे जनपद में यह भीषण समस्या व्यापत है। बन्दरों के भय से छत से गिर जाने से मृत्यु, कपड़े फाड़ देना आदि अनेक कष्ट स्थानीय निवासी रोज सहते हैं और असहाय स्थिति में हैं। इसी समय वहाँं उपस्थित कवि राधा गोविन्द पाठक ने कहा कि यदि उनकी लोकसभा प्रत्याशी हेमा मालिनी से भेंट हुई तो वह उनसे अनुरोध करते हुए कहेंगें- सोचो कहीं ऐसा हो तो क्या हो ? हेमा जी कभी रोड शो में वृन्दावन जायें, बन्दर चश्मा ले जाये और छत पर चढ़ जाये । मुँह को बनाये, हेमा जी को चिढ़ाये, कोई बिस्कुट दिखाये कोई लड्डू खिलाये । फिर भी टूटा-फूटा चश्मा छोड़कर के जाये । हास्य-व्यंग के दिग्गज और राहु, केतु, शनि के प्रथम अक्षर नामधारी कवि डाॅ. राकेश शरद ने कहा कि यदि उन्हें हेमा जी की ’लिफ्ट‘ मिली तो वह उनसे अनुरोध करेंगे कि वृन्दावन के बन्दरों को मुम्बई की चैपाटी पर ले जायें- हे माँ, आप बाजार से गुजरें, और बन्दर आ जायें । वोटों की भीख माँगने में, कहीं आपका चश्मा ले जायें । नीचे हो मुम्बई की बाला, ऊपर से गुर्राबें हनुमत लाला । अब वोट कैसे माँगे जायें, पहलेे चश्मा नीचे तो आये । फिर ले जाऊँगी मुम्बई चैपाटी । और इस हिम्मत से मेरी विरोधी भाग-भाग जायें । श्रीमती वन्दना सिंह कवयित्री नहीं, संगीत कलाकार हैं किन्तु डाॅ. राकेश शरद की कविता सुनकर उनका गीत फूट पड़ा- वोट तो देंगे जभी हम, काम जो करोगी हमारा तुम । वादा ये करके जाना, वादे को पूरा निभाना ।। वृन्दावन के बन्दर शैतान हैं, पर थोड़े से ये नादान हैं । यमुना प्रदूषित हुई है, इन्हें समुद्र नहाने की बेचैनी हुई है ।। चैपाटी इन्हें ले जाना, ऐक्टर भी हैं, जरा फिल्माना पर चश्मा सँभाल कर रखना, कहीं बन्दर ले न जायें । कन्धे पर लपक के चढ़ के, कहीं छाता ले न जायें ।। वहीं बैठे डाॅ. जगदीश लवानिया हाथरसी अन्दाज में बोले- हेमा निधिवन से चलीं, गली-बाजार आ जायें । वोटर की भूल-भूलैया में, बन्दर चश्मा ले जाय । बिना चश्मा बसन्ती घबड़ाये, क्या करे कुछ भी समझ न आये ।। हिन्दी के युवा गीतकार श्री जितेन्द्र विमल ने अपनी कल्पना को ब्रजभाषा में कुछ इस प्रकार साकार किया- वृन्दावन के बन्दर हैं शैतान बड़े । करें हैं अच्छे- अच्छन के कान खड़े ।। बन्दर.........हेमा जी कौ सुन्दर, इक चश्मा लै गयौ, बदले में हेमा के हाथन सौं केला ज्यैं गयौ । जि बन्दर का जाने ? कि हेमा कौ नाम बड़ौ है । चूँकि इनकौ उनते कोई न काम पड़ौ है ।। तोय मालुम नाँय बन्दर के बच्चा, तेरौ हल्ला है गयौ । बन्दर............हेमा जी कौ सुन्दर, इक चश्मा लै गयौ ।। इसी मध्य इस ‘‘ हा-हा-हू-हू‘‘ गोष्ठी में एक नहीं अनेक रस वृष्टि करते हुए श्री सबरस मुरसानी प्रकट हुए और उन्होंने- बिहारी जी धर्मेन्द्र न जा सके, और हेमा को भी दर्शन न मिल सके । हम तुम निधिवन में संग हों, बन्दर चश्मा ले जाय । सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ? बन्दर से कहूँ चश्मा ले जाय, पर वोट मुझे दे जाय । आगे हों वोटर की टोलियाँ, पीछे खों-खों बंदर की बोलियाॅं । जयकारे भूलकर वोटर, दबायेंगे कंकड़-गुलोलियाँ बन्दर से कहूँ तू छोड़ चश्मा, रूपया-मिठाई मुझसे ले जाये पर वोट मुझे दे जाय ।। मुरसानी जी थमे तो उन्हीं की कद-काठी के हास्य-व्यंग कवि पदम अलबेला जी आ जमे और उन्होंने अपने नाम पदम ( कमल ) के अनुरूप हेमा मालिनी का कमल खिलाने की शुभ कामना व्यक्त की- जैसे ही हेमा मालिनी गईं मन्दिर के द्वार । एक बन्दर ने तुरंत ही, चश्मा लिया उतार ।। चश्मा लिया उतार, देख ये नया करिश्मा ।। कहैं बसन्ती बन्दर से दिलवादो चश्मा ।ं कोई उसको बिस्कुट-टाॅफी खिला रहा था । और कोई तो ‘कोल्ड डिंªक‘ भी पिला रहा था ।। एक कार्यकर्ता ने, उनसे कही यह बात । यही हादसे यहाॅं पर होते हैं दिन-रात । इन्हें पकड़वा कर पहले मुम्बई पहुॅंचाओ । इन दुष्ट बन्दरों से हम सबका पिन्ड छुड़वायें । फिर देंगे तुम को वोट, आपका कमल खिलायें ।। और हास्य-व्यंग के सशक्त हस्ताक्षर श्री वरूण चतुर्वेदी ने भी हेमा मालिनी से यही कहा कि आपको वोट तभी मिलेंगे जब आप बन्दरों को अपने साथ मुम्बई ले जायें - अरे हाय-हाय वृन्दावन के बन्दर, लगते हैं ये जैसे कलन्दर । सोचो कभी दौड़कर ये आयें, छीन के जो चश्मा लेकर जायें । ़ तब तुम ‘फील’ कैसा करोगे ? कोई इनसे बचाये । हेमा मालिनी यहाँ पर आईं, वोटों की जो दे रही दुहाई । सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ? हेमा जब मुम्बई को जायें, इन्हें साथ अपने ले जायें । पैरोडी से श्रोताओं को लुभाने वाली कवयित्री चेतना शर्मा की चेतना जागी तो वह गा उठीं- चालू हंै ये वृन्दावन के बन्दर, राम जी की सेना के कलन्दर । टूट पड़ते हैं आसमान से, चश्मा लेकर उडं़े हनुमान से । सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ? अब तुम ठगे सोचते रहोगे, चश्मा वापस कौन लाये ? हेमा जी चुनाव में खड़ी हैं, वोट माँगने पै ये अड़ी हैं । वोट भी तभी तो ये पायेंगी, जान बन्दरों से जो ये बचायेंगी, सोचा कभी ऐसा हो तो क्या हो ? एम.पी. जब हेमा बन जायें, सब को बन्दर से भी बचाये । सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ? आगरा के युवा व्यंगकार पवन आगरी ने ‘वानर‘ के माध्यम से यह भावना व्यक्त की है कि हेमा मालिनी ब्रज मे ंरहकर विकास की यमुना प्रवाहित करें - बसन्ती सवार होकर धन्नों पर चली, पर ब्रज की गलियों में उसकी एक न चली । एक चंचल वानर उसका चश्मा ले जाये । गोरे मुखड़े वाली चतुर नार खूब गुहार लगायें । पर अब तो वो वानर भी अपनी आँख दिखाये । बसन्ती तुम अब मेरी ब्रजभूमि में रहोगी, ये वचन निभाना होगा । वीरू के साथ मिल के विकास की, यमुना को बहाना होगा । जने-माने हास्य कवि- ‘लाफ्टर चैम्पियन‘ , ‘असरदार-सरदार प्रताप फौजदार ने चुटीला व्यंग सुनाया- चश्मे के लिए दिल न दुखाओ और ला देंगे हम बन्दर ले गया तो ले जाने दो -2 चश्मे के लिए दिल न दुखाओ और ला देंगे हम चश्मा तो क्या चश्मे वाला भी ला देंगे हम कुछ भी हो जाए तेरे लिए सब कुछ लुटा देंगे हम एक नहीं कई जुटा देंगे हम मैडम सोचो न कुछ बिल्कुल आगा-पीछा भी देखो न बिल्कुल बन्दर ले गया तो ले जाने दो बन्दर से मैडम चूँ न घबराओ मार भगा देंगे हम चश्मे के लिए दिल न दुखाओ और ला देंगे हम दसियों बन्दर लगायेंगे नारे, आगे पीछे चलेंगे सारे विरोधियों को घुड़की से भगा देंगे हम चश्मे के लिए दिल न दुखाओ और ला देंगे हम।। सभी कविगण ने मोहन स्वरूप भाटिया से कहा कि आप भी कुछ सुनाइये । उन्होंने कहा कि कविता तो उनसे कोसों दूर रही है । कुछ तुकबन्दी सुन लीजिये- हेमा जी निधिवन से निकलीं, बन्दर चश्मा ले जाये । इधर, कभी उधर को देखें, कुछ समझ न आये । तभी बन्दर यौं चिल्लाया- बिना तोड़े जो चश्मा चाहो तो एक वायदा होगा निभाना, हमें नहीं कभी भी पकड़वाना । एम.पी. बन जाओ तो साथ ले चलना, आप वहाँं खूब बँगले में रहना । हम बँगले के पिछवाड़े रह लेगे, आप जो खायें वही खा लेंगे । गार्ड हटा देना, रखवाली कर लेंगे । आप हमारे गुन गायें, हम आपके गुन गायेंगे । अन्त में सभी कविगण ने एक स्वर से कहा कि कवि समाज के प्रहरी हैं। बन्दरों के आतंक से जन-जन दुःखी है। हेमा मालिनी ही नहीं सभी लोकसभा प्रत्याशियों को इस सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक समस्या के निराकरण के लिए पहल करनी चाहिए। ( मोहन स्वरूप भाटिया ) संलग्न: चित्र क्रमश: राधा गोविन्द पाठक, डा. राकेश शरद, वन्दना सिंह, जितेन्द्र विमल, सबरस मुरसानी, पदम अलबेला, वरुण चतुर्वेदी, मोहन स्वरूप भाटिया
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