प्रमोद कुमार पांडेय
गुजरात के मुख्यमंत्री और एनडीए की ओर से पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बढ़त में बीजेपी, संघ, लालकृष्ण आडवाणी का चाहे जितना योगदान रहा हो, वह तो है ही! नरेंद्र मोदी की सफलता, टीआरपी में ''सेकुलर'' दलों और नेताओं का भी बड़ा योगदान है!
नरेंद्र मोदी मुद्दा बन चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव का मुद्दा क्या है? यूपीए-2 की असफलता, महंगाई और भ्रष्टाचार? नहीं जी, यह चुनाव 'गुजरात' पर लड़ा जा रहा है! केंद्र में 10 साल से जिनके नेतृत्व में सरकार चल रही है वे ''स्थितप्रज्ञ'' मुद्रा में हैं! चुनाव में वह कहीं नहीं हैं!
ऐसा लग रहा है कि 'गुजरात' से ही 10 साल से सरकार चल रही है। मोदी भी 'गुजरात' पर वोट मांग रहे हैं। सभी मोदी से लड़ रहे हैं। क्या यह मान लिया गया है कि मोदी पीएम पद के सबसे बड़े लड़वैया हैं?
आम आदमी पार्टी के निशाने पर भी मोदी हैं। मानो पिछले 10-12 सालों से वह ही तमाम समस्याओं के जड़ में हों! हमारी समझ से राहुल या सोनिया के खिलाफ उन्हें (अरविन्द केजरीवाल को) खड़ा होना चाहिए! क्या गुजरात के मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं केजरीवाल?
''सेकुलर'' भगदड़ से नरेंद्र मोदी को ही फायदा होगा! सभी सेकुलर हैं। यहां तक कि अडवाणी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह! बस मोदी ''सांप्रदायिक'' हैं! अब बताइए 'मोदी ' के संरक्षक रहे आडवाणी से ''सबसे बड़े सेकुलर'' नीतीश कुमार को कोई दिक्कत नहीं है जबकि उन्हें बढ़िया से पता होगा कि 2002 में अटल की चली होती तो मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया होता! यह आडवाणी का वीटो पॉवर था कि मोदी बच गए। बच गए तो यहां तक पहुंच गए। अगर उसी समय हटा दिए गए होते तो ‘उमा भारती’ बन गए होते!
ऐसे में मोदी अगर बोल रहे हैं कि सब मिलकर उन्हें रोकने पर लगे हैं तो सहानुभूति वोट भी मिलेगा मोदी को। गुजरात में तो मिला भी है। अगर… अगर.. सचमुच मोदी जीत जाते हैं तो उन्हें आभार प्रकट करना चाहिए नीतीश को, दिग्विजय सिंह को, मायावती को, मनीष तिवारी और कपिल सिब्बल को। हां! राहुल और केजरी को भी!
इसी मोदी क्रम में मुस्लिम समुदाय की बात करें तो कुछ सवाल उभरकर आते हैं।
भारतीय मुसलमानों की दशा-दुर्दशा में कांग्रेस और ‘सेकुलरों’ का बड़ा हाथ रहा है। उनकी रोजी-रोटी, शिक्षा, बेकारी, बीमारी को नजरअंदाज़ कर बस उन्हें ''वोट'' मात्र बना दिया गया है। प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857) से स्वतंत्रता प्राप्ति तक (1947) भारतीय मुसलमान देश की मुक्ति के लिए कंधे-से-कंधे मिलाकर लड़े। मातृभूमि के लिए कुर्बान हुए।
आजादी के बाद भी विभाजन और अन्य अनेक चुनौतियों से निबटने में एक नागरिक की तरह, राष्ट्रभक्त की तरह उनके योगदान अन्यतम हैं। इसके लिए किसी दल और नेता के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है।
2014 के आम चुनाव के सन्दर्भ में देखें तो मुसलमानों को किसी राजनीतिक दल की तरह मीडिया द्वारा बांचा जा रहा है। मोदी बनाम राहुल, मोदी बनाम केजरीवाल, मोदी बनाम माया, मोदी बनाम मुलायम, मोदी बनाम नीतीश, मोदी बनाम… सभी आदि तो समझ में आने वाली बात है। पर, मोदी बनाम मुसलमान का क्यों जबर्दस्ती पाठ किया जा रहा है? क्या कभी मोदी बनाम सिख, मोदी बनाम जैन, मोदी बनाम ब्राह्मण, मोदी बनाम यादव का पाठ किया जाता है? जयललिता, नवीन पटनायक, नीतीश, ममता को मुख्यमंत्री बनानेवाली जनता कौन है? क्या वे सभी मुसलमान हैं? क्या वे सभी सिर्फ एक जाति-समुदाय के हैं? …तो फिर मोदी बनाम बंगाली, मोदी बनाम पटनायक का पाठ क्यों नहीं किया जाता है। …और यदि कभी किया जाता है तो जैसे एक वर्ग को लांछित करके किया जाता है वैसे ही किया जाता है? लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी को मुस्लिम वोट नहीं मिलते थे? क्या राजस्थान में दो मुस्लिम विधायक बीजेपी से नहीं चुने गए हैं? …और यदि मुस्लिम बीजेपी को वोट नहीं देते तो आप यह विचार क्यों नहीं रखते कि बीजेपी कितने मुसलमानों को टिकट देती है!
आखिर, देश में संघ और बीजेपी के बिना सरकार नहीं बनती है क्या? यूपीए, सपा, बसपा, जयललिता, ममता, माणिक सरकार आदि अनेक नेता और दल संघ के कारण थोड़े ही हैं। या फिर सिर्फ एक जाति, समुदाय के बल पर चुनाव जीत कर आए हैं?
क्या मोदी के पहले मुस्लिमों की सारी समस्याएं दूर हो गई थीं? मुस्लिम समुदाय दूसरे लोगों की तरह जिसे चाहे, उसे वोट क्यों न करे?
अगर सभी बहुसंख्यक बीजेपी को वोट देते ध्रुवीकरण के आधार पर तो फिर बीजेपी की हर जगह सरकार होती! प्रायः हर राज्य में। जबकि अनेक दक्षिण, उत्तर-पूर्वी राज्यों में बीजेपी खाता भी नहीं खुलता।
भारतीय जनता पार्टी के आज के ''राम'' (एनडीए वाले पासवान) जब बिहार का मुख्यमंत्री मुस्लिम को बनाएंगे की जिद ठाने हुए थे उस समय उनके साथ लादेननुमा (लेआउट डिज़ाइन में) एक मुस्लिम नेता उनके साथ होते थे। पता नहीं आज वे कहां हैं! मानों मुस्लिम के आदर्श लादेन ही हों।
बनारस जैसे ''समुद्र संगम'' की नगरी जो ब्राह्मण ही नहीं श्रमण धारा का भी प्रमुख केंद्र रहा है। तुलसी ही नहीं कबीर और रैदास को भी अपने पेटे में समेटे हुए हैं। भारतेन्दु से लगायत प्रेमचंद, आचार्य शुक्ल, प्रसाद, बिस्मिल्लाह खान जैसे मनीषियों की परम्परा जहां रही हो, उसे धर्म के चस्मे से मीडिया माध्यमों द्वारा खेला -ताना जा रहा है। गंगा -जमुनी संस्कृति की तान को किस चस्मे से देखा जा रहा है?
अरे भाई, मोदी या तो चुनाव लड़ने के योग्य हैं या नहीं हैं! क्या चुनाव आयोग ने कुछ नया प्रावधान कर दिया है कि मोदी ही बनारस से लड़ सकते हैं राहुल नहीं?
ध्रुवीकरण में नेताओं का जो महान योगदान है वह तो है ही मीडिया का भी महान अवदान है... खास कर टीवी मीडिया का! मीडिया की मूर्खता, दृष्टिहीनता खूब दिख रही है टीवी पर। मोदी और बनारस पर तो पूछिए ही नहीं !
'' कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ? '' (कबीर )
(Samiksha Bharti News Service)
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