दीपावली बीत चुकी है और आज आ गया है गोवर्धन। आज के दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा का रिवाज है। यह प्रथा द्वापर युग से चली आ रही है। यह पर्व दिवाली के ठीक एक दिन बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। वैसे तो शहरों में इस पर्व का महत्व थोड़ा कम हो गया है लेकिन अन्नकूट के जरिए इस प्रथा को अब तक जारी रखा गया है। इस दिन गायों की भी पूरा होती है क्योंकि शास्त्रों में गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। जिस तरह देवी लक्ष्मी सुख समृद्धि प्रदान करती है, ठीक उसी तरह गाय माता भी हमें अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती है।
क्या है पूजा की विधि
इस पूजन में घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धननाथ जी की अल्पना बनाकर उनका पूजन करते हैं। गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पानी, रोली, चावल, फूल दही और तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं और साथ में परिक्रमा की जाती है। गोबर्धनजी एक पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं। इनकी नाभि की जगह पर अक कटोरी या मिट्टी का दीपक रखा जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे पूजा के समय डाले जाते हैं। बाद में इसे प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है। गोवर्धन में ओंगा यानि अपामार्ग की डालियां जरूर रखी जाती हैं। इसके बाद ब्रज के साक्षात देवता माने जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।
पूजा करने के बाद गोवर्धनजी की परिक्रमा की जाती है। सात परिक्रमाएं करते वक्त उनकी (गोवर्धनजी की) जय बोली जाती है। परिक्रमा करते समय एक व्यक्ति हाथ में पानी का लोटा और दूसरे हाथ में खील लेकर चलते हैं। जल लेकर चलने वाला व्यक्ति पानी की धारा गिराते हुए और दूसरे लोग जौ बोते हुए परिक्रमा करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में गाय बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल मालाएं धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है और गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है।
क्या किया जाता है इस दिन
अन्नकूट में चंद्र अन्नकूट में चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है। यदि प्रतिपदा में द्वितीया हो तो अन्नकूट अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन सुबह तेल मलकर स्नान करना चाहिए। इस दिन पूजा का समय कहीं सुबह, कहीं दोपहर तो कहीं शाम के समय है। इस दिन शाम को दैत्यराज बलि का पूजन भी किया जाता है।
तीन उत्सवों का संगम
आज का दिन तीन उत्सवों का संगम होता है। इस दिन दस्तकार और कल-कारखानों में काम करने वाले कारीगर भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी करते हैं। इस दिन सभी कल-कारखाने तो बंद रहते ही हैं, घर पर कुटीर उद्योग चलाने वाले कारीगर भी काम नहीं करते। भगवान विश्वकर्मा और मशीनों एवं उपकरणों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है।
यह है गोवर्धन की पूजन व्रत कथा
गोवर्धन पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। उससे पूर्व ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी, लेकिन भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को तर्क दिया कि इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं प्राप्त होता। वर्षा करना उनका कार्य है और वह सिर्फ अपना कार्य करते हैं, जबकि गोवर्धन पर्वत गौधन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है जिससे पर्यावरण भी शुद्ध होता है। इसलिए इंद्र की नहीं गोवर्धन की पूजा की जानी चाहिए। इसके बाद इंद्र ने ब्रजवासियों को भारी वर्षा से डराने का प्रयास कियाए लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर सभी गोकुलवासियों को उनके कोप से बचा लिया। इसके बाद से ही इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधान शुरू हो गया है। यह परंपरा आज भी जारी है।
साभार-khaskhabar.com
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