साहित्य / मीडिया

कुछ रोज़ पहले, क्रिकेट खिलाड़ी अश्विन रवि चंद्रन ने चेन्नई में एक छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा न मानते हुए सिर्फ राष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा बताया। तमिल नाडु में भारतीय जनता पार्टी का भी यही मानना रहा है...

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पिछले हफ्ते, बीजापुर के एक युवा स्वतंत्र पत्रकार मुकेश चंद्राकर की चौंकाने वाली हत्या ने भ्रष्टाचार को उजागर और संघर्ष से प्रभावित, खासकर माओवादी क्षेत्रों में ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के सामने आने वाले गंभीर खतरों को एक बार फिर सामने रखा है...

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भारत जैसे खुले लोकतांत्रिक समाज में, मास मीडिया कई तरह की भूमिकाएं निभाता है। यह एक निगरानीकर्ता के रूप में कार्य करता है, सत्ता को जवाबदेह बनाता है, और सरकार और जनता के बीच एक पुल का काम करता है। 

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लंबे समय से शास्त्रीय पत्रकारिता के अध्येता कहते आ रहे हैं कि पत्रकारों को न तो किसी के पक्ष में बोलना चाहिए और न ही किसी के विरोध में। मतलब एक पत्रकार को ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। लेकिन, हाल के वर्षों में हमारे देश की मीडिया बेवजह की बहस में पड़कर विभिन्न मुद्दों पर लगातार पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती आ रही है...

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दीपावाली के अवसर पर अधिकांश त्योहारी बधाई और शुभकामना संदेश अज्ञान के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करने की बात करते हैं। लेकिन हकीकत में, वर्तमान युग में आस्था और भक्ति के नाम पर रूढ़िवादिता, पाखंडी अंधविश्वास और संकीर्णता को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह देखने की होड़ लगी हुई है कि कौन सबसे ज्यादा नफरत, द्वेष और दूरियां बढ़ा सकता है...

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हाल ही में, आगरा नगर निगम ने जॉन्स पब्लिक लाइब्रेरी का नाम बदल दिया, लेकिन पाठकों को आकर्षित करने और पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कोई कार्यक्रम घोषित करने में विफल ही रहा।

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