अक्सर यात्राएं हमें वह सच दिखा देती हैं जो नेताओं के भाषणों और अख़बारों के संपादकीयों में नहीं मिलता। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर मिलने वाले अनजान सहयात्री कई बार समाज का सबसे सटीक आईना साबित होते हैं...
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अक्सर यात्राएं हमें वह सच दिखा देती हैं जो नेताओं के भाषणों और अख़बारों के संपादकीयों में नहीं मिलता। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर मिलने वाले अनजान सहयात्री कई बार समाज का सबसे सटीक आईना साबित होते हैं...
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क्या भारतीय राजनीति एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है? क्या दलबदल अब महज़ अवसरवाद नहीं, बल्कि सत्ता के बड़े खेल का सबसे असरदार हथियार बन गया है...
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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन, आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है...
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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊंची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएं, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएं, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम ‘नए भारत’ की मंज़िल पर पहुंच गए हैं...
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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ। कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। और, उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया...
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घर में अजीब-सी ख़ामोशी है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ रहा है। यादें धुंधली पड़ रही हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन रही है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहां हर पांचवां नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग हो जाएगा।
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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि जनता जब चाहती है, तब अपनी आवाज़ को किसी आंदोलन में बदल देती है। कभी यह आवाज़ सत्ता को पलट देती है, कभी नई तरह की राजनीति को जन्म देती है और कभी व्यवस्था सुधार की मांग बन जाती है। जयप्रकाश नारायण का ‘इंदिरा हटाओ’ आंदोलन, अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और नीट पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी का छात्र आंदोलन, तीनों इसी परंपरा की अलग-अलग कड़ियां हैं।
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कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।
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सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, "Hi, how are you?" दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, "I am fine, thank you." तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, "Where is your project ?" उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर सपने बड़े हैं…
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कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था...
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