देश

कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है। बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है...

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए, “क्या कर रहे हो?” जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा, “यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं।” “क्यों?” “देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

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15 जून 2005 को भारत ने अपने नागरिकों को सिर्फ एक नया कानून नहीं दिया था। उसने उन्हें एक ताकत दी थी। सवाल पूछने की ताकत। और उससे भी बड़ी बात, जवाब मांगने का कानूनी अधिकार...

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अक्सर यात्राएं हमें वह सच दिखा देती हैं जो नेताओं के भाषणों और अख़बारों के संपादकीयों में नहीं मिलता। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर मिलने वाले अनजान सहयात्री कई बार समाज का सबसे सटीक आईना साबित होते हैं...

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क्या भारतीय राजनीति एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है? क्या दलबदल अब महज़ अवसरवाद नहीं, बल्कि सत्ता के बड़े खेल का सबसे असरदार हथियार बन गया है...

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन, आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है...

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