इस बार की गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर एक विशेष झांकी प्रस्तुत की जाएगी। इसमें राष्ट्रीय गीत को भारत की सभ्यतागत स्मृति, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में दिखाया जाएगा...
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इस बार की गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर एक विशेष झांकी प्रस्तुत की जाएगी। इसमें राष्ट्रीय गीत को भारत की सभ्यतागत स्मृति, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में दिखाया जाएगा...
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अगर सियासत सिर्फ़ गिनती का खेल होती, तो भारत का विपक्ष आज सत्ता के क़िले पर चढ़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आता। लेकिन, भारतीय लोकतंत्र के सख़्त मैदान में सिर्फ़ सीटों की संख्या काफ़ी नहीं होती। यहां ज़रूरत है एक पुख़्ता यक़ीन की, आपसी एकजुटता और सरकार के सामने रखने के लिए एक दमदार, भरोसेमंद कहानी की। और, इन्हीं अहम मोर्चों पर विपक्ष बुरी तरह पिछड़ा हुआ है...
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मरोड़े हुए लोहे के ढांचे से एक-एक कर शव निकाले जा रहे हैं। कुछ ही मिनट पहले यही ढांचा हंसता-खेलता परिवार था, छुट्टियां मनाने निकला हुआ। खून से सनी सीटों के बीच एक बच्चे का जूता पड़ा है। टूटी हुई स्टीयरिंग एक बेजान जिस्म को जकड़े हुए है। कहीं खोपड़ी सीट से टकराकर चटक गई है, कहीं पलटी गाड़ी के नीचे हाथ-पैर कुचल गए हैं। यह किसी दुर्लभ या अचानक हुए हादसे की डरावनी तस्वीर नहीं है। यह भारत की सबसे तेज़ सड़कों की रोज़मर्रा की हक़ीक़त है। उत्तर प्रदेश की एक्सप्रेसवे सड़कों पर मौत अब कोई मेहमान नहीं, बल्कि रोज़ का मुसाफ़िर बन चुकी है...
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नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर मात्र तीन रह गई, जो लाल गलियारे के लगभग खात्मे का संकेत है।
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सुबह की गुलाबी रोशनी में महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के एक छोटे से गांव की रोजमर्रा ज़िंदगी जगने लगती है, मुर्गों की बांग, पीतल के बर्तनों की खनक, और बरगद के पेड़ के नीचे बैठी आशा वर्कर संगीता, जिसने अपनी नीली दवाई-बक्शा खोलकर सामने फैला दी है। गन्ने के खेतों पर पड़ती धूप में वह औरतों के एक घेरे को समझा रही है कि जन्मों में फ़ासला रखना कैसे मां और बच्चे दोनों की ज़िंदगी बचाता है। कुछ औरतें बच्चों को गोद में लिए हैं, कुछ संकोच में ऐसे सवाल पूछ रही हैं जो शायद वे अपने शौहर के सामने कभी न पूछ पातीं। इस सादे से सुबह के दृश्य में भारत की असली आबादी-क्रांति दर्ज है, न फ़ाइलों में, न नारेबाज़ी में, बल्कि एक-एक आशा की सब्र, मोहब्बत, और इख़्तियार देने की कोशिश में...
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बीते 29 नवंबर को नागपुर बुक फेस्टिवल में बोलते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महात्मा गांधी की किताब ‘हिंद स्वराज’ के एक विवादित वाक्य की आलोचना की। गांधी ने लिखा था कि भारत एक राष्ट्र के रूप में वास्तव में ब्रिटिश शासन के कारण ही उभरा...
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