बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

केरल विधान सभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, और इस बार सबकी नजर एक ही चेहरे पर टिकी है, तिरुवनंतपुरम के सांसद डॉ शशि थरूर पर। एक ओर केंद्र सरकार के ग्लोबल डेलिगेशन में उनका चमकता चेहरा, दूसरी ओर कांग्रेस आलाकमान से बढ़ती दूरी। सवाल बड़ा है: क्या थरूर पार्टी बदलेंगे? या फिर केरल में कांग्रेस की नैया पार लगाएंगे?

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"आगरा से नोएडा डेढ़ घंटा, और नोएडा परी चौक से इंदिरा गांधी हवाई अड्डा दो घंटा। 1972 में भी आगरा से दिल्ली पहुंचने में चार-पांच घंटे लगते थे। आज हालात और बदतर हैं, प्रदूषण से आंखें जलती हैं, गले में खराश है, नाक बह रही है।"

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पूरा देश 14 नवंबर का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। बिहार में लालू यादव का जंगलराज लौटेगा या नीतीश बाबू का चटपटा करामाती ठेला अपनी जगह टिका रहेगा? बिहार के चुनावी नतीजों से देश की राजनीति प्रभावित हो सकती है...

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भारत की राजनीति में विचारधाराएं अब जाति के आगे नतमस्तक हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन इतिहास बन चुके हैं, राष्ट्रवाद थका हुआ दिखता है, और धर्म की अफीम भी जातीय दीवारों को ढहाने में असमर्थ रही है। जाति अब भारतीय समाज की आत्मा में गहराई तक समा चुकी है...

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बहुत पुरानी बात है, जब मोबाइल नहीं, पर मुंह बहुत चला करते थे। आगरा में मुगल बादशाह के जागीरदार का एक गांव था टेढ़ी बगिया के पास, ‘ठुमकपुर’। वहां की सबसे नामी ठुमकिया थी, चंपा देवी झटकनिया। नाम ऐसा कि सुनते ही पायल खुद बज उठे, पर असलियत कुछ और ही थी...

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भारत में कुल 2,827 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय, 58 राज्य, और 2,763 गैर-मान्यता प्राप्त दल शामिल हैं। यह आंकड़ा चुनाव आयोग की 23 मार्च 2024 की रिपोर्ट का है। इस साल जनवरी में जनसेना को राज्य पार्टी का दर्जा मिलने के बाद इस सूची में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इतनी पार्टियों के बावजूद सवाल वही है, लोकतंत्र की शुचिता बार-बार क्यों लांछित होती है...

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