बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

कल्पना कीजिए, यदि भारत ने परिवार नियोजन कार्यक्रम न अपनाया होता तो आज आबादी 250 से 300 करोड़ के बीच होती। ऐसे में भूमि, जल और खाद्य संसाधनों पर भयानक दबाव पड़ता। पहले से ही सीमित कृषि क्षेत्र का विस्तार असंभव है, जबकि जल संसाधनों के 2030 तक 50 फीसदी घटने का अनुमान है। ऐसी परिस्थिति में भूख, पलायन और अराजकता का साम्राज्य होता...

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सियासत का पारा चढ़ चुका है, हवा में नारे हैं, गलियों में जोश है और दिलों में उबाल! पटना से पूर्णिया तक, हर नुक्कड़ पर एक ही सवाल गूंज रहा है, “अबकी बार कौन?” नवंबर की ठंडी हवाओं के बीच बिहार फिर से एक गर्म रणभूमि में बदल चुका है।

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दक्षिण के एक नामी स्कूल में 16 साल की एक लड़की से शिक्षकों द्वारा की गई सामान्य पूछताछ ने डिजिटल युग का एक डरावना सच सामने ला दिया, जिससे छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की अंधेरी दुनिया उजागर हो गई।

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भारत की सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार माना जाता है। महिलाओं के अधिकार, समलैंगिक बराबरी और पर्यावरण सुरक्षा जैसे ऐतिहासिक फ़ैसलों ने अदालत की साख मज़बूत की है। लेकिन, हाल के बरसों में कई फ़ैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि अदालतें अपने दायरे से बाहर निकलकर नीति और प्रशासन का काम करने लगी हैं। न्यायिक सक्रियता पर एक बहस 1993 में भी हुई थी जब जस्टिस कुलदीप सिंह बेंच ने एमसी मेहता की याचिका पर ताज ट्रिपेजियम जोन में प्रदूषणकारी उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दी थीं...

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नेपाल, बांग्लादेश और कई वर्ष पहले मिस्र में हुए छात्र आंदोलनों ने सत्ता पलट दी। हश्र यह हुआ कि वहां अभी तक लोकतंत्र मजबूती नहीं दिखा सका है। तो, क्या वजह हैं जो भारत, अमेरिका आदि देशों में लोकतंत्र इतना मजबूत है...

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सिर्फ आंकड़ों, डेटा और तुलनात्मक विश्लेषणों से अगर नरेंद्र मोदी सरकार का मूल्यांकन किया जाए तो पिछले 11 वर्ष भारत की विकास यात्रा के इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। हजारों वर्षों में ऐसी कोई राजनैतिक व्यवस्था नहीं आई जिसने इतनी बड़ी आबादी को जीने की उम्मीद दी, सहारा दिया और मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर दिए...

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