बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

भारत ने सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से विश्व बंधुत्व का परिचय दिया है, लेकिन कुछ राष्ट्र इस उदारता को हमारी कमजोरी समझने की भूल कर बैठे हैं। बांग्लादेश और तुर्की ऐसे ही दो उदाहरण हैं, जिनके साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध होने के बावजूद, आज वे भारत के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे में, इन देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों का बहिष्कार करना न केवल न्यायसंगत है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए परम आवश्यक है...

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दो मोर्चों पर लड़ना किसी भी देश के लिए चुनौती बन सकती है। आधुनिक सूचना तंत्र के महारथी, फौज के जवानों का मनोबल प्रभावित कर सकते हैं और सिद्धांतों की बलि भी दे सकते हैं। झूठी, अधपकी जानकारियां तनाव बढ़ा सकती हैं। साइबर सेना सामान्य समय में भी एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं।

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कश्मीर की खूबसूरत घाटियों में, जहां की फिज़ा, मोहब्बत और भाई चारे की कहानियां सुनाती हैं, वहां पिछले दिनों एक दर्दनाक हादसा हुआ जिसका अंजाम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के रूप में लोगों ने देखा। अब भारतवंशियों ने एक मांग की है, पहलगाम में मां सिंदूरी को समर्पित एक भव्य मंदिर का निर्माण हो।

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जो सिलिकॉन वैली चलाने का दावा करते हैं, कई मुल्कों की सत्ता भी संभालते हैं, अमेरिका के अस्पतालों में जान बचाते हैं, वही दुनिया के ज़ुल्म पर चुप क्यों रहते हैं? विदेशों में बसने वाला भारतीय समुदाय, सबसे कामयाब मगर सबसे बेअसर, असहाय क्यों नज़र आता है? क्यों हर जगह से भगाए जाते हैं? कमाई के प्रति इतने समर्पित, खुदगर्ज हो गए, कि आत्मबल और सम्मान का सौदा कर लिया, और अब दुम दबाके दुबई से न्यूयॉर्क, डबलिन, ओटावा, कुली गिरी कर रहे हैं...

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दस साल पहले सत्ता के गलियारों में बड़े ठाठ से घोषणाएं हुई थीं — गंगा नदी को निर्मल बनाएंगे, भारत को स्वच्छ करेंगे, और सौ शहरों को स्मार्ट बना देंगे। जनता ताली बजाती रही, उम्मीदें पालती रही। लेकिन, अब जब ज़मीनी सच्चाई से पर्दा उठ रहा है, तो लगता है कि सपने और हकीकत के बीच का फासला कम नहीं हुआ है।

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कभी भाषाई विवाद, कभी सीमा विवाद, महापुरुषों को लेकर बहस, राज्यों के अधिकारों पर खींचतान, कभी मेडिकल दाखिलों की वजह से तो कभी सेंट्रल खुफिया एजेंसियों को लेकर रस्साकसी, कुछ नहीं तो जाति, धर्म को लेकर ही अनावश्यक विवाद...! आजादी के बाद से शायद ही कोई ऐसा साल गुजरा हो जब देश में कोई बड़ा विवाद न हुआ हो।

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