बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

दिल्ली की जाम नालियां, मुंबई के कचरे से पटे समुद्र तट, हिमालय की पगडंडियों पर बिखरे रैपर, वाराणसी और वृंदावन के घाटों पर तैरती बोतलें और माला… आज भारत का हर कोना प्लास्टिक से घिरा है। यह जहरीला बोझ मिट्टी को बंजर बना रहा है, नदियों का दम घोंट रहा है, जानवरों की जिंदगी छीन रहा है और पवित्र स्थलों की आभा धूमिल कर रहा है...

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साल 1973 में जब बॉबी फिल्म आई थी, करोड़ों बूढ़े और जवानों में करेंट आ गया था। सोलह वर्ष में प्यार हो जाने से जूली को पहचान मिली। किशोरावस्था के प्यार और रोमांस के किस्से सदियों से आकर्षित करते रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश में ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ की सफलता के बाद, अनेक राज्यों में पुलिस तंत्र को अधिक कड़क और सख्त बनाने की कवायदें शुरू हो चुकी हैं। क्या बिना बुनियादी सुधारों के पुलिस तंत्र को और अधिक आजादी देना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होगा?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति हालिया रवैया, जिसमें टैरिफ बढ़ाने, दबाव बनाने और सौदों की भाषा में रिश्तों को परिभाषित करने की कोशिश शामिल है, एक नए साम्राज्यवादी दौर की आहट है। ट्रंप का विश्व व्यापार संगठन से विमुख होना और वैश्विक व्यापार के नियमों को धता बताते हुए ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर आर्थिक धौंस का प्रयोग, बताता है कि अमेरिका अब मित्र नहीं, मालिक बनना चाहता है।

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आज के युवा पति, नीले प्लास्टिक ड्रम और सीमेंट के बोरों से डरते हैं, मानो ये कोई जानलेवा संकेत बन गए हों। वहीं, संयुक्त परिवारों की बुजुर्ग सासें अब शादी के बर्तन नहीं, ‘कटोरे’ इस डर से खरीद रही हैं कि बहू अब केवल रसोई तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके इरादे कहीं और हैं।

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बॉलीवुड फिल्मों ने गोरेपन को लेकर इतनी भ्रांतियां पैदा कर दीं हैं कि हर दिन टनों फेयर एंड लवली क्रीमें खप जाती हैं। गोरे होने के चक्कर में तरह-तरह के नुस्खे आजमाए जाते हैं। "गोरे रंग पे न इतना गुमान कर," “गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा” जैसे गीत बनाए जाते हैं। सांवले रंग की वजह से बच्चों के नाम कालिया, कालीचरण, भूरा, आदि रखे जाते हैं। श्री कृष्ण भी मैय्या से पूछते हैं, “राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला?” सच में भारतीय समाज में रंग भेद का अभिशाप युगों से चल रहा है।

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