मथुरा

मथुरा। होम्योपैथी के प्रणेता डा0 हैनीमैन की जयंती चित्रंाश कल्याण समिति मथुरा द्वारा इनके द्वारा संचालित दीप वन्दना दातव्य होम्यों चिकित्सालय राम लीला ग्राउण्ड के पास मनाई गई। कार्यक्रम का प्रारम्भ वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति के अध्यक्ष नंद किशोर वार्ले वाले, इण्डियन होम्यों एसोसिएशन मथुरा के अध्यक्ष डा0 बी0पी शर्मा तथा डा0 सुनील दक्ष द्वारा डा0 हैनीमैन के चित्र पर माल्यापर्ण करके एवं दीप प्रज्वलन करके किया गया। सुखेदव चतुर्वेदी द्वारा मंगलाचरण किया गया। डा0 डी0पी0 शर्मा द्वारा डा0 हैनीमैन के जीवन तथा कार्यप्रणाली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया कि किस प्रकार कुनैन का आविष्कार किया गया। डा0 सुनील दक्ष ने कहा कि एलोपैथी के चिकित्सक होने के बावजूद भी उन्होंने अनुसंधान करके होम्योपैथी की दवाओं का आविष्कार किया एवं रोगियों के लिये सस्ती व सुलभ चिकित्सा पद्वति उपलब्ध कराई। इसके उपरान्त काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें केसी गौड, आरसी भाटिया, शैलेन्द्र कुलश्रेष्ठ, माधव चतुर्वेदी, सुखदेव चतुर्वेदी, सुरेश गौतम, नरेन्द्र मोहन सक्सैना, आदि द्वारा काव्य पाठ करके श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया। जगदीश अस्थाना, आरपी सक्सैना, एनएम शर्मा, एम0पी तिवारी एवं वाष्र्णेय ने होम्यो चिकित्सा तथा दीप वृन्दना चिकित्सालय की सराहना करते हुए इसके लाभ पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन शैलेन्द्र कुलश्रेष्ठ द्वारा किया गया तथा एस0एस0 जौहरी ने उपस्थित व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

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वृन्दावन। अखिल भारतवर्षीय ब्राहाण महासभा ने नगर पालिका वृन्दावन अध्यक्ष मुकेश गौतम एवं पालिका बोर्ड को धन्यवाद देते हुये हर्ष व्यक्त किया है कि महासभा द्वारा दिये गये परशुराम चैक के प्रार्थना पत्र पर सर्वसम्मति से पारित बोर्ड प्रस्ताव द्वारा अटल्ला चुंगी चैक का नामकरण परशुराम चैक किया गया है। आगामी 20 अप्रैल परशुराम जयन्ती के पावन अवसर पर इस चैक का लोर्कापण किया जायेगा। इसके साथ ही भविष्य में पालिकाध्यक्ष के सहयोग से 2000 वर्गगज भूमि पर विप्र हित में भव्य और दिव्य परशुराम भवन का भी निर्माण शीघ्र किया जायेगा। वर्तमान में बोर्ड प्रस्ताव के माध्यम से उक्त पार्क को अखिल भारतवर्षीय ब्राहाण महासभा को सुपुर्द किया जा चुका है जिसका भी जीर्णोद्धार एवं मुख्य प्रवेश द्वार निर्माण एवं अन्य आवश्यक कार्य शीघ्र ही पालिकाध्यक्ष मुकेश गौतम की देखरेख में पूर्ण किये जायेंगे। हर्ष व्यक्त करने वालोें पं0 बिहारीलाल वशिष्ठ, आचार्य अतुलकृष्ण गोस्वामी, पं0 बालकृष्ण गौतम, आचार्य रमेश चन्द्र, कृष्णमुरारी मोतीवाला, छैलबिहारी शर्मा, बालो पंडित, प0. महेशचन्द्र शर्मा, डोरीलाल गौतम, राजकुमार शर्मा, आशू गौतम, गोपाल वशिष्ठ, रवि शर्मा, पप्पू, प्रदीप गोस्वामी, अशोक गोस्वामी आदि हैं।

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21 अप्रैल को होगा गरीब व किसानों की कन्याओं की शादी मथुरा। गोबिन्द राम गोयल चैरिटेबिल ट्रस्ट कोलकत्ता, श्रीरामानन्द आचार्य वेष्णव सेवा ट्रस्ट एवं कल्याण करोति के संयुक्त तत्वाधान में निधर््न किसानों की कन्याओं का विवाह समारोहों 21 अप्रैल आय तृतीय के पर्व पर सुखधाम आश्रम वृन्दावन के प्रागण में कराया जायेगा। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बाबा बलराम दास ने बताया कि प्रत्येक ब्लाक पर विवाह के लिए पंजीकरण कराये जा सकते हैं। इसमें विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 वर्ष व लडके की उम्र 21 वर्ष होने के साथ साथ दोनो परिवारों की सहमति अवश्यक हैं।  उक्त आयोजन में किसी भी वर्ग जाति के परिवार पंजीकरण करा सकते हैं। बाबा बलराम दास ने बताया कि उक्त समय में ट्रस्ट के माध्यम से गौ सेवा, अन्न सेवा, पोलियों रोगियों की सेवा, नेत्र रोगियों की सेवा, शिक्षा व चिकित्सा आदि क्षेत्र में भी सेवाए प्रदान की जायेगी। बाबा बलराम दास ने बताया कि वरिश व ओलावृष्टि से किसानों को भारी नुकसान हुआ हैं। अनेकों किसान मौत के मुंह में समा चुके हैं। वहीं अनेकों किसानों को अपनी खेती उजड़नें के वाद उनकी तय शुदा बेटा बेटियों की शादी करने में परेशानी हो रही है इसे देखतें हुए उपरोक्त संस्थान ने यह कार्यक्रम करने का आयोजन किया हैं। इस अवसर पर समाजसेवी एसके शर्मा व ठा0 मेघश्याम सिंह ने बताया कि बाबा बलराम दास द्वारा विगत वर्षो से विभिन्न जनमानस की निरन्तर सेवा की जा रही हैं। उक्त कार्यक्रम का उददेश्य निर्धन लोगों को मदद करना हे। उन्होंने बताया कि विवाह समारोह में कन्या व वर पक्ष से 25-25 व्यक्ति भाग ले सकेगे।

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प्राचीन काल से ही सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कई अनेक रोचक एवं अनोखे तरीके अपनाए जाते रहे हैं। आज वह एक कहानी की तरह लगती है। बीते दशकों में संचार टेक्नोलॉजी में आए चमत्कारिक परिवर्तन का सर्वाधिक फायदा सूचना जगत को हुआ है और मीडिया की इसपर निर्भरता बढ़ गई है।  स्कॉटलैण्ड के अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने 1876 मे ‘टेलीफ़ोन’ का आविष्कार किया तो इसे मानव के प्रगतिशील विकास की राह में एक क्रांतिकारी कदम माना गया। तकनीकी विकास के कारण आज दुनिया मुट्ठी में समा गई है। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। प्रत्येक पांचवी ऊंगली इंटरनेट के बटन पर है। जाहिर तौर पर आज पत्रकारिता पूरी तरह सूचना तकनीकी पर आश्रित है। ई-कम्यूनिकेशन का दौर शुरू हो चुका है। अब वेबसाइट, ई-मेल, यूट्यूब, सोशल साइट, ट्विटर, ब्लॉग जैसे ई-कम्युनिकेशन माध्यम पारंपरिक मीडिया को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं।  आज के दौर में पत्रकारिता सूचना और मनोरंजन के मुख्य स्रोत बन गए हैं। लोग अखबार को इंटरनेट और मोबाइल पर पढ़ रहे हैं। सोशल साइट का प्रयोग दिनों-दिन बढ़ रहा है। वर्तमान में 2.7 बिलियन से ज्यादा वेबपेज रोजाना सर्च हो रहे हैं। अमेरिका का युवा कागज पर छपा अखबार नहीं पढ़ रहा बल्कि वह अखबार की जगह नेट पर गूगल समाचार में एक ही जगह तमाम अखबारों की सुर्खियां देख ले रहा है। आज गूगल समाचार के कारण यूरोप और अमेरिका में अखबारों की संख्या और राजस्व दोनों गिर रहे हैं। तेजी से बदलती तकनीकी ने पत्रकारिता का पारंपरिक चेहरा बदल दिया है। आधुनिकता और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जहां पहले से खबरों के इतने सारे माध्यम मौजूद थे, वहां ‘सोशल मीडिया’ ने सबको पछाड़ते हुए अपनी ‘अद्वितीय-पहचान’ बना ली है। ‘सोशल मीडिया’ लोगों की पहली पसंद बन गया है। इसका सीधा मतलब है ‘जनता की अपनी आवाज़’। वह आवाज़ जो उसके अपने लोगों से ही निकालकर उसे सुनाई जाती है। न कोई चैनल…न कोई अखबार… सिर्फ आप की खुद की आवाज़, आपकी खबरों के ज्ञान का भंडार। जो सूचनाएं परंपरागत मीडिया का हिस्सा नहीं बन पाती, वह आज सोशल मीडिया की सुर्खियां बन 'वायरस' फैला रही हैं। इंटरनेट की दुनिया में लोगों के पास असंख्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म उपलब्ध हैं, जहां लोग एक-दूसरे से आसानी से संपर्क बना सकते है। अपनी सूचनाओं एवं खबरों को सरलता से आपस में साझा कर सकते हैं। उनमें से सबसे प्रचलित फेसबुक और ट्विटर हैं। फेसबुक से पहले गूगल परिवार का ‘ऑर्कुट’ सोशल प्लेटफ़ार्म का सबसे बड़ा नाम था पर ‘एफ़बी’ के करिश्माई प्रभाव ने इस साल उसके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया। गूगल ने ऑर्कुट की सेवाएं एकदम से समाप्त कर दी। आज फेसबुक लोगों की (विशेष तौर पर ज़्यादातर भारतीयों की) पहली पसंद है। दूसरा नंबर आता है ट्विटर का जिसे ‘सेलेब्रिटी का अड्डा’ भी कहा जाता है। नेता से लेकर अभिनेता एवं जानी-मानी हस्तियां सब आपको ‘ट्विटर’ पर मिलेंगे वो भी ‘ओरिजिनल’! हाल में दावोस में संपन्न हुए वर्ल्ड इकोनामिक फोरम में गूगल के प्रमुख एरिक स्मिथ ने यह कहकर दुनिया को और उत्साहित कर दिया कि बहुत जल्द इंटरनेट जिन्दगी के हर पहलू में इतना रच बस चुका होगा कि यह ब्रॉडबैंड में गुम हो जाएगा। आपके इर्द-गिर्द इतने सारे सेंसर और डिवाइस होंगी कि आपके लिए उन्हें पता लगाना तक मुश्किल हो जाएगा। यह सवाल परेशान कर सकता है कि मीडिया के इतने साधनों के बाद भी ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे क्यों आया? क्या पहले से मौजूद मीडिया के स्रोत निरर्थक और असक्षम हो गए थे जो सोशल मीडिया का जन्म हुआ?  असल मे आत्म-चिंतन और अवलोकन तो प्रिंट और टीवी मीडिया वालों को करना चाहिए जिनकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर बार-बार दाग लगे हैं। शायद उसी ‘दाग’ को साफ करने के लिए ‘सोशल मीडिया’ ने जन्म लिया। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग की नीलामी को रोकने के लिए ही ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे आई दिखती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या 33 मिलियन से अधिक हैं। ये आकड़े अचंभित करने वाले हैं। सोचिए, इतने सारे लोगो के बीच सूचनाओँ के आदान-प्रदान की सीमा क्या होगी? भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार पिछले कुछ वर्षों मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारत मे ‘गेम-चेंजर’ की तरह काम किया है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन की क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अद्भुत शक्ति दिखाई है।  लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के एक अधिवेशन में राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत का उल्लेख किया। बाद में तत्कालीन सरकार ने इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत मे वेब (सोशल) मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज़-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है।   ‘अबकी बार, मोदी सरकार’  ‘हर हर मोदी…घर घर मोदी’ जैसे विवादास्पद नारे भी सोशल मीडिया के ही हिस्से थे। लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के प्रभाव को अध्ययन करने पर कई चौंकाने वाले तथ्य एवं आंकड़े सामने आए है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर 29 मिलियन लोगों ने 227 मिलियन बार चुनाव से संबन्धित पारस्परिक क्रियाएं (जैसे पोस्ट लाइक, कमेंट, शेयर इत्यादि) की। इसके अतिरिक्त 13 मिलियन लोगों ने 75 मिलियन बार केवल नरेंद्र मोदी के बारे में बातचीत की। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 814 मिलियन योग्य मतदाताओं वाले देश भारत में सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान व्यापक था।  अन्ना हज़ारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल को ब्रांण्ड बनाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। देश–दुनिया में जुनून पैदा करने वाले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था कि छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश में तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव में आ गई थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था। सोशल मीडिया सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई मे एक ‘मेसेंजर’ के तौर पर उतरा है। लोगों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल काडा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है।  दिल्ली का दिल दहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे उक्त घटना के बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। देश-विदेश से ऐसी घटनाओं के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय भी इसी माध्यम को जाता है। सोशल मीडिया को जिस तरह से स्वीकृति मिल रही है उससे कहा जा सकता है कि भूतकाल कीर्तिमय था, वर्तमान समृद्ध है, भविष्य उज्ज्वल और यशस्वी होगा। जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है, उससे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ जाहिर तौर पर अन्य मीडिया माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। इसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर मीडिया हाउसों के रणनीतिकार अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव को मजबूर हुए हैं।  उधर, परंपरागत मीडिया के प्रभावी माध्यम माने जाने वाले टेलीविजन को आम जनता देखती है। उसे कोसती भी है। क्या इसे हम टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट कहें ? टीवी चैनलों के आने के बाद जो कुछ गलत हो रहा था, उसे लोगों के बीच में लाने का काम शुरू हुआ। आने वाले समय में सोशल मीडिया एक प्रभावकारी और भरोसेमंद तथा त्वरित पत्रकारिता का स्थान लेगी। पश्चिमी देशों में ऐसा होने लगा है। सोशल और यहां तक कि टीवी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी क्रांति ला दी है। इसने अभिजात्य संस्कृति को ध्वस्त किया है। सामंतवादी सोच को बदला है और जमीनी स्तर तक लोकतंत्र को फैलाया है। वेबसाइट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटस, जैसे माइ स्पेस, आरकुट, फेसबुक आदि, माइक्रो ब्लागिंग साइट टि्वटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं| यही एक ऐसा मीडिया है जिसने अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग के अंतर को समाप्त किया है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा अब बढ़ गया है। निश्चित तौर पर वैकल्पिक मीडिया में अपार संभावनाएं है। दूसरी ओर, यह सच उजागर करने की क्षमता भी रखता है। विकीलीक्स द्वारा किए गए खुलासे इसके उदाहरण हैं। आज धीरे-धीरे जहां ब्लॉगिंग प्रिंट मीडिया के समानान्तर खड़ा होने लगा है, वहीं इसके भविष्य की वृहद संभावनाएं इसे न्यू मीडिया के रूप मे चर्चित कर रही हैं। न्यू मीडिया अथवा ब्लागिंग की कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जो इसे अन्य माध्यमों से बेहतर और विस्तृत बनाती है। आज गूगल समाचार के कारण यूरोप और अमेरिका में अखबारों की संख्या और रेवेन्यू दोनों गिर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया अकादमिक प्रो फिलिप ने अखबारों के पतन का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अगर ऐसा ही रहा तो अप्रैल 2040 में अमेरिका में आखिरी अखबार छपेगा।  अमेरिका का सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार वाशिंगटन पोस्ट बिक गया, जिसे आमेजन डॉट काम ने खरीद लिया। न्यूयार्क टाइम्स भी कर्ज में डूब चुका है। साप्ताहिक पत्रिका न्यूजवीक का प्रिंट संस्करण बंद हो चुका है और वह अब केवल ऑनलाइन ही पढ़ी जा सकती है। सवाल यह है कि अखबारों के बिना पत्रकारिता का क्या होगा। अखबार ही नहीं बल्कि टेलीविजन न्यूज के दर्शकों की संख्या में भी कमी आ रही है। बस इंटरनेट बढ़ रहा है। सोशल मीडिया हमें सूचनाएं उपलब्ध करा रहा है। अमेरिका में आज बहस का दूसरा मुद्दा यह है कि पत्रकार कौन है! एडवर्ड स्नोडन, राबर्ट मैनी, जूलियन असांजे आदि के खुलासों के बाद पत्रकार की परिभाषा बदल गई है। इस संदर्भ में देखें तो अब 'सिटीजन जर्नलिज्म' का जमाना है। ब्लॉगिंग, फेसबुक आदि के प्रसार के बाद आज हर नागरिक एक पत्रकार की भूमिका में है। यह क्राउड सोर्स का समय है। तकनीकी विस्तार के कारण न्यू मीडिया और सोशल मीडिया का समाज में दखल और वर्चस्व इतना बढ़ता जा रहा है कि सरकार इसके लिए नियामक प्राधिकरण गठित करने की सोच रही है।  सोशल मीडिया पर स्टेटस लिखना अभिव्यक्ति की आजादी के बड़े सवाल से जुड़ गया है। इस विवाद ने अधिक तूल तब पकड़ा, जब महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा के दौरान राज्य में घोषित किए गए बंद को एक लड़की द्वारा फेसबुक पर गैर-जरूरी बताए जाने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसे ही मामले पश्चिम बंगाल और पुद्दुचेरि में भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों को आधार बनाकर पुलिस ऐसी गिरफ्तारी आइटी कानून की धारा 66-ए के तहत कर रही है। इस धारा को लेकर दिल्ली की छात्र श्रेया सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। याचिका में श्रेया ने 66-ए को कठघरे में लाते हुए इसे अभिव्यक्ति की आजादी, न्याय के समक्ष समता और जीवन के अधिकार से जोड़ा है।  ब्रिटेन में पिछले साल हुए दंगों के बाद बनी जांच समिति ने दंगों में सोशल मीडिया की भूमिका की भी जांच की थी और उसे भी दोषी पाया था। 'आफ्टर दि रायट्स' नाम से तैयार इस रिपोर्ट में सोशल मीडिया को तब के दंगों के लिए जिम्मेदार बताया गया था, लेकिन इसके लिए अन्य कारण जिम्मेदार थे, वे माध्यम (सोशल मीडिया) नहीं।  इसमे दो राय नहीं कि मीडिया बाजार का हिस्सा है। इसका संचालन निजी हाथों में है। यह लोकतंत्र के तीन अन्य स्तंभ की तरह नियमों, कायदों और प्रावधानों के तहत भी नहीं है। संविधान इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लिहाजा, तब क्या इसे सामाजिक जवाबदेही की दायरे में लाया जाना चाहिए। इस जवाबदेही का स्वरूप क्या हो, इस पर भी विमर्श जरूरी है। प्रेस काउंसिल आफ इंडिया हमेशा से कहता रहा है कि नागरिक समाज के प्रति मीडिया को जवाबदेह होना होगा..। जब रिजनेबल रिस्ट्रिक्शन का मतलब उसे नियंत्रण करना नहीं है, ऐसे में काउंसिल की चिंता समाज में उसे भरोसेमंद बनाने को लेकर है ताकि लोगों का मीडिया से जुड़ा भरोसा खत्म न हो। (लेखक प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के सदस्य हैं)  

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सौंख में सपा के पिछडा वर्ग प्रकोष्ठ जिलाध्यक्ष का स्वागत करते लक्ष्मन कुशवाह, सुनिया पहलवान व स्थानीय लोग सौंख समाचार। रविवार को समाजवादी पार्टी के पिछडा वर्ग प्रकोष्ठ के कार्यकर्ताओं ने स्थानीय कैम्प कार्यालय पर स्वागत समारोह कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम में मुख्यअतिथि जिलाध्यक्ष क्षेत्रपाल सिंह निषाद व विशिष्ट अतिथि सपा नेता मुकेश यादव का फूलमाला और साफा पहनाकर स्वागत किया गया। इस मौके पर क्षेत्रपाल सिंह निषाद ने कहा कि कार्यकर्ता क्षेत्र में जन समस्याओं  पर ध्यान दें और उनका समाधान करायें और समाजवादी पार्टी की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाये। इस मौके पर सपा नेता सुनिया पहलवान व लक्ष्मन कुशवाह ने कहा कि क्षेत्र में पार्टी ने तमाम कार्य करायें है। इससे निश्चित ही पार्टी को लाभ होगा। इस मौके पर गिर्राज सिंह कुशवाह, भगवान सिंह, डालचंद, सुरेश सिंह, मदनलाल खां, दिनेश सिंह, ओमप्रकाश, अन्सार कुरैशी, प्रमोद कुशवाह, शेर सिंह माहौर, यादराम, भरत सेन, तिलक सिंह आदि उपस्थित थे।  

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भुगतान का क्षेत्रफल बढ़ाने को दबा दिया नालियों और फुटपाथ भी पीला ईंट और कमजोर पेवर ईंटों का हो रहा धडल्ले से प्रयोग सड़क निर्माण में इण्टरलाॅकिंग में कार्य में छिपायी गयी नालियां पीडब्लूडी की सड़क को दबाकर हो रहा इण्टरलाॅकिंग कार्य नाली में प्रयुक्त पीला ईंट दिखाते सपा नेता अरविन्द अग्रवाल    राया। जनता की समस्या और पीड़ाओं के निदान को लोगों ने जिसे अपना प्रतिनिधि चुन कर कस्बे का चेयरमैन बनाया वो अब जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की बजाय उन्हीं के शोषण पर आमादा है। वही चेयरमैन क्षेत्रीय विकास के नाम पर जनता के पैसे को खुलेआम लुटा रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कस्बे के आयरा खेड़ा लिंक रोड के बेवजह कराये जा रहे पुनः निर्माण में देखनें को मिला। लोक निर्माण विभाग द्वारा कुछ समय पूर्व ही ठीक ठाक गुणवत्ता से बनायी गयी ये नयी सड़क चेयरमैन द्वारा बेवजह पुनः बनवायी जा रही है। वहीं पूर्व में बनी ठीक ठाक सड़क को मिटटी से दबा दिया है। सिर्फ लाखों के बन्दर बांट के लिये बन रही इस सड़क निर्माण में व्यापक धांधली की जा रही है। पहली मजबूत डाबर रोड को दबा कर पीला ईटों और निम्न स्तर का पेवर कार्य अब यहां बेवजह किया जा रहा है। बेवजह की इस सड़क निर्माण में ठेकेदार नगर पंचायत और लोक निर्माण विभाग के कई अधिकारियों कर्मचारियों के अलावा शासन प्रशासन के भी कई लोग शामिल है। इसीलिये सब इस ओर से मुंह फेरे बैठे है और जनता का पैसा खुलेआम मिटटी में मिलाया जा रहा है।  सूबे में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के स्थानीय नगर अध्यक्ष अरविन्द अग्रवाल द्वारा इस मामले की की गयी शिकायत को भी भ्रष्ट अधिकारियों के दलदल में दबाया जा रहा है। श्री अग्रवाल ने जब इस मामले को जोरदारी से उठाया और लगातार शिकायतें कर दूध का दूध और पानी का पानी करने का प्रयास किया तो उनकी सुनवायी होने की बजाय उल्टे उन पर तरह तरह के दबाब डाले जा रहे है और उन्हें तरह तरह से धमकियां भी दी जा रही है।  दरअसल मामला नगर पंचायत राया और लोक निर्माण विभाग के अफसरों की मिलीभगत का है। इन दोनों ही कार्यालय के सम्बन्धित अधिकारियों में कुछ इस तरह की सांठ गांठ बैठ गयी है कि नगर पंचायत में स्थानीय निकाय के अधिकतर विकास कार्य के रूप में सिर्फ सड़क निर्माण कार्य ही करा रहा है। नगर पंचायत के अधिकारी लोक निर्माण विभाग की सड़कों के किनारे के फुटपाथ और नाली निर्माण कार्य के लिये के आवेदन कर लोक निर्माण विभाग अधिकारियों से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेते है। जिसके लिये लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को भी भारी मात्रा में सुविधा शुल्क मुहैया कराया जाता है। इसी अनापत्ति प्रमाण पत्र के आधार पर नगर पंचायत ठेकेदारों से सांठ गांठ कर उस पूरी बनी हुई सड़क को ही बनवा डालते है। यहां तक कि कस्बा राया में ठेकेदार अधिक भुगतान के लिये सड़कों किनारे बनी नालियों को भी बन्द करने से नहीं चूके है। धड़ल्ले से नगर पंचायत द्वारा किये जा रहे इस तथाकथित विकास के ऐसे कई उदाहरण सामने आये है।   पहला मामला कस्बे के गांव आयरा खेड़ा लिंक रोड के निर्माण कार्य में इसी प्रकार नगर पंचायत ने लोक निर्माण विभाग से सड़क किनारे की नालियों एवं फुटपाथ के निर्माण के लिये एक अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर उस बेवजह पूरी सड़क के उपर ही इण्टर लाॅकिंग निर्माण कार्य करा दिया है। वहीं ठेकेदार के भुगतान हेतु क्षेत्रफल बढाने के लिये कहीं कहीं नालियों को भी दबा दिया गया है। साथ ही जहां नाली निर्माण किया जा रहा है वहां बिल्कुल खराब और पीला ईंटों को उपयोग किया जा रहा है। वहीं यहां कार्यरत ठेकेदार की दबंगई के चलते अगर कोई व्यक्ति उससे शिकायत करता है भी है तो वे उससे लड़ने मरने को आमादा हो जाते है। दूसरा मामला दूसरे मामले में नगर पंचायत राया के तथाकथित आवेदन पत्रांक 492/न0पा0रा0/ 14-15 दिनांक 30-01-15 पर लोक निर्माण विभाग के अधिशाषी अभियन्ता निर्माण खण्ड 1 लोक निर्माण विभाग मथुरा द्वारा दिनांक 12 फरवरी 2015 को जारी किये गये अनापत्ति प्रमाण पत्रांक 665/ई19 के अनुसार नगर पंचायत को विभाग ने अपने रोड राया मांट मार्ग से नागल मार्ग जो नगर पंचायत के वार्ड संख्या 10-12 में स्थित है के दोनों ओर फुटपाथ एवं नाली निर्माण हेतु जारी किया। लेकिन इसके बावजूद वहां बनी हुई पीडब्लूडी की पूरी सड़क को नगर पंचायत द्वारा बेवजह बनवाया जा रहा है। तीसरा मामला उपरोक्त की भांति नगर पंचायत ने अपने आवेदन पत्रांक 494/न0पा0रा0/14-15 दि0 30-01-15 द्वारा पीडब्लूडी कें ही पीपीएमबी राज्य मार्ग संख्या 33 राया मांट मार्ग एवं राया नीमागंव मार्ग के दोनां ओर फुटपाथ एवं नाली निर्माण को लोक निर्माण विभाग से उनके पत्रांक 666/ई19 दिनांक 12 फरवरी 2015 द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर पूरी सड़क का ही निर्माण कार्य करा डाला है। सड़के लोक निर्माण विभाग की है। उनके निर्माण एवं उनके रख रखाव आदि की जिम्मेदारी भी लोक निर्माण विभाग की होने के बावजूद नगर पंचायत कस्बे व नगर पंचायत की अन्य सड़कों पर ध्यान न देकर इन्ही सड़कों को बनवाने में ज्यादा सहभागिता कर रहा है। वे सड़के जो अभी कुछ ही दिनों पूर्व लोक निर्माण विभाग द्वारा बनवायी गयी है उन्हें नगर पंचायत ने पुनः बनवा डाला है। कस्बे के लोग नगर पंचायत की इस कार्यप्रणाली को लेकर जमकर नगर पंचायत और सरकारी कार्यप्रणाली को कोस रहे है। वहीं चेयरमैन बहुत ही बेहतरी के साथ बने इस लिंक रोड की सड़क का बेवजह पुनः निर्माण करा कर नगर पंचायत और जनता के पैसे का दुरूपयोग कर रहे है। लेकिन कोई भी अधिकारी कर्मचारी इस ओर जानबूझ कर ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझ रहा है।  वहीं प्रदेश में सत्तारूढ समाजवादी पार्टी के नगर अध्यक्ष अरविन्द अग्रवाल ने जब इस मामले की शिकायतें उच्च अधिकारियों से की तो अधिकारियों ने उनकी सुनवायी तो दूर मामले को रफा दफा कराने के लिये भी भारी स्तर पर प्रयास किये। वहीं उन्हें तरह तरह के प्रलोभन और जब प्रलोभनों से भी बात नहीं बनी तो उन्हें धमकियां भी दी गयी।

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