मथुरा

मथुरा। नवरात्रि मेला के अवसर पर रलवें द्वारा 20. मार्च से 29. तक छात आझई के मध्य खम्बा नं. 1421, 24 पर लगने वाले नरी सेमरी नव दुर्गा पूजा मेले के शुभ अवसर पर यात्रियों की सुविधाओं हेतु 20 मार्च से 29 तक निम्नलिखित रेल गाडि़यों का अप एवं डाउन में ठहराव दिया जा रहा है। गाड़ी संख्या 51901, 51902 आगरा कैण्ट दृ नई दिल्ली पैसेंजर, गाड़ी संख्या 64957, 64958 आगरा कैण्ट पलवल शटल, गाड़ी संख्या 19023/19024 फिरोजपुर मुम्बई जनता एक्सप्रेस गाड़ी संख्या 18477/18478 उत्कल एक्सप्रेस, गाड़ी संख्या 13007/13008 उद्यान आभा तूफान एक्सप्रेस 2. इसके साथ साथ नवरात्रि मेला के अवसर पर करौली मेला के लिए एक स्पेशल गाड़ी 20 मार्च से 30 मार्च तक जमुना ब्रिज के स्थान पर ईदगाह से गंगापुर सिटी के मध्य चलाई जा रही है।

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मथुरा। यमुना शुद्वि संकल्प मिशन 2015 द्वारा आयोजित बैठक में सर्व सम्मति से पदाधिकारियों ने निर्णय लिया कि गुरूवार से शहर के चक्रतीर्थ घाट, कृष्ण गंगा घाट, दाउजी घाट, सत्संग घाट, रामेश्वर घाट, गउघाट, सोमनाथ घाट, चिंताहरण घाट पर प्रतिदिन सांय 7 बजे महाआरती का आयोजन किया जाएगा। बैठक की अध्यक्षता कर रहे पं0 अनिल शर्मा ने बताया कि महाआरती के माध्यम से भी यमुना के इस कार्य में लोगों को जोडने का प्रयास किया जाएगा। वहीं कार्यकर्ताओं की टीमों ने जगह जगह सदस्यता अभियान चलाकर लोगों से इस पहल में जुडने की अपील की। हाइवे स्थित श्रीजी बाबा कालेज में चलाए गये अभियान के दौरान दिल्ली से आए पंकज सिंह के नेतृत्व में ऋचा शर्मा, पंकज पंडित, राधा मोहन पाराशर, मुकेश ठाकुर, गुडडू गौतम, दीपक राज, बंटी गौतम, अजय गोस्वामी ने विद्यार्थियों से मुलाकात की और उन्हें यमुना की स्थिति से अवगत कराया। इस अवसर पर बच्चों ने अपनी जिज्ञासाओं को पदाधिकारियों के समक्ष रखते हुए अपने सुझाव दिए। इसी श्रंखला में मीरा गोस्वामी, राजेश तिवारी, सावित्री आदि ने भी जगह जगह भ्रमण कर लोगों से इस मुहिम को जोडा। उन्होंने बताया कि ब्रज की इस पावन धरती पर प्राचीन समय में कल-कल बहती यमुना अब यहां के घाटों पर दिखाई नहीं देती लेकिन ब्रज के यमुना भक्त भी अपने इरादों के इतने पक्के है कि वे अब यमुना को ब्रज की धरती पर पुनः लाकर ही दम लेगें। दिल्ली से आए पंकज सिंह ने बताया कि इस मिशन में ब्रज ही नहीं अन्य जनपद व प्रांतों के लोगों का सहयोग भी मिशन के कार्यकर्ताओें को प्राप्त हो रहा है। बैठक के दौरान लालनजी, मीडिया प्रभारी ऋषि भारद्वाज, ललित देशमां, नीरज शर्मा, राकेश शर्मा, हरि सिंह, मोहन पंडित जतीपुरा, हरीश शर्मा, विष्णु छर्रा, त्रिलोकी पंडित, बब्बू पंडित, भोला पंडित, राजीव शर्मा, तुलसी पंडित, हरिमोहन, केशव चतुर्वेदी, दीपक, गोविन्द शर्मा, दीपक शर्मा, मंटू बाबा, नवल पंडित आदि ने भी अपने विचार रखे।

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भोपाल : कुछ अच्छा और रचनात्मक  सीखने के लिए सही माहौल की जरुरत होती हैㅣअच्छे माहौल और अच्छे शिक्षको के मार्गदर्शन में हम जल्दी और अच्छा सीख सकते है ㅣकक्षाओं  का  माहौल भी सीखने में मदद करता है ㅣ आजकल कई स्कूल रचनात्मक तरीके से अध्यापन पर जोर दे रहे है असनानी स्कूल इनमें से एक है ㅣ क्लास रूम में सृजनात्मक तरीके से पढाई के लिए कई तकनीकी और रचनात्मक संसाधनों की जरुरत होती है ㅣ इस दिशा में पीयर्सन स्कूल ने बच्चो की हित में कई प्रयोग किये हैं ㅣपीयर्सन स्कूल ने टीचिंग में आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है ㅣ   इसके लियें  स्कूल ने डीजीक्लास की शुरुआत की है इसमे  पढाई के पारम्परिक  तरीकों की बजाय अत्याधुनिक क्लास रूम शुरू किए है कुछ अच्छा और रचनात्मक  सीखने के लिए सही माहौल की जरुरत होती हैㅣअच्छे माहौल और अच्छे शिक्षको के मार्गदर्शन में हम जल्दी और अच्छा सीख सकते है ㅣअब टीचर्स भी बच्चों से ब्लैक बोर्ड और चाक की बजाय टच स्क्रीन और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हुए पढाई करेंगेकुछ अच्छा और रचनात्मक  सीखने के लिए सही माहौल की जरुरत होती हैㅣअच्छे माहौल और अच्छे शिक्षको के मार्गदर्शन में हम जल्दी और अच्छा सीख सकते है ㅣ कक्षाओं के माहौल भी सीखने में मदद करता है ㅣ आजकल कई स्कूल रचनात्मक तरीके से अध्यापन पर जोर दे रहे है ㅣइसमे एक्टिवटीच जैसे कॉन्सेप्ट पर टेक्स्ट बुक के कंटेंट को बातचीत वाले माध्यम और विभिन्न ऑडियो और वीडियो में परिवर्तित किया है ㅣइसके अलावा कई दुसरे शैक्षणिक टूल जैसे  एमएक्स टच और डिजिटल कंटेंट से छात्रों को जल्दी सीखने और शिक्षकों को भी पढने में मदद मिलेगी ㅣ भोपाल के असनानी स्कूल ने रचनात्मक तरीके से पढाई  के लिए शिक्षकों और बच्चो के बीच रचनात्मक माहौल बनाया है ㅣबच्चो में  विषयो की समझ बढ़ाने और अपने काम में क्रिएटिविटी लाने के लिए स्कूल डू इट योर सेल्फ किट जैसे टूल उपलब्ध करा  रहा है ㅣ असनानी स्कूल की प्रिंसिपल डॉ भावना गुप्ता  ने बताया की बच्चे क्लास रूम की चार दिवारी से निकलकर बाहरी दुनियॉ को समझें और जानें इसके लिए स्कूल ने कई एजुकेशनल ट्रिप भी करवाई हैं ㅣइस तरह के अभ्यासों के कारण छात्र जल्दी सीखते हैं और खुद का आंकलन भी कर सकते हैं ㅣ असनानी पियर्सन स्कूल के  चेयरमैन जयसूरज नम्बिआर ने बताया की  छात्रों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की समझ विकसित करने के लिए स्पिक मैके जैसी संस्थाओं से अनुबंध किया है ㅣइसके अलावा छात्रों की खेल में रूचि बढ़ाने के लिए स्कूल ने स्पोर्ट्स क्लीनिक और एडु स्पोर्ट्स जैसी पहल की है ㅣ बच्चो के चहुंमुखी विकास और सृजनात्मक सोच विकसित करने  के लिए पियर्सन स्कूल समय समय पर नई गतिविधियां आयोजित करता रहता है ㅣ

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मुंबई। नागपुर जिले के एक महिला संगठन द्वारा राजुरा पंचायत समिति ग्राउंड,चंद्रपुर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जहाँ पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस के हाथों मार्शल आर्ट गुरू यज्ञेश शेट्टी को अवार्ड दिया गया और सम्मानित किया गया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस के अलावा वित्तमंत्री सुधीर मुनगंटीवार, संजय धोते इत्यादि लोग उपस्थित थे। मार्शल आर्ट गुरू चीता यज्ञेश शेट्टी पिछले चार पीढ़ी से बॉलीवुड के लोगों को मार्शल आर्ट शिखा रहे है। तथा स्कूली बच्चों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों सभी को मार्शल आर्ट सिखाते आ रहे हैं। और उन्होने महिलाओं को आत्मरक्षा और किसी भी हमले के वक़्त किस तरह और क्या - क्या वे कर सकती है? सभी के बारे में पूरे देश में लाखों महिलाओं को मार्शल आर्ट की और अन्य प्रकार का प्रशिक्षण दिया है।   

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ब्रजवासी ग्वाल की पौराणिक वेशभूषा में चलते ग्वाल बाल, आगे गऊ माता की अगुवाई और उसके पीछे बैलगाड़ी, और उसके पीछे घोडे की टाप के स्वर यह नाजारा होता इन एच 2 हाइवे के दिल्ली की ओर जाने वाली लेन को जो भोर होते ही हजारों ब्रजवासियों से हाइवे अट जाता है। 19 मार्च को पदयात्रा अपने पड़ाव पृथला से आगे बढी और हजारों ब्रजवासी अपने संकल्प पूर्ति के लिये दिल्ली की ओर बढने लगे। यमुना भक्तों की इस कदम चाल से अब दिल्ली में बैठी केन्द्र सरकार हिलने लगी है। पदयात्रा में चल रहे साधु सन्तों का कहना है कि दिल्ली में बैठी सरकार को दिल्ली से सैकड़ो किलोमीटरों दूर बह रही गंगा का ध्यान तो पर उसके साथ में उनकी नाक के नीचे बह रही यमुना की दशा उन्हे दिखाई नहीं दे रही है। ब्रज धाम में बह रही यमुना नदी में दिल्ली और आगे पड़ने वालो  शहरों के गन्दे नालों के गन्दा जल ही बह कर आ रहा है।  इस बार यमुना भक्त हठ कर बढ रहे कि लौटेगे तो यमुना जल लेके नही ंतो लौटेगे ही नहीं।  यमुना को लाने के लिये चल रही यमुना मुक्तिकरण पदयात्रा  अपने आप में अनूठी है यात्रा में सबसे आगे गऊमाता, उसके बाद बैलगाडी, फिर घोड़े उसके बाद गुरूकुल के बच्चे और पदयात्री चल रहे है। यात्रा में ठाकुर जी के रथ और कई रंग शालाये चल रही है। यात्रा को अभूत पूर्व बनाने के लिये हजारों ब्रजवासी रोजाना ब्रज से आकर पदयात्रा में सम्मिलित होते है। इस तरह दिन में भीड़ 70 से 80 हजार के आस पास पहुॅच जाती है।  यात्रा में 9 ब्रह्म रत्नों की रक्षा का सन्देश लेके यात्रा में चल रहा ब्रह्मरत्न जनचेतना रथ ब्रह्मरत्न जन चेतना जाग्रति अभियान रथ के संचालक अत्रिमुनि ने कहा कि सनातन धर्म के मूल, गीता, गंगा, गाय, यमुना, साधू, भूमि, कन्या, तुलसी और वृक्षों की प्राचीन काल की भांति सेवा, पूजा, रक्षा अब सुनिश्चित अवश्य होनी चाहिये।   

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जल ही जीवन है। जी हां, अगर जल नहीं है तो जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। जल या पानी एक आम रासायनिक पदार्थ है जिसका अणु दो हाइड्रोजन परमाणु और एक ऑक्सीजन परमाणु से बना है - H2O यह सारे प्राणियों के जीवन का आधार है। आमतौर पर जल शब्द का प्रयोग द्रव अवस्था के लिए उपयोग में लाया जाता है पर यह ठोस अवस्था (बर्फ) और गैसीय अवस्था (भाप या जल वाष्प) में भी पाया जाता है। पानी जल-आत्मीय सतहों पर तरल-क्रिस्टल के रूप में भी पाया जाता है। पृथ्वी का लगभग 71% सतह जल से आच्छदित है जो अधिकतर महासागरों और अन्य बड़े जल निकायों का हिस्सा होता है। खारे जल के महासागरों में पृथ्वी का कुल 97%, हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ चोटिओं मे 2.4% और अन्य स्रोतों जैसे नदियों, झीलों और तालाबों मे 0.6%जल पाया जाता है। पृथ्वी पर बर्फीली चोटियों, हिमनद, झीलों का जल कई बार धरती पर जीवन के लिए साफ जल उपलब्ध कराता है। शुद्ध पानी H2O स्वाद में फीका होता है जबकि सोते (झरने) के पानी या लवणित जल (मिनरल वाटर) का स्वाद इनमें मिले खनिज लवणों के कारण होता है। सोते (झरने) के पानी या लवणित जल की गुणवत्ता से अभिप्राय इनमें विषैले तत्वों, प्रदूषकों और रोगाणुओं की अनुपस्थिति से होता है। भारत में विश्व का 18% से अधिक आबादी है जबकि विश्व का केवल 4% नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भूक्षेत्र का 2.4% भूक्षेत्र है। देश में एक वर्ष में वर्षा से प्राप्त कुल जल की मात्रा लगभग 4,000 घन कि-मी होती है। धरातलीय जल और पुन: पूर्तियोग भौम जल की उपलब्‍ध मात्रा 1,869 घन कि-मी- है। इसमें से केवल 60 प्रतिशत जल का लाभदायक उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार देश में कुल उपयोगी जल संसाधन लगभग 1,122 घन कि-मी- होता है। भारत में जल के उपयोग की मात्रा बहुत सीमित है। इसके अलावा, देश के किसी न किसी हिस्से में प्राय: बाढ़ और सूखे की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेद्रित है। भारत में कुछ नदियाँ, जैसे– गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकॄत अधिक होती है। ये नदियाँ देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग में पाई जाती हैं जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे– गोदावरी, कॄष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी संभव नहीं हो सका है। जल संसाधन का लगभग 46 प्रतिशत गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में पाया जाता है। उत्तर-पश्चिमी प्रदेश और दक्षिणी भारत के कुछ भागों के नदी बेसिनों में भौम जल का उपयोग अपेक्षाकॄत अधिक है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग बहुत अधिक है। परंतु कुछ राज्य जैसे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, केरल आदि अपने भौम जल क्षमता का बहुत कम उपयोग करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश,बिहार, त्रिपुरा और महाराष्ट्र अपने भौम जल संसाधनों का मध्यम दर से उपयोग कर रहे हैं। यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है तो जल के माँग की आपूर्ति करने में कठिनाई होगी। ऐसी स्थिति विकास के लिए हानिकारक होगी और सामाजिक उथल-पुथल और विघटन का कारण हो सकती है। कॄषि में, जल का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई के लिए होता है। देश में वर्षा के स्थानिक-सामयिक परिवर्तिता के कारण सिंचाई की आवश्यकता होती है। देश के अधिकांश भाग वर्षाविहीन और सूखाग्रस्त हैं। उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्कन का पठार इसके अंतर्गत आते हैं। देश के अधिकांश भागों में शीत और ग्रीष्म ऋतुओं में न्यूनाधिक शुष्कता पाई जाती है इसलिए शुष्क ऋतुओं में बिना सिंचाई के खेती करना कठिन होता है। पर्याप्त मात्रा में वर्षा वाले क्षेत्र जैसे पश्चिम बंगाल और बिहार में भी मानसून के मौसम में अवर्षा सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न कर देती है जो कॄषि के लिए हानिकारक होती है। कुछ फसलों के लिए जल की कमी सिंचाई को आवश्यक बनाती है। सिंचाई की व्यवस्था बहुफसलीकरण को संभव बनाती है। ऐसा पाया गया है कि सिंचित भूमि की कॄषि उत्पादकता असिंचित भूमि की अपेक्षा ज्यादा होती है। दूसरे, फसलों की अधिक उपज देने वाली किस्मों के लिए आर्द्रता आपूर्ति नियमित रूप से आवश्यक है जो केवल विकसित सिंचाई तंत्र से ही संभव होती है। वास्तव में ऐसा इसलिए है कि देश में कॄषि विकास की हरित क्रांति की रणनीति पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सफल हुई है। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मप्र, प.बंगाल, उप्र आदि राज्यों में कुओं और नलकूपों से सिंचित क्षेत्र का भाग बहुत अधिक है। इन राज्यों में भौम जल संसाधन के अत्यधिक उपयोग से भौम जल स्तर नीचा हो गया है। वास्तव में, कुछ राज्यों, जैसे– राजस्थान और महाराष्ट्र में अधिक जल निकालने के कारण भूमिगत जल में फ्लोराइड का संकेंद्रण बढ़ गया है और इस वजह से पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ भागों में संखिया के संकेंद्रण की वृद्धि हुई है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गहन सिंचाई से मृदा में लवणता बढ़ रही है और भौम जल सिंचाई में कमी आ रही है। संभावित जल समस्या जल की प्रति व्यक्ति उपलब्‍धता, जनसंख्या बढ़ने से दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक, कॄषि और घरेलू निस्सरणों से प्रदूषित होता जा रहा है और इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्‍धता और सीमित होती जा रही है। जल के गुणों का ह्रास जल गुणवत्ता से तात्पर्य जल की शुद्धता अथवा अनावश्यक बाहरी पदार्थों से रहित जल से है। जल बाईँ पदार्थों, जैसे– सूक्ष्म जीवों, रासायनिक पदार्थों, औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्रदूषित होता है। इस प्रकार के पदार्थ जल के गुणों में कमी लाते हैं और इसे मानव उपयोग के योग्य नहीं रहने देते हैं। जब विषैले पदार्थ झीलों, सरिताओं, नदियों, समुद्रों और अन्य जलाशयों में प्रवेश करते हैं तब वे जल में घुल जाते हैं अथवा जल में निलंबित हो जाते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जल के गुणों में कमी आने से जलीय तंत्र (aquatic system)  प्रभावित होते हैं। कभी-कभी प्रदूषक नीचे तक पहुँच जाते हैं और भौम जल को प्रदूषित करते हैं। देश में गंगा और यमुना, दो अत्यधिक प्रदूषित नदियाँ हैं। जल प्रदूषण का निवारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर 507 स्टेशनों की राष्ट्रीय जल संसाधन की गुणवत्ता की निगरानी कर रहे हैं। इन स्टेशनों से प्राप्त किए गए आँकड़ें दर्शाते हैं कि जैव और जीवाणविक संदूषण, नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। दिल्ली और इटावा के बीच यमुना नदी देश में सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। दूसरी प्रदूषित नदियाँ में अहमदाबाद में साबरमती, लखनऊ में गोमती, मदुरई में काली, हैदराबाद में मूसी तथा कानपुर और वाराणसी में गंगा शामिल है। भौम जल प्रदूषण देश के विभिन्न भागों में भारी/विषैली धातुओं, फ़्लोराइड और नाइट्रेट्‌स के संकेंद्रण के कारण होता है। वैधानिक व्यवस्थाएँ, जैसे– जल अधनियम 1974 ;प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं हुए हैं। जल उपकर अधिनियम 1977, जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना है, उसके भी सीमित प्रभाव हुए। जल के महत्व और जल प्रदूषण के अधिप्रभावों के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। जन जागरूकता और  भागीदारी से, कॄषिगत कार्यों तथा घरेलू और औद्योगिक विसर्जन से प्राप्त प्रदूषकों में बहुत प्रभावशाली ढंग से कमी लाई जा सकती है। जल का पुन: चक्र और पुन: उपयोग में लाना पुन: चक्र और पुन: उपयोग अन्य दूसरे रास्ते हैं जिनके द्वारा अलवणीय जल की उपलब्‍धता को सुधारा जा सकता है। कम गुणवत्ता के जल का उपयोग, जैसे शोधित अपशिष्ट जल, उद्योगों के लिए एक आकर्षक विकल्प हैं। इसी तरह नगरीय क्षेत्रों में स्नान और बर्तन धोने में प्रयुक्त जल को बागवानी के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। वाहनों को धोने के लिए प्रयुक्त जल का उपयोग भी बागवानी में किया जा सकता है। इससे अच्छी गुणवत्ता वाले जल का पीने के उद्देश्य के लिए संरक्षण होगा। वर्तमान में, पानी का पुन: चक्रण एक सीमित मात्रा में किया जा रहा है। फिर भी,पुन: चक्रण द्वारा पुन: पूर्तियोग्य जल की उपादेयता व्यापक है। जल संभर प्रबंधन जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधयों, जैसे– अंत: स्रवण तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल हैं। जल संभर प्रबंधन के अंतर्गत सभी संसाधनों जैसे– भूमि, जल, पौधे और प्राणियों और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। केंद्र और राज्य सरकारों ने देश में बहुत से जल- संभर विकास और प्रबंधन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए जा रहे हैं। ‘हरियाली’ केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण के लिए योग्य बनाना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है। वर्षा जल संग्रह वर्षा जल संग्रहण विभिन्न उपयोगों के लिए वर्षा के जल को रोकने और एकत्र करने की विधि है। इसका उपयोग भूमिगत जलभृतों के पुनर्भरण के लिए भी किया जाता है। यह एक कम मूल्य और पारिस्थितिकी अनुकूल विध है जिसके द्वारा पानी की प्रत्येक बूँद संरक्षित करने के लिए वर्षा जल को नलकूपों, गड्‌ढों और कुओं में एकत्र किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण पानी की उपलब्धता को बढ़ाता है, भूमिगत जल स्तर को नीचे जाने से रोकता है, फ़्लोराइड और नाइट्रेट्‌स जैसे संदूषकों को कम करके अवमिश्रण भूमिगत जल की गुणवत्ता बढ़ाता है, मृदा अपरदन और बाढ़ को रोकता है। जल प्रबंधन और जल संरक्षण अलवणीय जल की घटती हुई उपलब्धिता और बढ़ती माँग से, सतत पोषणीय विकास के लिए इस महत्वपूर्ण जीवनदायी संसाधन के संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ गई है। विलवणीकरण द्वारा सागर / महासागर से प्राप्त जल उपलब्‍धता, उसकी अधिक लागत के कारण, नगण्य हो गई है। भारत को जल-संरक्षण के लिए तुरंत कदम उठाने हैं और प्रभावशाली नीतियाँ और कानून बनाने हैं और जल संरक्षण हेतु प्रभावशाली उपाय अपनाने हैं। जल बचत तकनीकी और विधयों के विकास के अतिरिक्त प्रदूषण से बचाव के प्रयास भी करने चाहिए। जल-संभर विकास, वर्षा जल संग्रहण, जल के पुन: चक्रण और पुन: उपयोग और लंबे समय तक जल की आपूर्ति के लिए जल के संयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। (लेखक थर्ड आई वर्ल्‍ड न्‍यूज के प्रधान संपादक हैं)  

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