मथुरा

12 दिसम्बर, शुक्रवार को गोविन्द मठ वृन्दावन में यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय कार्यकर्ताओें की बैठक होगी। जिसमें 11 मार्च 2015 से होने वाले मथुरा से दिल्ली तक की पदयात्रा के विषय में विचार विमर्श किया जायेगा। साथ ही आगरा से दिल्ली तक हाईटेक कार्यालय खोलें जायेंगे। अब सड़क से लेकर संसद तक की लड़ाई लड़ी जायेगी। इसके साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम -रासलीला, कीर्तन, नाट्य कार्यक्रमों पर भी जोर दिया जायेगा। गाँव-गाँव जाकर लोगों को यमुना पदयात्रा में भाग लेने के लियें आमंत्रित किया जायेगा। यमुना रक्षक दल की इस पदयात्रा में कई काॅलेज व स्कूलों के छात्र-छात्रायें भी भाग लेंगे। हिन्दू आस्था से जुड़ी जीवन देने वाली यमुना जहरीली हो गयी है, जिससे लोगा का जीवन खतरें में है। लोगो में कैंसर, चर्म रोग समेत अन्य रोगों की समस्या हो रही है। यमुना की धारा को पावन करने के लिये 11 मार्च को दो लाख लोग पैदल पदयात्रा कर 21 मार्च को दिल्ली जंतर-मंतर पहुँचेंगे। वहाँ केन्द्र सरकार के समक्ष समस्त यमुना के मुद्दे रखे जायेगें।     बैठक की जानकारी यमुना रक्षक दल के महासचिव रमेश सिसौदिया जी ने दी।  

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उत्‍तर पूर्वी क्षेत्र बिजली प्रणाली सुधार परियोजना (एनईआरपीएसआईपी) को मंजूरी देने का सरकार का फैसला उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों के आर्थिक विकास के लिए उसकी प्रतिबद्धता के अनुरूप है।  उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों में वितरण एवं पारेषण प्रणालियां काफी कमजोर रही हैं और इसके मद्दे नजर केन्‍द्रीय बिजली प्राधिकरण ने पावर ग्रि‍ड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड पीजीसीआईएल के साथ विचार विमर्श कर उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों के लिए एक व्‍यापक योजना बनाई है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में हाल ही में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने छह राज्‍यों असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैंड के लिए एक परियोजना को मंजूरी दी है। इस परियोजना का मकसद इन राज्‍यों में वितरण एवं पारेषण प्रक्रिया को मजबूत करना है तथा इस पर 5111.33 करोड़ रुपये की अनुमा‍नित लागत आएगी जिसमें क्षमता निर्माण पर होने वाला खर्च 89 करोड़ रुपये शामिल है। इस परियोजना का मुख्‍य उद्देश्‍य उत्‍तर पूर्व क्षेत्र के राज्‍यों में वितरण एवं पारेषण बुनियादी ढांचे की कमियों का पता लगाना है। इससे पहले 4754.42 करोड़ रुपये लागत वाली इसी तरह की योजना को अरूणाचल प्रदेश और सिक्‍कि‍म के लिए मंजूरी दी गई थी। बिजली मंत्रालय की नई केन्‍द्रीय क्षेत्र योजना के तहत इस स्‍कीम को लिया जाना है और इसे विश्‍व बैक से प्राप्‍त होने वाले ऋण की सहायता और भारत सरकार द्वारा क्रियान्‍वित किया जाएगा। एनईआरपीएसआईपी में आने वाले खर्च की 50:50 प्रतिशत राशि विश्‍व बैक और भारत सरकार द्वारा वहन की जाएगी लेकिन क्षमता निर्माण पर आने वाले खर्च 89 करोड़ रुपये को पूरी तरह भारत सरकार वहन करेगी। यह परियोजना तीन चरणों वाले विकासात्‍मक कार्यक्रम का पहला चरण है जिसके लिए विश्‍व बैक 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रत्‍येक की तीन किश्‍तें देगा। यह परियोजना पीजीसीआईएल के जरिए छह उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों के सहयोग से क्रियान्‍वि‍त की जाएगी और इसे चार वर्षों की अवधि में शुरू किया जाएगा। परियोजना शुरू होने के बाद इसके स्‍वामित्‍व एवं रख रखाव की जिम्‍मेदारी राज्‍य सरकारों की होगी। फरवरी 2014 की कीमतों के आधार पर इस परियोजना की अनुमानित लागत 5111.33 करोड़ रुपये बताई गई थी। वर्तमान में, उत्‍तर पूर्व के सभी छह राज्‍य 132 किलोवाट और कम क्षमता के पारेषण नेटवर्क से जुडे है इन राज्‍यों में 33 किलोवाट प्रणाली बिजली वितरण प्रणाली की रीढ़ है। राज्‍यों में वितरण एवं पारेषण के बीच मांग एवं उपलब्‍धता के अंतर को कम करने के लिए उत्‍तर पूर्वी के सभी छह राज्‍यों में 132 किलोवाट/220 किलोवाट कनेक्‍टीविटी आवश्‍यक है ताकि वोलटेज प्रबंधन समुचित हो और वितरण में कम से कम हानियां हो। इसी प्रकार उत्‍तर पूर्वी के सभी छह राज्‍यों में वितरण प्रणाली मुख्‍यत: 33 किलोवाट नेटवर्क पर आधारित है जिसमें व्‍यापक रूप से सुधार किया जाएगा। इस परियोजना के क्रियान्‍वयन से एक विश्‍वसनिय राज्‍य पावर ग्रिड की स्‍थापना होगी और अन्‍य लोड सेंटरों से इसके कनेक्‍शन में सुधार होगा और इससे सभी श्रेणी के उपभोक्‍ताओं को ग्रिड से जुडी बिजली के लाभ मिल सकेंगे। यह परियोजना राज्‍यों के ऐसे गांव और शहरों को जरूरी ग्रिड क्नेक्टिवीटी उपलब्ध करायेगी जहां केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों के तहत निचले स्तरों पर वितरण प्रणाली का विकास किया जा रहा है। यह परियोजना "सभी के लिए बिजली" राष्ट्रीय के राष्ट्रीय उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास है। इसमें ग्रिड से जुड़ी बिजली तक उपभोक्ताओं की पहुंच में वृद्धि के जरिये बिजली आपूर्ति की उपलब्धता पर ध्यान दिया गया है जिससे समावेशी वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा। इस परियोजना से इन राज्यों में प्रति व्यक्ति बिजली खपत में बढ़ोतरी होगी। और इससे पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के विकास में योगदान मिलेगा। फिलहाल ये राज्य बिजली की औसत राष्ट्रीय खपत से काफी पीछे है। राज्य की बिजली कंपनियों के अधिकारियों को केंद्रीय क्रियान्वयन एजेंसी के साथ सहयोग का फायदा मिलेगा और वे विकास के दूसरे और तीसरे चरण में व्यापक भूमिका निभाने में सक्षम होंगे।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई सरकार ने पहले छह माह का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के वास्तविक क्षेत्रों की गतिविधियों में वापसी के पूर्वानुमान जैसे कि कृषि, उत्पादन और सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय और काफी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है।  ऐसा नहीं है कि सरकार ने नीतिगत मोर्चे पर सुधारों की बड़ी सूची उद्घाटित की है, जिस वजह से बाजार में उछाल आया है लेकिन दूसरी तरफ तथ्य यह भी है कि मौजूदा सरकार ने उस नीतिगत सुस्ती को तोड़ा है और वास्तविक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बहुत सारी उन कमियों में सुधार सुनिश्चित किए हैं जिन्होंने पहले घरेलू व अंतरराष्ट्रीय दोनों ही तरह के निवेशकों की धारणाओं को नुकसान पहुंचाया था। नई सरकार ने उन्हें आशावान बनाया है। एक दशक बाद केंद्र की सत्ता में लौटी एनडीए सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा जुलाई 2014 में पेश किए गए पहले बजट से शुरू हुए सुधार अभी तक जारी हैं, सरकार ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक साथ नीतियों में बदलाव की बाढ़ लाने जैसे आत्मघाती व खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसे काम की बजाय सावधानीपूर्वक व नियंत्रित ढंग से कदम उठाने शुरू किए हैं। निश्चित तौर पर, नई सरकार की इस उपलब्धि का श्रेय निचले सदन में पूर्ण बहुमत को भी दिया जाना चाहिए। दो दशकों के गठबंधन शासन में आर्थिक नीतियां, गठबंधन के दबाव और अनिवार्यताओं की शिकार रहीं और इस दौरान कुछ भी अलग नहीं कर सकी, ना ही कोई वृद्धि देखने को मिली। पिछली सरकार की नीतिगत अनिश्चितता की वजह से बुनियादी विचारों को बढ़ावा नहीं मिल सका। बल्कि नीतिगत कमजोरी को खत्म करने के मकसद से कुछ व्यावहारिक नीतियों को सजा संवारकर उन्हें आधे-अधूरे तरीके से लागू कर दिया गया। शासक में बदलाव का पहला लक्षण सरकार के उस फैसले में देखा गया जिसमें कई सारी कैबिनेट समितियों व अधिकार प्राप्त मंत्री समूहों को विघटित करने को कहा गया। यह समितियां एक दशक से महत्वपूर्ण फैसलों पर कुंडली मार कर बैठी थीं और निर्णय लेने में अनावश्यक समय जाया कर रही थीं और इसमें शामिल विपक्षी पार्टियों की गर्मागर्मी एक-दूसरे के फैसलों को रोक देती थी। इन्हें भंग करने के फैसले से अर्थव्यवस्था में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह देखा गया। नीति निर्धारण से संबंधित अंतर-मंत्रालयी मुद्दों पर फैसले के लिए एक पखवाड़े की समय सीमा निर्धारित कर दी गई। इससे साझीदारों में एक अच्छा संदेश गया। अब उन्हें नीति निर्धारण में अनिश्चितता से अटकने की परवाह नहीं रही और ना ही निवेशकों को लंबे समय तक अधर में टंगे रहने की चिंता रही। कृषि के मुख्य क्षेत्र में सरकार ने कुछ कड़े फैसले लिए और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में केवल सही वृद्धि की घोषणा की जिससे कि अक्षरणीय खाद्य सब्सिडी के बिल को ठीक किया जा सके। इससे सार्वजनिक खर्च में हुई बचत का सार्वजनिक कार्यक्रमों में निवेश के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही साथ प्राधिकारियों ने खाद्य पदार्थों के जन भंडारण को भी कम किया और उन्हें खुले बाजार में निकाला ताकि इस तरह के जमा की खाद्य सामग्री के दाम में कमी आ सके। यह भी सुनिश्चित किया गया कि बाजार में अनाज की और अधिक आपूर्ति की अनुमित दी जाए बजाय इसके कि वो गोदामों में पड़े-पड़े सड़े। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पुनर्गठन का प्रयास जारी है, वितरण घाटे और परिवहन पर भारी खर्च में कटौती की जा रही है व जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) को प्रभावी बनाया जा रहा है, ताकि वास्तविक जरूरतमंद सस्ती चीजों की आपूर्ति से दूर ना रह जाएं। किसानों व उत्पादकों, ज्यादातर फल, सब्जी व स्थानीय उपभोग की वस्तुओं के उत्पादकों को इन सामानों को स्थानीय कृषि उत्पाद विपणन समितियों को बेचने के बोझ से मुक्ति मिली और इससे वे अपने परिश्रम, पसीने व मेहनत का व्यापक खुले बाजार में अच्छा दाम पा सकते हैं। चूंकि सरकार किसानों को सहायता के लिए कटिबद्ध है इसलिए उनकी कड़ी मेहनत का मूल्य मिले और इसके लिए सरकार मौजूदा कार्यक्रमों को पुनर्गठित कर व विस्तारित सेवाओं संबंधी शिकायतों को दूर कर तनावमुक्त खेती का वातावरण तैयार करने पर ध्यान दे रही है ताकि बर्बादी को खत्म किया जा सके और उत्पादकता को बढ़ाया जा सके। कृषि ऋण लक्ष्य आठ लाख करोड़ रुपये तय किए गए हैं साथ में सरकार ने ब्याज पर छूट योजनाओं को भी जारी रखा है। ग्रामीण ढांचागत विकास फंड को 25,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है। उत्पादन के मोर्चे पर सरकार ने “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम शुरू किया है ताकि भारतीय उत्पाद मूल्य व गुणवत्ता के मामले में ना केवल देश में बल्कि बाहर भी प्रतिस्पर्धा में खुद को खड़ा कर सके। घरेलू उत्पादन को समर्थ बनाने के क्रम में स्थानीय उत्पादन के लागत में कमी के लिए प्राधिकारियों ने कई कदम उठाए हैं जिससे की देश में प्रशासनिक कार्यवाहियों से व्यावसायिक संस्कृति सुधारी जा सके ताकि वृद्धिउन्मुख व व्यवसाय उन्मुख नजरिये की ध्वनि साफ सुनाई दे और उद्यमी ऐसे माहौल का लाभ ले सके। यहां तक कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने थोड़े समय बाद फिर से कहा कि वृद्धि उन्मुख व व्यवसाय उन्मुख नजरिया, गरीबसमर्थित नीतियों के बरख्श खड़ी नहीं है। नतीजतन उच्च वृद्धि से सरकार के उन सार्वजनिक कार्यक्रमों जिसमें गरीबी उन्मुलन में मदद करने वाले वास्तविक कल्याण उपाय भी शामिल हैं, के खर्च में बढ़ोतरी की भरपाई हो सकेगी। सरकार ने महत्वपूर्ण क्षेत्र जैसे कि रक्षा व रेलवे को बाहरी निवेश के लिए खोल दिया है और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से निश्चित तौर पर आगे चलकर इन क्षेत्रों में तकनीक के हस्तांतरण व बेहतर प्रबंध कौशल का विकास देखने को मिलेगा। उत्पादन क्षेत्र को ऊर्जा केंद्र की जरूरत है, सरकार ने घरेलू व औद्योगिक दोनों उपभोक्ताओं की ऊर्जा स्थितियों में सुधार के लिए कई सारे कदम उठाए हैं।  साल 1993 के बाद से आवंटित 200 कोल ब्लॉक के आवंटन को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दर्जनों ऊर्जा क्षेत्र कंपनियों को बिजली वितरण पर अनिश्चितता में डाल दिया था लेकिन सरकार इस भ्रम की स्थिति को खत्म करने के लिए 20 अक्टूबर को एक अध्यादेश लाई। सरकार अब इन ब्लॉक्स को दुबारा पारदर्शी, ऑन नीलामी के जरिये आवंटित सकती है। पूर्व में इसे अनैतिक तरीके से बांटने और आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। कोयला क्षेत्र में नवीनतम नीलामी से ऊर्जा, स्टील व सीमेंट कंपनियों को कोयले की आपूर्ति जारी रखने में सहायता मिलेगी और कोयला उत्पादक राज्यों केंद्र की बजाय नीलामी से सीधे राजस्व मिल सकेगा। नए अध्यादेश में कोल खदानों को निजी कंपनियों के लिए खोलने की जरूरत को भी मान्यता देने का प्रावधान रखा गया है।  इस सब ने अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी के हालिया नजरिये में बदलाव लाया है और इसने भारतीय गैर-आर्थिक कोर्पोरेट को नकारात्मक से स्थायी का दर्जा दिया है। इसकी पृष्ठभूमि में ठोस और वाजिब वजह है, मूडी के उपाध्यक्ष व वरिष्ठ ऋण अधिकारी विकास हेलेन के शब्दों में कहें तो, “भारत की अर्थव्यवस्था सुधर रही है, पूंजी बाजार तक पहुंच बढ़ी है और बाजार समर्थित नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया जा रहा है जिससे कॉर्पोरेट पूंजी के प्रवाह को बढ़ावा मिलेगा और इससे बड़े स्तर पर बिजनेस में वृद्धि होगी।” इसके अलावा अप्रैल 2014 से भारत में एफडीआई के प्रवाह में बढ़ोतरी हुई है। एफडीआई में बढ़ोतरी का ये ट्रेंड आने वाली तिमाही में भी जारी रहने वाला है क्योंकि देश में वृद्धि को बढ़ाने वाली नीतियों व सकारात्मक आर्थिक माहौल का दौर चल रहा है। मूडी के एक अन्य वरिष्ठ शोध विश्लेषक राहुल घोष भी कहते हैं कि “एफडीआई के प्रवाह में बढ़ोतरी से भारत के खाते में मौजूदा कमी को दूर किया जा सकेगा, इससे अर्थव्यवस्था की सामने बाहर की विपरित परिस्थितियों को कम किया जा सकेगा।”  आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर डॉ. राकेश मोहन ने हाल में मेक्सीने ग्लोबल इंस्टीट्यूट की अनु मेडगावकर के साथ लिखे पत्र में माना है कि भारत का आर्थिक आंकड़ा “आशाजनक” है। 2025 तक  जीडीपी वृद्धि का वार्षिक औसत 6.4 से 7.7 के बीच रहने का अनुमान है। वह कहते हैं कि पिछले साल के 4.7 प्रतिशत दर के मुकाबले यह 2012 तक के पिछले दशक के 7.7 प्रतिशत औसत के करीब है। इसके अतिरिक्त वह यह भी कहते हैं कि यह बढ़ोतरी भारत को दुनिया के सर्वाधिक तेज वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं में रखेगी और भारत में विवेकगत सामान का उपभोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या जो 2012 में 27 मिलियन थी वह 2025 तक बढ़कर 89 मिलियन हो जाएगी। सबसे खास बात, जापानी आर्थिक सेवा प्रमुख नोमुरा ने कहा कि भारत के लिए इसके समग्र महत्वपूर्ण संकेत सुझावों को मुताबिक इसकी अर्थव्यवस्था पहले ही उछाल पर है और यह व्यवसाय चक्र की पुनर्बहाल के शुरुआती चरण में है। जापान का आर्थिक प्रमुख ठीक ही यह अनुमान लगा रहा है कि भारत का सुधार होगा लेकिन ‘चरणबद्ध तरीके’ से, न कि हड़बड़ी में और ‘सुधारों के ठोस स्तर’ ने ही इस सरकार को वैश्विक निवेशक समुदाय के लिए प्यारा बना दिया है। नीति विश्लेषकों के अनुसार इस समुदाय को भारत आने व यहां लंबे समय के लिए निवेश कर अर्थव्यवस्था में मौजूदा सुधार का सहजता से लाभ लेने का मौका है इससे उन्हें आपेक्षित लाभ से ज्यादा मिल सकेगा।

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सतत ऊर्जा आपूर्ति की जरूरत के लिए उपलब्‍ध ऊर्जा संसाधन का दोहन आवश्‍यक हो जाता है। इन संसाधनों में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन अग्रणी एवं महत्‍वपूर्ण हैं। यह अब एक स्‍थापित तथ्‍य है कि नवीकरणीय ऊर्जा सतत विकास का अभिन्‍न अंग बन सकती है, क्‍योंकि यह अनंत है और इसके पर्यावरण हितैषी पहलू है।  नवीकरणीय ऊर्जा काफी हद तक शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा संकट के समाधान में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अब तक देश में लगभग 33 हजार 200 मेगावाट औसतन क्षमता की नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं संस्‍थापित है, जिनमें 22,168 मेगावाट क्षमता की पवन ऊर्जा, 2,870 मेगावाट की सौर ऊर्जा, 4,225 मेगावाट की जैव ऊर्जा और 3,939 मेगावाट की लघु पनबिजली ऊर्जा परियोजनाएं शामिल हैं। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय विभिन्‍न शैक्षिक और अनुसंधान संस्‍थानों, स्‍वायत संगठनों और उद्योग के जरिये प्रौद्योगिकी विकास और प्रदर्शन के लिए अनुसंधान और विकास के लिए सहायता प्रदान करता है।  इसके अलावा मंत्रालय ने तीन अनुसंधान संस्‍थान-राष्‍ट्रीय सौर ऊर्जा संस्‍थान, गुडगांव, राष्‍ट्रीय पवन ऊर्जा संस्‍थान-चेन्‍नई और सरदार स्‍वर्ण सिंह राष्‍ट्रीय संस्‍थान-कपूरथला, पंजाब में क्रमश: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ऊर्जा में अनुसंधान और विकास के लिए स्‍थापित किए हैं। 11वीं योजना में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए बजट से 500 करोड़ रुपये के आवंटन से सौर ऊर्जा, जैव ऊर्जा, हाइड्रोजन और ईंधन सैल के क्षेत्रों के लिए 525 करोड़ रुपये के परिव्‍यय से अनुसंधान और विकास की 169 परियोजनाओं को स्‍वीकृत किया गया और 239.56 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई। शुरू की गई अनुसंधान और विकास की परियोजनाओं में सौर सैलों में उच्‍चतर कुशलता, मेगावाट स्‍तर का सौर ताप विद्युत उत्‍पादन, बायोमास ऊर्जा में उन्‍नत अनुसंधान, हाईड्रोजन उत्‍पादन, भंडारण और उपयोग तथा ईंधन सैलों के विकास की परियोजनाएं शामिल हैं। बायोगैस क्षेत्रों में विभिन्‍न अनुप्रयोगों के लिए बायोगैस शुद्ध करने और बोटलिंग करने की प्रदर्शन परियोजनाएं शुरू की गई। चालू योजना अवधि के विगत ढाई वर्षों में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा में अनुसंधान और विकास पर 208.12 करोड़ रुपये व्‍यय किया गया। मंत्रालय ने वर्तमान 12वीं योजना के लिए अनुसंधान और विकास के लिए बजट प्रावधान बढ़ाकर इसे 910 करोड़ रुपये कर दिया है। नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों; सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास, बायोगैस, जैव तरल ईंधन और हाईड्रोजन/ईंधन सैल प्रौद्योगिकियों समेत अनुसंधान और विकास के प्रमुख क्षेत्रों में लागत में कमी लाने और कुशलता में सुधार पर विेशेष ध्‍यान केन्द्रित किया जाना है। नवीकरण ऊर्जा क्षेत्र में सक्रिय संस्‍थान राष्‍ट्रीय सौर ऊर्जा संस्‍थान संस्‍थान का मुख्‍य उद्देश्‍य जवाहर लाल नेहरू राष्‍ट्रीय सौर मिशन (जेएनएनएसएम) के क्रियान्‍वयन में मंत्रालय को सहायता देना और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान, परीक्षण और प्रौद्योगिकी विकास के लिए सर्वोच्‍च राष्‍ट्रीय केन्‍द्र के रूप में काम करना है। अनुसंधान के क्षेत्रों में सौर फोटोवोल्‍टिक, सौर ताप ऊर्जा भंडारण और सौर संसाधन आकलन शामिल हैं। राष्‍ट्रीय पवन ऊर्जा संस्‍थान, चेन्‍नई (एनआईडब्‍लूई) एनआईडब्‍लूई पवन ऊर्जा विकास के लिए तकनीकी केन्‍द्रीय सम्‍पर्क के रूप में काम करता है और देश में पवन ऊर्जा क्षेत्र के विस्‍तार में सहायता देता है। संस्‍थान द्वारा की जा रही गतिविधियों में तट पर और तट क्षेत्र में पवन संसाधन आकलन, पवन टर्बाइन काम काज परीक्षण, ग्रिड कनेक्‍शन और ऊर्जा गुणवत्‍ता, प्रचालन और रखरखाव, पवन ऊर्जा विकास, मानव संसाधन विकास, अनुसंधान और डिजाइन विकास के लिए राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग शामिल हैं। संस्‍थान ने 73 स्‍थानों पर 100 मीटर मेट-मास्‍ट वाले पवन संसाधन आकलन के लिए वास्‍तविक समय का नेटवर्क और देशभर में सौर रेडिएशन संसाधन आकलन के लिए 121 स्‍वचालित केन्‍द्र स्‍थापित किए हैं। संस्‍थान गुणवत्‍तापूर्ण पवन टर्बाइनों के व्‍यवस्थित विकास के अलावा पवन टर्बाइनों के भारतीय मानकों को तैयार करने पर भी कार्य कर रहा है। सरदार स्‍वर्ण सिंह राष्‍ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा संस्‍थान इस संस्‍थान का मुख्‍य उद्देश्‍य जैव ऊर्जा में अनुसंधान, डिजाइन, विकास, परीक्षण, मानकीकरण और प्रौद्योगिकी प्रदर्शन से संबंधित कार्य करना और इसमें मददगार बनना है। अनुसंधान और विकास गतिविधियों में जैव ऊर्जा, जैव ईंधनों और ठोस सिन्‍थेटिक ईंधनों, परिवहन के लिए तरल और गैस के स्‍वरूप, एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर लाये जाने वाले तथा स्थिर अनुप्रयोग का विकास और विभिन्‍न प्रकार के बायोमास के प्रभावी इस्‍तेमाल के लिए नई प्रौद्योगिकियों का विकास शामिल हैं।

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मथुरा। भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारियों ने सभी प्रकोष्ठों के संयोजकों द्वारा नगर में भाजपा के सदस्यता अभियान कार्यक्रम के तहत बाजारों में बैठकर लोगों को पार्टी की सदस्यता के लिए कार्य करते तमाम लोगों को सदस्यता ग्रहण कराई। बाजारों गली-मौहल्लों में बैठे भाजपाईयों ने पार्टी की सदस्यता को लेकर लोगों को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। होलीगेट, कलेक्ट्रेट, कृष्णानगर, छत्ताबाजार, जयसिंहपुरा, सदरबाजार, बजरंग चैराहा, सरस्वती कुण्ड, लाल दरवाजा, मसानी आदि क्षेत्रों में कैम्प लगाकर यह कार्य किया जा रहा है। भाजपा के नगर अध्यक्ष संजय शर्मा, हरिओम शर्मा, विपुल पारीक आदि ने लोगों से भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने की अपील भी की है। वहीं चैबिया पाड़ा क्षेत्र के वार्ड 43 के अन्र्तगत कोतवाली रोड पर सदस्यता कैम्प लगाया गया जिसमें रविकांत गर्ग, गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, काशीनाथ चतुर्वेदी, मनीष चतुर्वेदी, सुरेंद्र चतुर्वेदी, किशन चतुर्वेदी, विशाल चतुर्वेदी हनू, विष्णुदास अग्रवाल, संजय शर्मा, विकास चतुर्वेदी आदि उपस्थित थे।  

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शिविर का शुभारंभ करते चेयरमैन रामकृष्ण वर्मा व सुजीत वर्मा बल्देव। बल्देव में चल रहा अगहन पूर्णिमा मेला इन दिनों अपने पूर्ण यौवन पर है, सुबह से शुरू होने वाले इस मेले में देर रात्रि तक दर्शकों की भारी भीड़ मेला देखने को उमड़ती रहती है। श्रृ(ालु भक्त दाऊजी महाराज के दर्शन कर पुण्य लाभ कमा कर बल्देव के प्रसि( मेला को देखकर आनंद प्राप्त करते हैं। मेले में युवाओं की सर्वाधिक भीड़ वैरायटी शो पर दिखाई देती है, वहीं बच्चे झूलों पर झूलकर मनोरंजन करते दिखाई दे रहे हैं। सर्कस व मौत के कुंआ पर भी भारी भीड़ लगी रहती है। वहीं महिला बाजारों में भी महिलाएं खरीददारी करते हुए नजर आती हैं। मेला में लगे प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शाखा द्वारा लगाए गए शिविर का शुभारंभ चेयरमैन रामकृष्ण वर्मा द्वारा किया गया। इस अवसर पर सुजीत वर्मा, नवीन वर्मा, मेला ठेकेदार कमल पांडे आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। वहीं सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से मला परिसर में अस्थाई पुलिस कैंप भी बनाया गया है। थाना प्रभारी अमित कुमार सुरक्षा की दृष्टि से मेला परिसर पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने बताया कि गुंडागर्दी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।  

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