सती का हुआ मान भंग किया यज्ञ अग्नि में प्रवेश
मथुरा। श्री रामलीला सभा मथुरा द्वारा श्रीकृष्ण जन्म स्थान के लीला मंच पर चल रही श्री रामलीला महोत्सव के अन्तर्गत सती मोह लीला का मंचन हुआ। लीला मंचन में सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने देवताओं की एक सभा बुलायी। जिसमें किसी भी यज्ञ में किस देवता का आसन कहाॅं हो व उसको कितना भाग मिले, यह निर्णय किया गया। सभा में श्रीविष्णु व शंकर भगवान सहित समस्त देवता उपस्थित हुए। सभा के दौरान भगवान शिव ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो गये। उसी समय यज्ञ सभा के अध्यक्ष नियुक्त किए गये, दक्ष प्रजापति सभा मे पहुॅंचे। समस्त देवता अध्यक्ष के आने पर अपने आसन से खड़े हो गये लेकिन भगवान शिव समाधिस्थ अवस्था में होने के कारण खड़े नहीं हुए। इससे दक्ष प्रजापति ने शिव के द्वारा अपना असम्मान मान कर आदेश दिया कि शिव का यज्ञ में न आसन होगा न ही यज्ञ का कोई भाग उनको प्राप्त होगा। सभा में वाद विवाद के दौरान शिव ने ब्रह्मा से सभा विसर्जन करने का अनुरोध किया। ब्रह्माजी ने सभा विसर्जित कर दी। एक बार स्वयं दक्ष प्रजापति ने अपने यहाॅं यज्ञ किया। उसने अपनी सभी पुत्रियों व जामाताओं को निमंत्रित किया। लेकिन सती व शिव को न्यौता नहीं भेजा। सती का अपने मायके से लगाव व मोह के चलते बिना निमंत्रण के शिव से हठ करती हैं। शिव के समझाने व मना करने के बावजूद मायके यज्ञ में भाग लेने जाती हैं। वहाॅं सभी के लिए आसन थे परन्तु शिव के लिए आसन की व्यवस्था न देख कर अपमान से क्रोधित होकर यज्ञ अग्नि में प्रवेश कर अपने आपको भस्म कर देती हैं। उधर शिव की समाधि भंाग होती है। दिव्य दृष्टि से इस घटनाक्रम को देखते हैं वं क्रोध में अपनी जटाओं से एक बाल तोड़कर जमीन पर पटकते हैं। भगवान नारायण के आदेश पर कि जो माता अपने पुत्रो की ओर पीठ करके सो रही हो उसके पुत्र का सिर काट कर लाया जाये। आदेश पर एक बकरा का सिर काट कर लाया गया और दक्ष प्रजापति के सिर पर लगा दिया गया। तत्पश्चात् सती राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेती हैं। प्रसाद सेवा रामकिशन अग्र्रवाल बसेरा ग्रुप की ओर से की गयी। लीला मे गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी, नन्द किशोर अग्र्रवाल, चैधरी महेशचन्द, राम नारायण, अशोक पाठक, संजय बिजली, अनूप टैन्ट, बाॅॅकेबिहारी तेल वाले, मूलचन्द गर्ग, प्रदीप, चरत लाल सर्राफ आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।
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