मथुरा

मथुरा :  प्रधानाचार्य राजकीय औद्यौगिक प्रशिक्षण संस्थान एमसी शर्मा ने अवगत कराया है कि आईटीआई प्रवेश के लिए आवेदन पत्र बेवसाइट से तथा विद्यालयों में उपल्बध है।

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मथुरा : शहर कोतवाली क्षेत्र की रिपोर्टिंग चौकी कृष्णा नगर क्षेत्र के राजमार्ग पर कार की टक्कर से एक वृद्ध की मौत हो गई। घटना की सूचना पर पहुंची पुलिस ने घटना स्थल का निरीक्षण कर शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा दिया।

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गोवर्धन : विद्या भारती के अंतर्गत चलने वाले सरस्वती शिशु मंदिर एवं विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य का तीन दिवसीय सम्मेलन मुरारी वाली कुंज स्थित सरस्वती विद्या मंदिर में 11 से 13 मई तक आयोजित किया जा रहा है।

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उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के भद्वसियां गांव में अप्रैल के अंतिम सप्ताह में नियमित रूप से आयोजित होने वाले प्रतिरक्षण अभियान से एक दिन पहले 120 वर्ष की मुस्लिम महिला नूरजहां गांव के आंगनवाड़ी में युवा माताओं के साथ बैठक कर रही हैं। समुदाय से जुड़े होने के नाते नूरजहां माताओं के साथ आसानी से संवाद कायम कर लेती हैं। आज उनका जोर नवजात शिशुओं और पांच वर्ष तक के बच्चों की नियमित प्रतिरक्षण की महत्ता पर है। नूरजहां स्वास्थ्य और साफ-सफाई की जरूरत पर भी जोर देती हैं। माताएं कुछ अपनी गोद में बच्चे लिए ध्यान से नूरजहां की बातें सुनती हैं। बाद में पूछे जाने पर निरक्षर और अर्द्ध साक्षर माताएं विश्वासपूर्वक यह बताती हैं कि प्रतिरक्षण क्यों जरूरी है और नवजातों तथा गर्भवती महिलाओं के लिए इसका क्या महत्व है। नूरजहां पहले पल्स पोलियो अभियान में स्वयंसेवी के रूप में काम करती थीं और बाद में उन्हें कम्युनिटी मोबिलाइरकेशन को-आर्डिनेटर (सीएमसी) बनाया जाता है।   वर्ष 2001 में पोलियो अभियान के लिए यूनीसेफ के सहायता कार्यक्रम के तहत लगभग 5000 सीएमसी को राज्य सरकार के स्वास्थ्यकर्मियों तथा अन्य हित धारकों के साथ 7000 अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में तैनात किया गया। अब इस समर्पित कार्यकर्ताओं के इस नेटवर्क को नियमित प्रतिरक्षण कार्यक्रम के लिए बरकरार रखा गया है। संयुक्त राष्ट्र की यह संस्था नियमित प्रतिरक्षण के स्तर को बढ़ाकर तथा अग्रणी स्तर के स्वास्थ्य कर्मियों को व्यापक तरीके से प्रशिक्षित कर शिशुओं को होने वाली सामान्य बीमारियों की पहचान और निदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को समर्थन दे रही है।   2006 में पोलियो के उभरने के समय मुरादाबाद इसका केन्द्र था लेकिन प्रतिरक्षण की आक्रामक रणनीति से अंतिम किस्म का एक पोलियो का मामला सामने आया। अब तो पूरा भारत पोलियोमुक्त घोषित हो चुका है।   यह महत्वपूर्ण है कि साल 2010-2011 में 12 से 23 महीने की आयु वर्ग में केवल 24.1 प्रतिशत बच्चों को पूर्ण प्रतिरक्षण के लिए कवर किया गया। मुरादाबाद के जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. आरके शर्मा बताते हैं कि कवरेज बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया है। वास्तव में यह पूरे उत्तर प्रदेश में एक प्रतिशत अधिक है। शिशु मृत्युदर गिरकर प्रति 1000 शिशुओं में 52 रह गई है।   मुरादाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव यादव कहते हैं कि भारत के पोलियोमुक्त होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती प्रतिरक्षण कार्यक्रम की गति को बनाए रखने की है क्योंकि विश्व को अभी भी उभरने वाली बीमारियों से मुक्त होना है। पोलियो के विषाणु अभी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नाइजीरिया में व्याप्त हैं लेकिन पाकिस्तान में प्रतिरक्षण पर प्रहार से विषाणु को सीमा पार जाने की अनुमति मिली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार पाकिस्तान, सीरिया तथा कैमरून ने विषाणु को अफगानिस्तान, इराक और भूमध्यवर्ती गिनी में फैलने की इजाजत दी।   डॉ. यादव का कहना है कि स्वास्थ्य कर्मचारी अन्य हित धारकों के साथ किसी तरह की सुस्ती नहीं बरत सकते। उनका कहना है कि खसरा, डिप्थीरिया, टिटनेस तथा टीबी जैसी बीमारियों को रोकने के लिए उसी उत्साह से प्रतिरक्षण कार्यक्रम चलाना होगा जिस उत्साह से पल्स पोलियो अभियान चलाया गया। उन्होंने बताया कि बाहर से आकर बसने वाले लोगों के क्षेत्रों तथा अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में विशेष प्रतिरक्षण सत्र आयोजित किए जाते हैं।   मुरादाबाद जिले में 271 सीएमसी, 1521 आशा कर्मियों और अन्य हित धारकों के साथ मिलकर जिले में अधिक बच्चों के प्रतिरक्षण अभियान में लगे हैं। आशा कर्मी को नियमित प्रतिरक्षण अभियान में एक सत्र के लिए 150 रुपये दिए जाते हैं। नियमित प्रतिरक्षण वैकल्पिक टीका डिलीवरी को मजबूती प्रदान करने में सेवा देने के लिए आशा कर्मी को प्रति सत्र 75 रुपये भी दिए जाते हैं। एक वर्ष तक की आयु के बच्चे को पूर्ण प्रतिरक्षण के लिए आशाकर्मी के 100 रुपये प्रति शिशु और दो वर्ष की आयु के बच्चे को पूर्ण प्रतिरक्षण के लिए 50 रुपये प्रति शिशु दिया जाता है।   जहां तक सीएमसी का प्रश्न है तो स्थानीय स्तर पर सक्रिय गतिविधियां चलाने के अलावा नूरजहां जैसे सीएमसी समुदाय को संगठित कर और घर-घर जाकर बच्चों का पता लगाती है। नूरजहां जैसे सीएमसी समुदाय के प्रभावशाली लोगों जैसे इमाम या शिक्षक सहित ग्राम स्तर के नेताओं से संपर्क साधते हैं। सीएमसी प्रतिरक्षण स्वास्थ्य शिविर आयोजित करते हैं और उसके आयोजन में सहायता देते हैं। यूनिसेफ द्वारा नियुक्त और प्रशिक्षित सीएमसी का चुनाव समुदाय से ही किया जाता है। वे बच्चों, नवजात शिशुओं, गर्भवती माताओं की खोज करते हैं और उनके प्रतिरक्षण की जरूरतों का मूल्याकन करने के साथ-साथ जागरूकता फैलाकर आशा कर्मियों के प्रयास में मदद करते हैं। इसके बाद डाटा बैंक टीकों की उगाही के लिए सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) जैसे स्वास्थ्यकर्मियों के साथ आकड़े साझा करते हैं। इस काम में आशा तथा आगनवाड़ी कर्मियों की मदद लेकर संस्थागत डिलीवरी तथा स्तनपान के बारे में जागरूकता फैलाई जाती है। प्रतिरक्षण के दिन सीएमसी बच्चों को टीका केन्द्र तक लाने के लिए घर-घर जाते हैं।   अभियान की गति को बनाए रखने के लिए धार्मिक नेताओं तथा गांव के प्रभावशाली व्यक्ति लोगों से आग्रह करते हैं कि वह अपने बच्चों का प्रतिरक्षण सुनिश्चित करें। नियमित प्रतिरक्षण से एक दिन पहले दिनगरपुर के इमाम मोहम्मद इसुफ ने गांव के लोगों से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि वह अपने बच्चों को प्रतिरक्षण शिविरों तक ले जाएं। इसका परिणाम यह हुआ कि अपने महिलाएं अपने बच्चों को लेकर प्रतिरक्षण केन्द्र गई। अख्तरी अनेक महिलाओं की तरह अपनी पोती को गोद में लेकर प्रतिरक्षण केन्द्र पहुंची। अख्तरी ने स्वीकार किया की कि इमाम जैसे सम्मानित लोग या शिक्षित लोग जब अभियान का हिस्सा बनते हैं तो अंतर आता है और उनकी आशंकाएं और डर खत्म होता है।   लेकिन, अभी भी कई परिवार हैं जिन्हें प्रतिरक्षण को लेकर गलतफहमी हैं लेकिन ऐसे परिवारों की संख्या कम हो रही है।   उदाहरण के लिए महमूदपुर माफी गांव में आशा कर्मी पायल और गांव के सीएमसी चमनदेश ने रहीसी को यह समझाने के लिए उसके पास कई बार गए कि तीन महीने के उसके पोते असद का नियमित प्रतिरक्षण कितना आवश्यक है। लेकिन, रहीसी अड़ी हुई थी। वह बोली ‘असद के छोटे भाई (ढाई वर्ष) का वज़न प्रतिरक्षण के बाद बढ़ गया है और सुई लगने के बाद में अपने बच्चे को अधिक समय तक रोने नहीं दे सकती और वह पूरी रात चिल्लाएगा और कोई व्यक्ति सो नहीं पाएगा।'   रहीसी ने प्रतिरक्षण का भारी विरोध किया और अपने पोते को छूने नहीं दिया। जब गांव के प्रभावशाली व्यक्ति उसे समझाने आए तो वह और उसके पति सहमत हुए। अंततः वह झुकी और उसके बच्चे को गांव के प्रतिरक्षण शिविर में ले जाया गया।   चमनदेश कहते हैं कि ऐसे कुछ मामलों को छोड़कर प्रतिरक्षण को लेकर कोई विरोध नहीं होता क्योंकि लोग यह जानते हैं कि बच्चों के लिए यह अच्छा है।   22.6 मिलियन से अधिक नवजात शिशु नियमित रूप से प्रतिरक्षण के दायरे में नहीं लाए गए हैं और यह बच्चे भारत-इंडोनेशिया तथा नाइजीरिया के हैं।   टीकों की अपर्याप्त आपूर्ति स्वास्थ्य कर्मियों की कमी तथा अपर्याप्त राजनीतिक तथा वित्तीय समर्थन के कारण राष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम पूरा नहीं होते। टीकों के बारे में जानकारी की कमी की वजह से वयस्क लोग न तो खुद टीका लगवाते हैं और न लगाने देते हैं।   बच्चों की संख्या तथा भौगोलिक पहुंच के संदर्भ में भारत में विश्व का सबसे बड़ा प्रतिरक्षण कार्यक्रम चलता है। इसके बावजूद प्रति वर्ष पांच वर्ष से कम आयु के 1.4 मिलियन बच्चों की मृत्यु होती है। इन बच्चों की मृत्यु निमोनिया, डायरिया, कुपोषण तथा सेप्सीस जैसी नवजात शिशुओं की बीमारियों के कारण होती है। यह बीमारियां रोकी जा सकती हैं। इनकी रोकथाम का सबसे कारगर तरीका है नियमित प्रतिरक्षण हो। कहा जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के इस स्वास्थ्य अभियान की सफलता से केवल भारत में प्रतिवर्ष चार लाख बच्चों को मरने से बचाया जा सकता है।   डाक्टर संजीव यादव कहते हैं कि नियमित प्रतिरक्षण को उसी उत्साह के साथ जारी रखने की जरूरत है जिस उत्साह के साथ पल्स पोलियो

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मथुरा : गंगा सप्तमी के पर्व को लेकर गंगा महारानी का जन्मोत्सव शहर के सैकड़ों घरों में श्रद्धाभक्ति के साथ मनाया गया।

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वृन्दावन : महर्षि वाल्मीकि महिला शक्ति मंडल समिति द्वारा स्थानीय पानी घाट, परिक्रमा मार्ग स्थित कंचन देवी के आवास पर महिलाओं एवं युवतियों के बैठक में शिक्षा के प्रति जागरूक किया गया।

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