मनोरंजन

इस बार का भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव आयोजन कई क्षेत्रों में समावेशिता और विविधता का एक प्रेरक प्रतीक बनकर उभरा। इफ्फी आयोजन देश एवं दुनिया के कोने-कोने से कला और कलाकारों को एकत्रित कर विषयवस्तु को सभी उपभोक्ताओं के लिए सुलभ बनाने में सफल रहा। क्षेत्रीय सिनेमा से लेकर विदेशी भाषा की फिल्मों तक, इफ्फी सिनेमाई उत्कृष्टता का प्रतिनिधित्व करने वाले सामंजस्यपूर्ण ताने-बाने में सब कुछ का समावेश करता दिखा...

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सिनेमा का सार न केवल उसके समकालीन आकर्षण में है, बल्कि उसके गौरवशाली अतीत के संरक्षण और उत्सव में भी निहित है। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, यानी इफ्फी-2023 में राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन के तहत राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम व भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के प्रयासों से क्षतिग्रस्त सेल्युलाइड रीलों में नई जान फूंककर उनकी भव्यता को वापस लाते हुए सात भारतीय क्लासिक फिल्मों को विश्व प्रीमियर में शामिल किया गया है...

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वर्ष 1952 से शुरू हुआ भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव,.यानी आईएफएफआई, वैश्विक फिल्म समुदाय के समक्ष सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक प्रतीक के रूप में विकसित हुआ है...

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यह तथ्य व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि फिल्में सीमाओं से परे, सामूहिक मानवीय अनुभवों को साझा करने और मानवीय भावनाओं की सार्वभौमिक भाषा के माध्यम से दर्शकों को एकजुट करने की असीम शक्ति रखती हैं। फिल्म ‘कैचिंग डस्ट’ इसी भावना को साझा करती है...

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रचनात्मकता, सिनेमाई प्रतिभा और मोशन पिक्चर के माध्यम से कहानी कहने की कला की भव्यता से ओत-प्रोत, एशिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में से एक 54वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) की गोवा के सुंदर तट पर एक भव्य उद्घाटन समारोह के साथ सिनेमाई यात्रा शुरू हो गई है...

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सिनेमा की दुनिया में कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो पहले से बनी बनाई परंपराओं और स्थापित कथाओं को न केवल चुनौती देती हैं, बल्कि भावपूर्ण चर्चाओं को भी उभारती हैं। निर्देशक हैदर काज़मी द्वारा निर्देशित ‘आई किल्ड बापू’ एक ऐसी ही सिनेमाई कृति है जो भारतीय इतिहास के विवादास्पद और अशांत पन्नों में दूर तक डूबी नजर आती है...

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