विविधा

सम्पूर्ण भारत वर्ष की तरह राजस्थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास 19वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गए थे। यहां की जनता पर अंग्रेजों की हुकूमत की बेड़ियां तो थी ही, साथ ही उन्हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्यों से भी जूझना पड़ता था। इस दोहरी मार के परिणामस्वरूप ऐसे अनेक आंदोलन हुए जिनका प्रभाव स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्पष्ट दिखाई दिया।

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भारत रत्न डॉ. बीआर अम्बेडकर ने अपने जीवन के 65 वर्षों में देश को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, औद्योगिक, संवैधानिक इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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मथुरा : जिस मिट्टी में वो जन्मे, वो भी पराई हो गई, जिस जमीन पर पले-बढ़े, उसी मातृभूमि ने साथ छोड़ दिया। नीले आसमान तले जिस खुली हवा में उन्होंने सांस ली वो हवा भी अब बदल गई... और तो अपने ही देश के लोगों ने उन्हें बेगाना बनाकर रख दिया… 

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आधुनिक परिवेश में भी ब्रज की होली ने अपने वास्तविक स्वरूप को बनाए रखा है। होली माधुर्य का पर्व है... प्रेम, रस, रंग और उमंग का प्रतीक पर्व होली का वास्तविक आनन्द केवल ब्रज में ही मिल सकता है। इस आनन्द की अनुभूति के लिए सारे देश के लोग यहां बरबस ही खिंचे चले आते हैं। यही नहीं, यहां की होली विदेशी पर्यटकों को भी यहां आने और इस आनन्द में डूब जाने को मजबूर कर देती है। ब्रज में होली पूरे एक महीने से अधिक दिनों तक खूब मस्ती के साथ मनाई जाती है। होली का वास्तविक आनन्द यहां के देवालयों में मिलता है। मंदिरों में होली एक माह पूर्व ही शुरू हो जाती है। त्योहार की शुरुआत मंदिरों में समाज गायन से होती है। बसन्त पंचमी के दिन से मंदिरों में ठाकुर जी को इत्र और रंग लगाकर होली शुरू की जाती है। वृन्दावन में प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर तथा मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर में होली की शुरुआत समाज गायन से की जाती है। पंडा समाज के लोग बड़े-बड़े नगाड़ों और ढोल मंजीरे की धुन पर नाचते गाते हैं।

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जीवन प्रमाण (Jeevanpramaan.gov.in) से पेंशन धारकों को बहुत राहत मिली है। अब पेंशन धारक अपनी पेंशन जारी रखने के लिए डिजिटली से अधिकारियों को वार्षिक जीवन प्रमाण पत्र उपलब्ध करा सकते हैं। अब उन्हें हर साल निर्दिष्ट अधिकारियों द्वारा जारी जीवन प्रमाण पत्र के माध्यम से या शारीरिक रूप से प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं है।

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सूरजकुंड शिल्प मेले का आयोजन पहली बार वर्ष 1987 में भारत के हस्तशिल्प, हथकरघा और सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि एवं विविधता को प्रदर्शित करने के लिए किया गया था। केंद्रीय पर्यटन, कपड़ा, संस्कृति, विदेश मंत्रालयों और हरियाणा सरकार के सहयोग से सूरजकुंड मेला प्राधिकरण तथा हरियाणा पर्यटन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह उत्सव सौंदर्यबोध की दृष्टि से सृजित परिवेश में भारत के शिल्प, संस्कृति एवं व्यंजनों को प्रदर्शित करने के लिहाज से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण स्थान एवं शोहरत रखता है। 

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आज चीन में बनी चीज़ें दुनिया के बड़े - बड़े मुल्कों में धूम मचा रही हैं। सारी दुनिया चीनियों की कर्ज़दार होती जा रही है। हमारे देश की सीमाओं पर दांत गड़ाकर देखने वाले चीनी अपने उत्पाद से हमारे गांवों में भी पहुंच गए हैं। यहां ऑस्ट्रेलिया में भी जहां जाओ चीनी लोगों का बोलबाला दिखाई देता है। मजेदार बात यह है कि चीनी लोगों को कोई पसंद नहीं करता मगर इनके माल को खरीदने के लिए लोग सदैव आगे रहते हैं।

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'खोदा पहाड़, निकली चुहिया' कहावत को गोरों ने झूठा सिद्ध कर दिखाया। अंग्रेजों ने ऑस्ट्रेलिया नामक विशाल टापू का चयन हमारे अंडमान-निकोबार की तरह कैदियों की जेल बनाने के लिए किया था लेकिन यहां की धरती ने अचानक सोना उगलना शुरू क्या किया गोरों ने इसे जन्नत ही बना दिया...।

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दीवाली 11 नवंबर की है। यहां इस दिन छुट्टी का दिन नहीं है इसलिए चार दिन पहले ही शनिवार के दिन सार्वजनिक रूप से दीवाली धूमधाम से मना ली गई। मेलबर्न के मुख्य स्थान 'फेडरेशन स्वायर' पर हजारों भारतीयों का हुजूम दीवाली की खुशियां बटोरता दिखाई दिया। यहां बसे हज़ारों भारतवासी परदेश में रहने की जो कसक झेलते हैं वे उसकी भरपाई के लिए ख़ुशी का कोई मौका नहीं छोड़ते...।

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ऐसा सुना है कि जहां शिक्षा और सम्पनता होती है वहां अंधविश्वासों का बोलबाला नहीं होता लेकिन मेलबर्न में बच्चे और बूढ़ों को 'हैलोवीन' का त्यौहार मनाते देखा तो यह भ्रम उड़नछू हो गया।

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