जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं। शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है। ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है।
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