धर्म, कला और संस्कृति

चैतन्य महाप्रभु के जीवन और दर्शन के प्रचार-प्रसार में गोस्वामी गल्लू के नाम का उल्लेख कई तरह से आता है। पूरा आलेख पढ़ने के लिए अभी "सब्सक्राइब करें", मात्र एक रुपये में अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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एक ऐतिहासिक थाती के रूप में सामाजिक व सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने वाला मार्गशीर्ष पूर्णिमा को आयोजित ‘श्री बल्देव जी की गद्दल पूनौ’ का मेला अपने आप में अनोखा है। ‘गद्दल’ का अर्थ होता है रजाई। परम्परानुसार, इस आयोजन में शीत ऋतु के चलते एक विशाल मूर्ति को विशिष्ट परिधान के रूप में श्री ठाकुर जी को विशेष प्रकार की रजाई ओढ़ाई जाती है। ब्रज मंडल में ख्यातिलब्ध यह मेला करीब एक माह तक चलने वाला एकमात्र पर्व है। इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए अभी "सब्सक्राइब करें", महज एक रुपये में, अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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वृन्दावन में मथुरा-वृन्दावन रोड पर रामकृष्ण मिशन अस्पताल से ठीक पहले दाईं ओर अंदर जाने वाली एक सड़क पर तराश वाला मंदिर मौजूद है। बाहर से देखने पर यह मंदिर कोई धर्मशाला जैसा लगता है लेकिन अंदर जाने पर एक अति सुन्दर मंदिर है। तराश वाला मंदिर की स्थापना राजर्षि श्री वनमाली रायबहादुर ने कराई थी। इस मंदिर में बहुत ही सुन्दर रंगीले बोलते जागृत श्री विग्रह हैं जिन्हें ‘जवाईं ठाकुर’ कहा जाता है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां प्रतिदिन दो बार भगवान श्रीकृष्ण को हुक्का-पान का भोग लगाया जाता है। इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए अभी " सब्सक्राइब करें ", महज एक रुपये में, अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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गोकुल महावन यमुना तट स्थित कृष्णकालीन चिंताहरण शिवालय एक प्रसिद्ध तीर्थाटन है। मथुरा जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर इस शिवालय में भगवान शिव ‘चिंताहरण महादेव’ के रूप में विराजमान हैं। इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, महज एक रुपये में अगले पूरे 24 घंटों के लिए... 

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भारत में संन्यास की विशिष्ट परंपरा रही। जगत में रहते हुए भी वैराग्य के मार्ग का चुनाव करने वाले, संन्यासी कहलाते हैं। वे अपना समूचा जीवन, मनुष्य और समाज के निमित्त ही अर्पण करते हैं और दिव्यता की प्राप्ति के लिए भी साधनारत रहते हैं। ऐसे संन्यासियों के पास अपने कई प्रश्न लेकर सामान्य जन भी जाते हैं। संन्यासियों के आध्यात्मिक उपदेश और उनके कृतित्व का अवलोकन कर, मनुष्य मन का कई संदेह दूर हो जाता है। इससे जीवन यात्रा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसे ही एक संन्यासी का नाम है स्वामी पुरुषोत्तमानंद है। इनसे अधिसंख्य छात्र, युवा और साधक जन प्रेरणा लेते रहे हैं। इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए अबी सब्सक्राइब करें, महज एक रुपये में अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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जन्म लेने से पूर्व ही मनुष्य का ध्वनि से सहज संबंध स्थापित हो जाता है। यह संबंध मृत्युपर्यन्त जारी रहता है। मनुष्य के सामान्य अनुभव से यह सर्वविदित है कि गर्भस्थ शिशु भी विविध ध्वनियों को सुनकर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। जब यही ध्वनि निर्दिष्ट लय, ताल के साथ अनुभूतियों को व्यक्त कर रस उत्पन्न करे तो उसे संगीत कहते हैं। इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए अभी "सब्सक्राइब करें", महज एक रुपये में, अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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