ओ रोमियो! एक्शन और आशिकी के बीच एक उलझी हुई कहानी…


बॉलीवुड की ‘आत्मा’ हिंदी फिल्मों में वापस लौट रही है, और ऐसा लगता है कि पिछले कम से कम दो दशकों से हिंदी के दर्शक जिस चीज को बेइंतहा 'मिस' कर रहे थे, उसे अब वापस परोसा जाने लगा है। बात चाहे संगीत की हो, धुआंधार एक्शन की हो या फिर वास्तविक दुनिया से दूर, कहीं बहुत ऊंचाई पर खड़े, अविश्वसनीय खलनायकों की। पिछली कई फिल्मों के बाद, 'ओ रोमियो' भी इसे साबित करती है।

लेकिन, जिक्र जब संगीत का हो तो एक सवाल फिर से अपना मुंह उठाता है। और, वह यह कि जब पुराने गानों को दोबारा इस्तेमाल किए बिना रहा नहीं जा सकता है तो वैसे ही नए गीत क्यों नहीं बना लिए जाएं। इस बहाने हमारी 'प्लेलिस्ट' में भी कुछ नए गाने जोड़ने का मौका मिलेगा। बहुत दिनों से वही गाने चल रहे हैं।

Read in English: O Romeo! A clash of genres, A spark of nostalgia…

'धुरंधर' में पुराने गाने सिर्फ पृष्ठभूमि में चल रहे थे। यहां तो सीधे सिनेमाघर में ही "धक-धक करने लगा…" चला दिया। बढ़िया था। "दिल है कि मानता नहीं" और "आशिकी" के गाने भी यहां-वहां बजते रहते हैं। जरूरत महसूस होने लगी है तो अब धीरे-धीरे दोबारा ऐसे गाने बनने भी लगेंगे और इस तरह के दृश्यों में पीछे चलने भी लगेंगे। तब आज की ये फिल्में 'आउटडेटेड' लगने लगेंगी। वैसे, संगीतकार विशाल भारद्वाज खुद और गीतकार गुलजार हैं तो कम से कम दो गाने लंबी उम्र के हैं। नब्बे से ज्यादा की उम्र में "नीचे पान की दुकान" और "आशिकों की कालोनी में घर ले लिया" जैसे गीतों में गुलजार के मिजाज की पूरी महक आती है। अरिजीत सिंह का "ओ रोमियो" भी बढ़िया लगता है।

फिल्म में 1995 का कथानक है, जो अगले एक साल तक चलता है, लेकिन घटनाएं इतनी हैं कि विश्वास नहीं होता कि इतना सब कुछ महज एक-डेढ़ साल में घटित हो गया होगा। लेकिन, जोरदार मार-धाड़ और नाच-गाने दर्शकों को कालक्रम भूलने का मौका दे देते हैं।

फिल्म के पात्रों ने जमकर गालियों की बरसात की है। पता नहीं, क्या मजबूरी रही होगी? यदि गालियों का प्रयोग करना ही है तो जरूरी नहीं है कि इनका इस्तेमाल हर पात्र के मुंह से कराया जाए। नाना पाटेकर और फरीदा जलाल के मुंह से गालियां बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती हैं। हां, यह एक बात है कि यदि किसी कलाकार के चेहरे के भावों से ध्यान हटाना हो और संवाद कमजोर हो तो उसके मुंह से गालियां दिलवा दो। शायद, विशाल भारद्वाज ने ऐसे ही मौकों पर गालियां दिलवा दी हैं।

जब-जब नाना पाटेकर और शाहिद कपूर एक साथ आते हैं तो स्क्रीन पर रौनक आ जाती है। तमन्ना भाटिया, विक्रांत मैसी और दिशा पटानी विशेष भूमिकाओं में हैं। इनकी जगह कोई और भी होता तो फिल्म को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। ऐसी भूमिकाओं में यदि नए कलाकारों को मौका दिया जाए तो वे 'जाया' नहीं जाते हैं।

विक्रांत मैसी बहुत अच्छे कलाकार हैं। उन्हें बड़े फिल्मकारों की फिल्मों में ‘कोई’ भी रोल करने के 'लोभ' से बचना चाहिए। दिशा पटानी का भी बहुत हो गया है। हर फिल्म में खुद को 'रिपीट' करने के बजाय एक 'ब्रेक' लेकर कुछ 'अच्छे' का इंतजार करना ज्यादा बेहतर है।

फिल्म के मुख्य खलनायक अविनाश तिवारी हैं। स्पेन में रहते हैं। अब चूंकि स्पेन में रहते हैं तो 'मैटाडोर' ही हो सकते हैं। यह भी बॉलीवुड की एक मजबूरी ही है कि यदि स्पेन की बात चलेगी तो 'मैटाडोर' और 'ला टोमाटीना' ही याद रहता है। वहां और कुछ नहीं होता है!? राहुल देशपांडे को और मौका मिलेगा तो वह चमकेंगे।

"मोहब्बत एक बददुआ है, जो दोनों को लगती है...", "बुर्के में सिंदूर, ये है मेरा इंडिया...", "सुर का इतना पक्का है तू! काश ईमान का भी होता..." जैसे डायलॉग बेहतरीन हैं। विशाल भारद्वाज ने लिखे हैं। कुछ और भी हैं। उम्मीद के मुताबिक, ज्यादातर नाना पाटेकर के हिस्से में आए हैं।

एक समस्या हुसैन जैदी की कहानी और रोहन नरूला के साथ विशाल भारद्वाज के स्क्रीनप्ले में भी दिखी। लगता है कहानी लिखने के दौरान कुछ 'कन्फ्यूजन' रहा होगा कि फिल्म को एक्शन श्रेणी में रखें या रोमांस की श्रेणी में। फिल्म के नाम में 'रोमियो' शब्द है, लेकिन शुरुआत में हीरो के हिस्से में जोरदार एक्शन है। जब कहानी आगे बढ़कर और ज्यादा एक्शन की डिमांड करती है, तो हीरो एक्शन की बजाय आशिकी में डूब जाता है। बीच के एक घंटे के दौरान फिल्म के बोझिल होने की वजह यह भी हो सकती है। इंटरवल से आधा घंटे पहले और आधा घंटे बाद तक फिल्म ठहरी हुई सी लगती है। संपादक आरिफ शेख इसे थोड़ा काट-पीट करके सही कर सकते थे।

कमाल है! इतने शब्द लिख दिए, अभी तक फिल्म की हीरोइन का नाम ही नहीं आया। तृप्ति डिमरी। फिल्म की हीरोइन हैं। स्क्रीनटाइम का एक बड़ा हिस्सा उनके कब्जे में है। लेकिन, जब-जब लगता है कि फिल्म का यह सीन सिर्फ 'उनका' है तभी उनके हिस्से की वाह-वाही कोई और लूट ले जाता है। लेकिन, अंत में फिल्म के विलेन को अधमरा करके शाहिद कपूर उन्हें एक और 'मौका' देते हैं और वह मौका वो नहीं छोड़ती हैं। अधमरे विलेन को पूरा मारकर ही दम लेती हैं।  

आखिर में एक सवाल यह है कि नब्बे के दशक में क्या लोग पूरे शरीर पर टैटू करा लेते थे? या, सिर के ऊपर भी टैटू संभव थे? मैंने तो उस दौरान नहीं देखे थे। यदि होते हों तो मुझे पता नहीं है।



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