बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

आगरा जिले के एक गांव में सुबह होते ही लक्ष्मी की आंखें खुल जाती हैं। सूरज निकलने के साथ। पहले सबके लिए चाय, फिर हैंडपंप पर पानी भरना, भैंस को चारा डालना, बच्चों के कपड़े धोना, ससुराल वालों के लिए खाना बनाना। सिर पर दुपट्टा संभालते हुए वह दिन की फेहरिस्त मन में दोहरा लेती है, खेत का काम, दोपहर का खाना, शाम तक थकान से लथपथ एक और दिन। लक्ष्मी के लिए सुबह सपनों की शुरुआत नहीं, जिम्मेदारियों की कतार है। स्कूल की किताबें कभी थीं, लेकिन आठवीं के बाद वे अलमारी में नहीं, यादों की धूल में दफन हो गईं।

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तीन दशक पहले मुरैना के 85 वर्षीय सीताराम एक ऐसी यात्रा पर निकले थे, जो आज की पीढ़ी के लिए लगभग कहानी बन चुकी है। नंगे पांव बद्रीनाथ तक पैदल। न कोई टाइम-टेबल, न ऑनलाइन बुकिंग, न वीआईपी पास। हिमालय की पथरीली पगडंडियां, होंठों पर भजन, और तारों से ढकी रातों में साथ चलते अनजान लोग, यही उनकी दौलत थी। रास्ते में सब मिलकर सादी रोटियां खाते, एक सुर में “ॐ जय बद्रीनाथ-हरि” गाते। थकान होती थी, पर मन हल्का रहता था। लौटकर उन्होंने गोवर्धन की 21 किलोमीटर की परिक्रमा की। हर कदम भक्ति था। हर ठहराव एक कथा। बुज़ुर्गों से कृष्ण की लीलाएं सुनते और भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस करते...

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8 जनवरी को कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अबूजर अहमद और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य मामले की एफआईआर रद्द कर दी। पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज धारा 498ए की यह शिकायत छोटे-मोटे वैवाहिक झगड़ों पर आधारित थी। अदालत ने साफ कहा कि यह कानून अब न्याय के बजाय प्रतिशोध का माध्यम बन रहा है...

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केरल, जिसे लंबे समय से कम्युनिस्टों का गढ़ माना जाता रहा है, जहां कभी कमल को मज़ाक में उगने वाली घास कहा जाता था, आज हर जगह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। हाल ही में, तिरुवनंतपुरम में, अमित शाह की ज़ोरदार मौजूदगी, और उनका वक्तव्य, कोई साधारण भाषण नहीं था, बल्कि 2026 के लिए साफ़ चुनावी संदेश था। कल्पना कीजिए, लाल झंडों के बीच कमल खिलते हुए। यह सपना नहीं, एक नई राजनीतिक कोशिश है।

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सुबह का अलार्म बजता है। प्राइवेट स्कूल के चपरासी बाबू लाल के मोबाइल की स्क्रीन पर “गुड मॉर्निंग” चमकती है, लेकिन उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं है। घर के आंगन में पड़े अख़बार के पहले पन्ने पर भारत की तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी की सुर्ख़ियां हैं, जीडीपी, ग्रोथ, स्टार्टअप, ग्लोबल रैंक। घर के अंदर पत्नी ऊषा, रसोई में उबलता दूध भरोसे के साथ नहीं, शक के साथ देखती है। यह वही भारत है, जहां सपनों की उड़ान और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई हर दिन चौड़ी हो रही है...

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शाम की सैर, ठंडी हवा, एक मासूम-सा मज़ाक, और अचानक एक कड़वी सच्चाई सामने आ गई। पार्क की पगडंडी पर टहलते हुए मेरी मुलाक़ात हमारे बेहद तहज़ीबदार बंगाली बैंक मैनेजर, चटर्जी बाबू से हो गई। हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ लिया, “तो चटर्जी बाबू, 1 अप्रैल को रिटायरमेंट के बाद कोलकाता की ट्रेन पकड़ रहे हैं?”

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