मथुरा। बाबा जयगुरुदेव के चतुर्थ वार्षिक भण्डारा सत्संग-मेला के दूसरे दिन राष्ट्रीय उपदेशक द्वय ने जयगुरुदेव नाम योग साधना मन्दिर के पीछे बने मंच से श्रद्धालुओं को सम्बोधित किया। सतीश चन्द्र ने कहा कि बाबा जयगुरुदेव महाराज ने 60 वर्षों तक जीवों के कल्याण के लिये कार्य किया और 116 वर्ष की आयु पूरी करके 18 मई 2012 को इस संसार से अलविदा हो गयें। गुरु महाराज की दया-दुआ, साधन-भजन करने वालों को बराबर मिलती है। केवल भौतिक जगत में सानिध्य का लाभ नहीं मिलता है। जो लाभ शरीर द्वारा होता है, वह नहीं मिलेगा। गुरु के अमृत वचनों में सब मन्त्र हैं, सब कुछ मौजूद है। उनकी आज्ञा पालन से मुसलमान का चांद, हिन्दू का सूरज, ब्रह्मा, विष्णु, महेश सबकी प्रार्थना हो जाती है, सब खुश हो जाते हैं। जब तक धरती, सूरज, चांद रहेंगे यह संसार उनके ज्ञान के मशाल के लिये सदैव ऋणी रहेगा। हम सबको अपने गुरु के ज्ञान के मशाल को प्रज्वलित किये रहना है जिससे दुनियां के कोने-कोने में लोग जयगुरुदेव नाम से परिचित हो जायें।
बाबा जयगुरुदेव महाराज ने सन 1952 में काशी की धरती से सीधी सरल भाषा में आम सत्संग देना प्रारम्भ किया। सत्संग की नर्सरी बनारस, आजमगढ़ और जौनपुर में तैयार हुई। यहीं से सत्संग का बीज धीरे-धीरे पूरे भारत में फैलने के साथ नेपाल, मलेशिया आदि राष्ट्रों में फैला।
राष्ट्रीय उपदेशक ने कहा कि ‘सत्संग महिमा है अतिभारी, पर कोई जीव मिले अधिकारी।’ साध-संगत में आने से मन हरा-भरा हो जाता है और रगड़ों-झगड़ों में धीरे-धीरे कमी हो जाती है। सत्संग से मन की गंदगी साफ हो जाती है। लेकिन ऐसे जीव बहुत कम होते हैं जिनको यह मिलता है। रामायण में गोस्वामी जी महाराज ने सत्संग के प्रभाव से स्वभाव में भारी परिवर्तन होना बताया है कि कौआ प्रकृति का जीव कोयल बन जाता है और कोयल प्रकृति का जीव बगुला प्रकृति को प्राप्त कर लेता है। जन्मों-जन्मों के पुण्य कर्म का जब उदय होता है तब सन्त मिलते हैं।
उन्होंने कहा शब्द यानि नाम कभी नहीं मरता है। सारी सृष्टि की धुरी अमरलोक, सतलोक है। जब उस शब्द के मिलने के बारे में बताया जाये तो उसे सत्संग कहते हैं। क्योंकि शब्द सत्य और अविनाशी है। सन्त ही इस भेद को जानते हैं और उनके सत्संग में शब्द की महिमा की जानकारी मिलती है। धुर-धाम के बारे में सन्तों के अलावा और कोई नहीं जान सकता है। डा. करुणाकान्त ने बताया कि बाबा जयगुरुदेव जी महाराज की जन्मभूमि ग्राम खितौरा जि. इटावा है। बाबा जयगुरुदेव महाराज का अन्तिम संस्कार बने हुये जयगुरुदेव नाम योग साधना मन्दिर के पीछे किया गया था। उसी स्थान पर उनकी भव्य समाधि निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा है। 18 मई को रात्रि 9.30 बजे से मन्दिर और समाधि स्थल पर पूजन कार्य प्रारम्भ हो चुका है। पूजन प्रसाद के लिये जयगुरुदेव नाम योग साधना मन्दिर और समाधि स्थल पर लम्बी कतारें देखी गईं। मेले में लगे हुये शर्बत प्याऊ चिलचिलाती धूप में लोगों को राहत दे रहे हैं।
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