गरीब हालत में एक अदद झौंपड़ी भी मय्यसर न होने पर कांशीराम आवासीय योजना में मकान मिलने के बाद सोचा था कि मेहनत मजदूरी कर अपनी औलाद को स्कूल भेजकर शिक्षित करेगा। हाईफाई या प्राइवेट न सही सरकारी स्कूल ही बहुत था बच्चे को शिक्षित करने के लिये यह सोच थी कांशीराम के ब्लाक नंबर 58 में रहने वाले गरीब जाफर अली की जिसका पाँच वर्षीय बेटा जीशान समीप ही बने सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ रहा था, उसकी सोच थी कि थोड़ी बहुत पढ़ाई लिखाई सीखने के बाद वो अपने लाडले को हाथ के हुनर ाक कारीगर बनायेगा। पढ़ा-लिखा कर योग्य नौकरी लायक औलाद बनाना वो मानो एक सपने जैसा था। अपनी औकात को ध्यान में रख जाफर ने अपने कलेजे के टुकड़े को सरकारी स्कूल में पढ़ाना उचित समझा, उसकी नजर में सरकारी स्कूल की पढ़ाई बुरी नहीं थी क्योंकि उसके बच्चे को शिक्षा के साथ सरकारी भोजन और दूध भी मिल रहा था लिहाजा वो कर रहा था मजदूरी यही आस लिये कि कुछ साल बाद उसका बेटा भी घर का खर्च उठाने लायक हो जायेगा परंतु उसका ये छोटी सी औकात भरा यह सपना सरकारी लापरवाही का शिकार बन कर चूर-चूर हो जायेगा। यह उसने सपने में भी नहीं सोचा था। काशीराम काॅलोनी के ही ब्लाक नंबर 70 में रहने वाले पूरन चंद की चार वर्षीय बेटी कीर्ति ने भी अपने भाई के साथ आंगनबाड़ी स्कूल जाने की जिद ठानी तो परिवार वाले खुश हुए कि चलो बेटी खुद ही पढ़ने की जिद कर रही है। इधर कीर्ति भी आंगनबाड़ी जाकर खुश, आखिर रोज-रोज वहां अच्छा भोजन मिलता और पीने को दूध भी और साथ में बच्चों के साथ धमा-चैकड़ी भी। उधर पूरन भी खुश था यही सोच कर कि खेलते-खेलते उसकी बेटी अपने भविष्य के लिये पढ़ना-लिखना सीख ही लेगी लेकिन वो क्या जानता था कि सरकारी योजना के तहत दी जा रही सुविधा उसके अँगना की चिड़िया की चहचाहट को हमेशा के लिये शांत कर देगी। जाफर और पूरन जैसे लगभग 70 परिवार थे जिनकी संतानें इन्हीं विद्यालयों में पढ़ रही थी। केवल कांशीराम काॅलोनी ही नहीं बल्कि जनपद में सैंकड़ों बच्चे ऐसे ही है जिन्हें मिड-डे मील परोसा जाता है और समय पर मिड-डे मील में गड़बड़ी की शिकायतें पहले भी पाई जा चुकी है। लेकिन इन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया ये सरकारी हीला-हवाली का परिणाम था कि दो बच्चों की जान चली गयी और दा दर्जन बच्चों की जान पर बन आई। यहाॅ सवाल यह भी उठ रहा है कि ऐसा सभी बच्चों के साथ क्यों नहीं हुआ, क्या दूध के पैकेटों की फ्री-जिंग करने में लापरवाही बरती गई या कि पैकिंग करते समय शुद्धता के मानक नहीं परखे गये। बहरहाल इस घटना के कारण जाँच के बाद ही सामने आयेंगे बशर्ते लीपा-पोती न की जाये।
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