मथुरा

मथुरा। पुलिस महानिरीक्षक एवं संयुक्त निदेशक नागरिक सुरक्षा निदेशालय लखनऊ अभिताभ ठाकुर, राजेश कुमार जिला मजिस्टेªट एवं नियंत्रक नागरिक सुरक्षा मथुरा तथा हेमसिंह नगर मजिस्टेªट उप नियंत्रक नागरिक सुरक्षा मथुरा ने संयुक्त रूप से सभी जनसाधारण से अपील की है कि वह अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, हाॅस्पीटल, होटल, गेस्ट हाऊस, धर्मशाला आदि में बिना पुलिस जाॅच कराये किसी भी व्यक्ति को न रखें क्योंकि उक्त व्यक्ति कोई चोर, हत्यारा, ठग या आतंकवादी भी हो सकता है और किसी भी अप्रिय घटना को अंजाम दे सकता है। जिसका आप आपके परिवार तथा समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और किसी भी गम्भीर परेशानी में स्वयं भी फस सकते है। उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की है कि यदि आपने अभी तक ऐसा नहीं किया है तो तुरन्त पासपोर्ट साइज के दो फोटो, आईडीप्रूफ, एड्रस प्रूफ की काॅपी लेेकर उससे सारी जानकारी पूछकर अपने क्षेत्र के थाने में पुलिस जाॅच के लिये जमा करादें और अपने कत्र्तव्य का पालन करें तथा अपने पड़ोसी और रिश्तेदारों से भी कराकर स्वच्छ समाज को बनाने में भागीदार बनें। -------------------------------  

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मथुरा। जिलाधिकारी राजेश कुमार की अध्यक्षता में 20 दिसम्बर को 25 लाख से उपर की परियोजनाओं की प्रगति समीक्षा बैठक 3ः30 बजे एवं 4ः40 बजे से मा0 मुख्यमंत्री जी की घोषणाओं से सम्बन्धित परियोजनाओं की समीक्षा बैठक कलेक्टेªट सभाकक्ष में आयोजित होगी। मुख्य विकास अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल ने अपने विभाग के सभी सम्बन्धित अधिकारियों को निश्चित समय पर प्रतिभाग करने हेतु निर्देशित किया है।

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मथुरा। जिला पंचायत अध्यक्ष चै0 अनूप सिंह की अध्यक्षता में 26 दिसम्बर को अपरान्ह 12ः00 बजे से जिला पंचायत मथुरा के सभागार में बैठक आयोजित होगी। 

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डॉ. पीजे सुधाकर  भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, फिल्म समारोह निदेशालय के संरक्षण में गोवा सरकार और भारतीय फिल्म उद्योग के सहयोग से आईएफएफआई सचिवालय द्वारा आयोजित 45वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया।  यह समारोह दुनियाभर के सिनेमा को यहां लाता है और भारत के समकालीन और कालजयी सिनेमा का गुलदस्ता, विविध तरह की फिल्मों के प्रदर्शन, अकादमिक सत्रों व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रमों द्वारा दुनिया के सामने पेश करता है। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (पूरा विश्व एक परिवार है) की अवधारणा पर आधारित है।  समारोह में दुनियाभर की उन बेहतरीन फिल्मों को दिखाया जाएगा जो विश्व सिनेमा के उभरते ट्रेंड को बारीकी से दर्शाती हैं। संवेदनशीलताओं और नजरिये का यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान, भारतीय सिनेमा की संवेदनशीलता को पूरे महाद्वीप में पहुंचाता है।  मुख्य आकर्षण आईएफएफआई 2014 में विभिन्न श्रेणियों में 75 देशों की 179 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इसमें विश्‍व सिनेमा (61 फिल्‍में), मास्‍टर-स्‍ट्रोक्‍स (11 फिल्‍में), महोत्‍सव बहुरूपदर्शक (फेस्टिवल केलिडोस्‍कोप) (20 फिल्में), सोल ऑफ एशिया (7 फिल्‍में), डॉक्‍यूमेंट्री (6 फिल्‍में), एनीमेटेड फिल्‍में (6 फिल्‍में) शामिल रहीं। इसके अलावा भारतीय पैनोरमा वर्ग में 26 फीचर और 15 गैर फीचर फिल्‍में थीं। पूर्वोत्‍तर समारोह का फोकस क्षेत्र रहा, इसलिए आईएफएफआई 2014 में भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की 7 फिल्‍में प्रदर्शित की गईं।  क्षेत्रीय सिनेमा भी समारोह का अहम हिस्सा रहा। इस वर्ष के समारोह में पुनरावलोकन वर्ग (रिट्रोस्‍पेक्टिव सेक्‍शंस) में गुलजार और जानू बरुआ पर फिल्म तथा रिचर्ड एटनबरो, रॉबिन विलियम्‍स, ज़ोहरा सहगल, सुचित्रा सेन पर विशेष समर्पित फिल्‍में और फारुख शेख को विशेष श्रद्धाजंलि अन्‍य आकर्षण रहे।  ऐतिहासिक परिदृश्य आईएफएफआई के पहले संस्करण का आयोजन भारत के पहले प्रधानमंत्री के संरक्षण में भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की तरफ से 24 जनवरी से 1 फरवरी 1951 तक मुंबई में हुआ था। इसके बाद यह समारोह मद्रास, दिल्ली और कलकत्ता में भी आयोजित हुआ। सबमें करीब 40 फीचर और 100 लघु फिल्में शामिल रहीं। दिल्ली में आईएफएफआई का उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 21 फरवरी 1952 को किया गया था। अपनी शुरुआत के बाद 1952 में आईएफएफआई भारत में अपने तरह का सबसे बड़ा आयोजन था। इसके बाद आईएफएफआई का नई दिल्ली में आयोजन हुआ। जनवरी 1965 में तीसरे संस्करण से आईएफएफआई प्रतिस्पर्धी बन गया। 1975 से फिल्मोत्सव शुरू हुआ और बाद में इसे आईएफएफआई में मिला दिया गया। 2004 में आईएफएफआई का आयोजन गोवा में हुआ। तब से आईएफएफआई वार्षिक समारोह बन गया और इसकी प्रकृति प्रतिस्पर्धी हो गई। गोवा आईएफएफआई का स्थायी स्थान बन गया है।  आईएफएफआई का लक्ष्य, फिल्म कला की श्रेष्ठता को दर्शाने वाले दुनियाभर के सिनेमा को साझा मंच देना, विभिन्न देशों में उनकी अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाने वाली फिल्म संस्कृति के संदर्भ में समझदारी को बढ़ाना और प्रोत्साहित करना और दुनिया के लोगों में मित्रता और सहयोग को बढ़ावा देना है। आईएफएफआई के स्थापना सिद्धांतों के केंद्र में हर विधा के फिल्मकारों की खोज, प्रोत्साहन और उन्हें सहयोग देना है ताकि शैली, सौंदर्यशास्त्र और विषयवस्तु में विविधता को एक साथ लाया जा सके। यह समारोह एक ऐसी जन और राष्ट्रों की सभा है जहां दुनिया के महानतम फिल्म कलाकार उभरती प्रतिभाओं के साथ समान रूप से हाथ थामे खड़े दिखाई देते हैं। यह फिल्म पेशेवरों का भी मंच है जहां वो दुनिया भर के फिल्म प्रेमियों से आमने-सामने मुखातिब होते हैं। आईएफएफआई का लक्ष्य भारतीय सिनेमा को विकसित करना, प्रोत्साहित करना और प्रेरित करना तथा इसे बाहर की दुनिया और इस विशाल देश के विविध तरह के दर्शकों के सामने पेश करना है। तेजी से बदलती तकनीक के साथ इस समारोह का महत्व तभी बरकरार रह सकेगा जब यह दर्शकों और फिल्मकारों को एक साथ लाए और उनके सामने उभरती तकनीकों व नई सोशल मीडिया की चुनौतियों को रख सके। नई अंतःक्रियाएं परिकल्पित हो, नई रणनीतियां तय की जाएं, इस लिहाज से आईएफएफआई का संस्करण देखने के अनुभवों को परिष्कृत, व्यापक और समृद्ध कर रहा है। फिल्म समारोह निदेशालय फिल्म समारोह निदेशालय देश और विदेश में फिल्म समारोहों का आयोजन करता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म समारोह निदेशालय की स्थापना 1973 में की गई जिसका मुख्य उद्देश्य अच्छे सिनेमा को बढ़ावा देना था। इसे व्यापक श्रेणियों में विविध तरह की गतिविधियों के रूप में आयोजित किया जाता है। इसमें मुख्य श्रेणियां हैं भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, विदेशों में भारतीय मिशन के द्वारा सांस्कृतिक आदान-प्रदान व भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन, भारतीय पैनोरमा का चयन, विदेश में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भागीदारी, भारत सरकार की तरफ से विशेष फिल्म प्रदर्शनी और प्रिंट संचयन व दस्तावेजीकरण। ये गतिविधियां भारत और बाकी दुनिया के देशों के बीच सिनेमा के क्षेत्र में विचारों व सांस्कृतिक अनुभवों के आदान-प्रदान का विल्क्षण मंच मुहैया करती हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का गठन सिनेमेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत, भारत में फिल्मों को प्रदर्शनों के लिए प्रमाणित करने के लिए किया गया है। बोर्ड का गठन चेयरपर्सन और 25 अन्य गैर-अधिकारी सदस्यों को मिलाकर होता है। बोर्ड का मुख्यालय मुंबई में है और इसके 9 क्षेत्रीय केंद्र हैं। क्षेत्रीय केंद्र को फिल्मों के मूल्यांकन में एक परामर्श मंडल द्वारा सहयोग किया जाता है जिसका गठन जीवन के विविध क्षेत्रों के लोगों को लेकर किया जाता है।  फिल्म प्रभाग फिल्म प्रभाग का गठन जनवरी 1948 में पहले के भारतीय सूचना फिल्म और भारतीय समाचार परेड, जिसका गठन 1943 में प्राथमिक तौर पर युद्ध का कवरेज करने के लिए हुआ था, का पुनर्गठन करके किया गया। 1918 के सिनेमेटोग्राफी एक्ट का 1952 में भारतीयकरण किया गया जिसमें डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन पूरे देश में करना अनिवार्य बना दिया गया। 1949 से फिल्म प्रभाग हर शुक्रवार को देशभर में फैले थियेटरों के लिए 15 राष्ट्रीय भाषाओं में डॉक्यूमेंट्री या समाचार आधारित या एनिमेशन फिल्में रिलीज करता है। इसका लक्ष्य व उद्देश्य राष्ट्रीय परिदृश्य (जो जनता के विकास की लिए शुरू की गई सरकार की योजनाओं, नीतियों, कार्यक्रमों व परियोजनाओं के लिए व्यापक प्रचार मंच मुहैया कराती है) पर केंद्रित फिल्में दिखाना है, जो राष्ट्रीय कार्यक्रमों के बारे में लोगों को शिक्षित व प्रेरित कर सके और देश की विरासत तथा यहां की धरती की छवि को भारतीय व विदेशी दर्शकों के सामने पेश कर सके। इस तरह की फिल्मों का प्रदर्शन फिल्म प्रभाग के प्रधान कामों में से एक है। भारत का फिल्म प्रभाग फिल्मों का डिजीटलीकरण और वेब प्रसारण करता है। 60 सालों के दौरान फिल्म प्रभाग 8100 फिल्मों के संग्रह जिसमें कि दस्तावेजी फुटेज, न्यूज रील, न्यू मैगजीन डॉक्यूमेंट्री, एनिमेशन और लघु फिल्में हैं के साथ राष्ट्रीय इतिहास का खजाना कोष बन गया है। फिल्मी सामग्री बहुत नाजुक और क्षणिक होती हैं अगर उन्हें सही से आदर्श परिस्थितियों में नहीं रखा जाए तो वो नष्ट होने लगती हैं। इसीलिए, फिल्मी सामग्रियों के संग्रहण और संरक्षण के लिए “वेबकॉस्टिंग एडं डिजीटाइजेशन ऑफ फिल्म डिवीजन फिल्म्स” शुरू किया गया। फिल्मों को टेलीसिने मशीन के द्वारा दोहरे डिजीटल फार्मेट में रखा जाता है जिसके बाद उन्हें डीजी बीटी के हाई डिफिनिशन टेप में संग्रहित किया जाता है। यह दुनिया में सबसे नवीनतम तकनीक है। इसके बाद फिल्म प्रभाग इन्हें तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत करता है जैसे कि अत्यंत मूल्यवान व मूल्यवान फिल्में, जिन्हें हाई डिफिनिशन टेपों में रखा जाता है और साधारण फिल्मों को डीजी बीटा में रखा जाता है। टेलीसिने ट्रांसफर और संरक्षण के बाद नियमित इस्तेमाल के लिए फिल्मों की डीवीडी/वीसीडी बनाई जाती है। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय पुणे स्थित भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय, भारतीय फिल्मों का समृद्ध कोष है। सिनेमा को कला और इतिहास की तरह संरक्षित करने को पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण माना जाता है। सिनेमा को इसके सभी विविध भाव और रूपों में संरक्षित करने का काम उस राष्ट्रीय संगठन को सुपुर्द किया गया है जिसके पास पर्याप्त साधन, स्थायी ढांचा और फिल्म उद्योग का विश्वास है। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त इकाई के रूप में फरवरी 1964 में की गई। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय का लक्ष्य भावी पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय सिनेमा की पहचान कर उसका अधिग्रहण और संरक्षण करना है तथा विश्व सिनेमा की प्रतिनिधि फिल्मों का संग्रह तैयार करना है। इस संगठन का मुख्य काम फिल्मों से संबंधित दस्तावेजों का वर्गीकरण करना, सिनेमा पर शोध करना और उसे बढ़ावा देना, उनका प्रकाशन और वितरण करना है। यह देश में फिल्म संस्कृति के प्रसार के केंद्र के रूप में भी काम करता है तथा विदेशों में भारतीय सिनेमा के सांस्कृतिक मौजूदगी सुनिश्चित करता है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम लिमिटेड (एनएफडीसी) राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम लिमिटेड (एनएफडीसी) 1975 में निगमित किया गया (100 प्रतिशत भारत सरकार की मिल्कियत वाली संस्था) जिसे भारत सरकार ने गठित किया है। इसका प्राथमिक उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग के संगठित, सक्षम और एकीकृत रूप में विकास करना है। भारतीय फिल्म उद्योग के विकास में मदद कर सकने वाली संस्‍था की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने फिल्म वित्त निगम (एफएफसी) और भारतीय पिक्चर निर्यात निगम (आईएमपीईसी) का एनएफडीसी में विलय कर दिया। एनएफडीसी ने 200 से अधिक फिल्मों को आर्थिक मदद दी है और निर्मित किया है। विभिन्न भारतीय भाषाओं की इन फिल्मों को व्यापक रूप से सराहा गया और इन्होंने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते। भारतीय सिनेमा की शताब्दी भारतीय सिनेमा की शताब्दी के मौके पर साल 2012 में एक विशेष वेबसाइट आम लोगों से लेख आमंत्रित करने के उद्देश्य के साथ शुरू की गई थी। राज्यों की राजधानियों में भारतीय सिनेमा की शताब्दी के अभिनंदन के क्रम में पहला शताब्दी फिल्म समारोह पुडुचेरी सरकार की तरफ से 24-26 अगस्त 2012 को आयोजित किया गया। भारतीय सिनेमा का शताब्दी अभिनंदन के क्रम में एनएफएआई ने अगस्त, 2012 में तीन भारतीय मूक फिल्मों की एक डीवीडी जारी की जिसमें कि विशेषतौर से ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) की दो बची रील का संगीत, डीजी फाल्के का बेहतरीन नमूना ‘कालिया मर्दन’(1919) और एकमात्र उपलब्ध बंगाली फिल्म कालियापदा दास की उत्कृष्ठ कॉमेडी फिल्म ‘जमाई बाबू’ (1931) शामिल है। भारतीय फिल्म संस्थान की स्थापना 1960 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत की गई। इसके अतिरिक्त 1974 में इसकी टेलीविजन शाखा भी शुरू हुई। बाद में संस्थान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान के रूप में पुनर्गठित किया गया। अक्टूबर 1974 में रजिस्ट्रेशन ऑफ सोसाइटी एक्ट 1860 के अंतर्गत संस्थान को सोसाइटी बना दिया गया। सोसाइटी का गठन फिल्म, टेलीविजन, संचार, संस्कृति क्षेत्र की प्रख्यात हस्तियों, संस्थान के पूर्व छात्र और सरकार के कार्यकारी अधिकारी को सदस्य बनाकर किया जाता है। संस्थान का संचालन गवर्निंग काउंसिल के जरिये किया जाता है जिसका प्रमुख चेयरमैन होता है। फिल्म प्रभाग और टीवी प्रभाग, फिल्म व टेलीविजन दोनों में कोर्स संचालित करता है। यहां फिल्म निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, ऑडियोग्राफी व फिल्म संपादन में तीन साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कराया जाता है। संस्थान अभिनय में दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा कोर्स भी संचालित करता है। सत्यजीत रे फिल्म व टेलीविजन संस्थान (एसएफआरटीआई) कोलकाता की स्थापना भारत सरकार द्वारा एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान के रूप में की गई जिसका प्रशासनिक नियंत्रण सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास है। यह पश्चिम बंगाल सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1961 के अंतर्गत पंजीकृत हुई थी। कोलकाता स्थित इस संस्थान का नामकरण प्रख्यात फिल्मी हस्ती सत्यजीत रे के नाम पर हुआ है औऱ यह राष्ट्रीय स्तर का दूसरा महत्वपूर्ण फिल्म प्रशिक्षण संस्थान है। संस्थान निर्देशन, पठकथा लेखन,  सिनेमेटोग्राफी, संपादन और ऑडियोग्राफी में तीन साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कराता है। (लेखक पीआईबी भोपाल में अपर महानिदेशक हैं)

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घनश्‍याम गोयल / सम्राट बंदोपाध्‍याय कृषि को लाभकारी व्यापार बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के कदम उठाए जा रहे हैं जिनमें गुणवत्ता में सुधार और उपलब्‍धता के लिए आवश्यक साधन जुटाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। जिनमें खाद्य, बीज, बिजली और सिंचाई की सुविधाओं को प्राथमिकता में शामिल किया जा रहा है।  इन कदमों के उठाने से कृषि को लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है। जिनमें निम्नलिखित हैं- सरकार किसानों को गुणवत्ता वाले बीज और उर्वरक उपलब्ध कराने और वितरण के लिए विभिन्न पद्धतियों, योजनाओं को लागू करने जा रही है। भारत सरकार ने इसके लिए दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेयू) की शुरूआत की है। जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रो में किसानों को खेती और गैर-खेती के लिए अलग से विश्वसनीयता के साथ समुचित बिजली आपूर्ति के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण करना है। डीडीयूजीजेयू योजना में ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को भी शामिल किया रहा  है। जल राज्य का विषय है। जल स्रोत/सिंचाई उपायों को योजनावद्ध तरीके से लागू करने और इसे बनाए रखने के लिए राज्य सरकारों को उनके अपने संसाधनों के हिसाब से प्राथमिकता देना होगा। राज्यों को भारत सरकार वित्तीय सहायता, तकनीकी सहायता, उपलब्ध करा रही है। इसके तहत भारत सरकार जल निकाय योजना एंड सीएडीडब्लयूएम कार्यक्रम के तहत राज्यों को त्वरित गति सिंचाई लाभ कार्यक्रम, मरम्मत, पुनरुद्धार आदि सहायता मुहैय्या करा रही है। इन कार्यक्रमों के जरिए देश में सिंचाई की संभावना को बढ़ावा दिया जा सकेगा साथ ही प्रभावी उपयोगिता भी सुनिश्चित की जा सकेगी। विभिन्न योजनाओं के जरिए किसानों को लघु सिंचाई और सुरक्षित खेती के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान किया जा रहा है। राष्ट्रीय दीर्घकालिक कृषि लक्ष्य और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत एकीकृत बागवानी विकास के लिए ऑन-फार्म जल प्रबंधन (ओएफडब्ल्यूएम) को महत्व दिया जा रहा है। लघु सिंचाई सहायता के लिए ओएफडब्ल्यूएम के तहत 35% छोटे अत्यंत छोटे किसानों के लिए 25% और अन्य किसानों के लिए 5 हेक्टेअर प्रत्येक किसान के हिसाब से सहायता दी जा जाएगी। यह सहायता 50% और 35% अलग-अलग क्षेत्रों कें हैं जो ड्राट एरिया प्रोग्राम, डेजर्ट  डेवलैपमेंट प्रोग्राम और नार्थ इस्टर्न एण्ड हिमालयन रीजन के तहत आते हैं। ग्रीन हाउस बनाने के लिए एकीकृत बागवानी विकास कार्यक्रम के तहत फसलों की सुरक्षा के लिए 4000 स्क्वयर मीटर तक प्रत्येक किसान को 50 प्रतिशत की सहायता दी जाएगी। राज्य सरकारें भी राष्ट्रीय किसान विकास योजना के तहत ऐसी तकनीकियों का बढ़ावा दे रही हैं। सरकार कई योजनाओं को लागू कर रही है जिसमें राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा लक्ष्य (एनएफएसएम), एकीकृत बागवानी विकास क्रार्यक्रम (एमआईडीएच), राष्ट्रीय आयलसीड एंड आयल पाम (एनएमवोवोपी) और ग्रामीण भंडारण योजना आदि शामिल है। जो कृषि में निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं। सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए एकीकृत कृषि विकास के मुद्दे पर काम कर रही है। इसके लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के निर्धारण का उपयोग करते हुए राज्यों में कृषि विकास योजनाओं के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का बड़ा संगठन बनाना है। कृषि क्षेत्र को सरकार ने ऋण देने के लिहाज से प्राथमिकता के तौर पर चिन्हित किया है। जो बैंक के कुल ऋण का 18 प्रतिशत हिस्सा होगा। किसानों को फसल ऋण 7 प्रतिशत वार्षिक दर पर दिया जाएगा। अगर किसान समय पर ऋण चुकता करते हैं तो उन्हें 3 प्रतिशत का परिदान दिया जाएगा। किसानों को गोदाम की रसीद पर फसल से पहले 6 महीने के लिए ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है, ऋण की शर्तें ठीक वही हैं, जो उन्हें आपात बिक्री से बचाती हैं। इस प्रकार अन्य उद्योगों की तुलना में किसानों को दिया जाने वाला फसल ऋण सबसे सहूलियत वाला है। यद्यपि फसल पूर्व ऋणि पैदावार प्रबंधन, विपणन, प्रौद्योगिकी आदि पर संबंधित बैंक द्वारा स्पष्ट दर पर उपलब्ध हैं। सरकार ने राजस्व संबंधित कई उत्साही उपाय भी किए हैं। जो इस प्रकार हैं - टैक्स में कमी, कर्ज में कटौती, विशेष खाद्य सामग्री में कस्टम ड्यूटी में छूट आदि शामिल है। इस तरह के पहल से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को उत्साहित किया जा सकेगा। कृषि एवं प्रसंस्कृति खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) भी विभिन्न कृषि और संसाधित खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं को लागू कर रहा है। किसानों को उच्‍च गुणवत्‍ता वाले बीज और उर्वरक उपलब्‍ध कराने, विभिन्‍न अभियानों, योजनाओं और परियोजनाओं का ब्‍यौरा इस प्रकार है – •बागवानी समेकित विकास अभियान- इस अभियान के तहत सब्जियों और मसालों संबंधी बीज उत्‍पादन को प्रोत्‍साहन देने के लिए काम किया जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र को कुल लागत की शत-प्रतिशत सहायता प्रदान की जाती है। जहां तक निजी क्षेत्र का प्रश्‍न है, उसे लागत का 50 प्रतिशत सहायता के तौर पर दिया जाता है। यह सहायता प्रति लाभार्थी के संबंध में अधिकतम 5 हेक्‍टेयर क्षेत्र के लिए सब्सिडी के आधार पर ऋण से जुड़ी है। •राष्‍ट्रीय कृषि विस्‍तार एवं प्रौद्योगिकी अभियान- इस अभियान के तहत बीज और पौधे संबंधी उप-अभियानों से संबंधित कई योजनाएं और गतिविधियां चल रही हैं ताकि बीज क्षेत्र का विकास किया जा सके और अधिक उपज वाले बीजों का उत्‍पादन किया जा सके। ये बीज सभी प्रकार की फसलों के लिए हैं और इन्‍हें सस्‍ती दरों पर किसानों को उपलब्‍ध कराया जाना इस अभियान का लक्ष्‍य है। इसके अतिरिक्‍त बीज उत्‍पादकों को भी नई किस्‍मों की पौधों के विकास के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने का भी इस अभियान का लक्ष्‍य है। •कृषि विज्ञान केंद्र- ये केंद्र भी बेहतर गुण वाले बीजों के उत्‍पादन और किसानों को ऐसे बीज प्रदान करने की गतिविधियों से जुड़े हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान उन्‍नत किस्‍म और संकर दलहनों, तिलहन, दालों, वाणिज्‍य फसलों, सब्जियों, फूलों, फलों, मसालों, चारा, वनौषधि, औषधीय पौधों और फाइवर फसलों के 1.57 लाख कुंतल बीजों का उत्‍पादन किया गया और इन्‍हें 2.61 लाख किसानों को उपलब्‍ध कराया गया। •तिलहनों और पाम ऑयल संबंधी राष्‍ट्रीय अभियान- इस अभियान के तहत उन्‍नत बीज की खरीद, प्रमाणित बीजों के उत्‍पादन और वितरण, नई प्रौद्योगिकियों संबंधी मिनी किट का वितरण, बीज संरचना विकास, पाम ऑयल और पेड़ों से प्राप्‍त होने वाले तिलहनों, जैव उर्वरकों, जिप्‍सम, पाइराइट, लाइमिंग, डोलोमाइट इत्‍यादि के उत्‍पादन के लिए सहायता प्रदान की जाती है। •राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान – इस अभियान के तहत किसानों को विभिन्‍न किस्‍मों और संकर फसलों से संबंधित ज्‍यादा उपज वाले प्रमाणित बीजों को सब्सिडी पर उपलब्‍ध कराया जाता है। धान, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों के उत्‍पादन के लिए मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले पोषक भी सब्सिडी पर किसानों को उपलब्‍ध कराए जाते हैं। इसके अलावा जैव उर्वरक भी सब्सिडी पर किसानों को दिया जाता है। • उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 – उच्‍च गुणवत्‍ता वाले उर्वरकों के नियमन के लिए 1985 में इस आदेश को लागू किया गया था। कोई भी व्‍यक्ति ऐसे किसी उर्वरक का उत्‍पादन और आयात, बिक्री, भंडारण, बिक्री का प्रस्‍ताव, प्रदर्शन या वितरण नहीं कर सकता जो इस आदेश के तहत अधिसूचित नहीं है। राज्‍य सरकारों के अधिकृत उर्वरक निरीक्षक समय-समय पर उर्वरकों के नमूने लेते हैं और उनकी गुणवत्‍ता की जांच करते हैं। जहां तक आयातित उर्वरकों का प्रश्‍न है, केंद्र सरकार के उर्वरक निरीक्षक जहाजों या कंटेनरों से नमूने लेकर उनकी गुणवत्‍ता की जांच करते हैं। •रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन उर्वरक विभाग बेहतर यूरिया और फास्‍फेटिक तथा पोटाश संबंधी उर्वरकों की 22 किस्‍में सब्सिडी की दरों पर किसानों को उपलब्‍ध कराते हैं जो उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के कड़े मानदंडों के अनुरूप होता है।

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मांट। कस्बे के नगला हरदयाल में यहां के रहने वाले खेम सिंह पुत्र छीतर आदि चार लोगों ने विवाहिता नीरज की गर्दन में फांसी का फंदा डालकर हत्या का प्रयास किया। ये लोग दहेज की मांग कर रहे थे। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। इस संबंध में पीडि़त विवाहिता नीरज के पिता भूपेंदर सिंह पुत्र कारेलाल निवासी लालगढ़ी बलदेव ने खेम सिंह पुत्र छीतर निवासी हरदयाल नगला मांट आदि चार के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई है।

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