डॉ. पीजे सुधाकर
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, फिल्म समारोह निदेशालय के संरक्षण में गोवा सरकार और भारतीय फिल्म उद्योग के सहयोग से आईएफएफआई सचिवालय द्वारा आयोजित 45वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया।
यह समारोह दुनियाभर के सिनेमा को यहां लाता है और भारत के समकालीन और कालजयी सिनेमा का गुलदस्ता, विविध तरह की फिल्मों के प्रदर्शन, अकादमिक सत्रों व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रमों द्वारा दुनिया के सामने पेश करता है। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (पूरा विश्व एक परिवार है) की अवधारणा पर आधारित है।
समारोह में दुनियाभर की उन बेहतरीन फिल्मों को दिखाया जाएगा जो विश्व सिनेमा के उभरते ट्रेंड को बारीकी से दर्शाती हैं। संवेदनशीलताओं और नजरिये का यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान, भारतीय सिनेमा की संवेदनशीलता को पूरे महाद्वीप में पहुंचाता है।
मुख्य आकर्षण
आईएफएफआई 2014 में विभिन्न श्रेणियों में 75 देशों की 179 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इसमें विश्व सिनेमा (61 फिल्में), मास्टर-स्ट्रोक्स (11 फिल्में), महोत्सव बहुरूपदर्शक (फेस्टिवल केलिडोस्कोप) (20 फिल्में), सोल ऑफ एशिया (7 फिल्में), डॉक्यूमेंट्री (6 फिल्में), एनीमेटेड फिल्में (6 फिल्में) शामिल रहीं। इसके अलावा भारतीय पैनोरमा वर्ग में 26 फीचर और 15 गैर फीचर फिल्में थीं। पूर्वोत्तर समारोह का फोकस क्षेत्र रहा, इसलिए आईएफएफआई 2014 में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की 7 फिल्में प्रदर्शित की गईं।
क्षेत्रीय सिनेमा भी समारोह का अहम हिस्सा रहा। इस वर्ष के समारोह में पुनरावलोकन वर्ग (रिट्रोस्पेक्टिव सेक्शंस) में गुलजार और जानू बरुआ पर फिल्म तथा रिचर्ड एटनबरो, रॉबिन विलियम्स, ज़ोहरा सहगल, सुचित्रा सेन पर विशेष समर्पित फिल्में और फारुख शेख को विशेष श्रद्धाजंलि अन्य आकर्षण रहे।
ऐतिहासिक परिदृश्य
आईएफएफआई के पहले संस्करण का आयोजन भारत के पहले प्रधानमंत्री के संरक्षण में भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की तरफ से 24 जनवरी से 1 फरवरी 1951 तक मुंबई में हुआ था। इसके बाद यह समारोह मद्रास, दिल्ली और कलकत्ता में भी आयोजित हुआ। सबमें करीब 40 फीचर और 100 लघु फिल्में शामिल रहीं। दिल्ली में आईएफएफआई का उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 21 फरवरी 1952 को किया गया था। अपनी शुरुआत के बाद 1952 में आईएफएफआई भारत में अपने तरह का सबसे बड़ा आयोजन था। इसके बाद आईएफएफआई का नई दिल्ली में आयोजन हुआ। जनवरी 1965 में तीसरे संस्करण से आईएफएफआई प्रतिस्पर्धी बन गया। 1975 से फिल्मोत्सव शुरू हुआ और बाद में इसे आईएफएफआई में मिला दिया गया। 2004 में आईएफएफआई का आयोजन गोवा में हुआ। तब से आईएफएफआई वार्षिक समारोह बन गया और इसकी प्रकृति प्रतिस्पर्धी हो गई। गोवा आईएफएफआई का स्थायी स्थान बन गया है।
आईएफएफआई का लक्ष्य, फिल्म कला की श्रेष्ठता को दर्शाने वाले दुनियाभर के सिनेमा को साझा मंच देना, विभिन्न देशों में उनकी अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाने वाली फिल्म संस्कृति के संदर्भ में समझदारी को बढ़ाना और प्रोत्साहित करना और दुनिया के लोगों में मित्रता और सहयोग को बढ़ावा देना है। आईएफएफआई के स्थापना सिद्धांतों के केंद्र में हर विधा के फिल्मकारों की खोज, प्रोत्साहन और उन्हें सहयोग देना है ताकि शैली, सौंदर्यशास्त्र और विषयवस्तु में विविधता को एक साथ लाया जा सके। यह समारोह एक ऐसी जन और राष्ट्रों की सभा है जहां दुनिया के महानतम फिल्म कलाकार उभरती प्रतिभाओं के साथ समान रूप से हाथ थामे खड़े दिखाई देते हैं। यह फिल्म पेशेवरों का भी मंच है जहां वो दुनिया भर के फिल्म प्रेमियों से आमने-सामने मुखातिब होते हैं। आईएफएफआई का लक्ष्य भारतीय सिनेमा को विकसित करना, प्रोत्साहित करना और प्रेरित करना तथा इसे बाहर की दुनिया और इस विशाल देश के विविध तरह के दर्शकों के सामने पेश करना है। तेजी से बदलती तकनीक के साथ इस समारोह का महत्व तभी बरकरार रह सकेगा जब यह दर्शकों और फिल्मकारों को एक साथ लाए और उनके सामने उभरती तकनीकों व नई सोशल मीडिया की चुनौतियों को रख सके। नई अंतःक्रियाएं परिकल्पित हो, नई रणनीतियां तय की जाएं, इस लिहाज से आईएफएफआई का संस्करण देखने के अनुभवों को परिष्कृत, व्यापक और समृद्ध कर रहा है।
फिल्म समारोह निदेशालय
फिल्म समारोह निदेशालय देश और विदेश में फिल्म समारोहों का आयोजन करता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म समारोह निदेशालय की स्थापना 1973 में की गई जिसका मुख्य उद्देश्य अच्छे सिनेमा को बढ़ावा देना था। इसे व्यापक श्रेणियों में विविध तरह की गतिविधियों के रूप में आयोजित किया जाता है। इसमें मुख्य श्रेणियां हैं भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, विदेशों में भारतीय मिशन के द्वारा सांस्कृतिक आदान-प्रदान व भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन, भारतीय पैनोरमा का चयन, विदेश में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भागीदारी, भारत सरकार की तरफ से विशेष फिल्म प्रदर्शनी और प्रिंट संचयन व दस्तावेजीकरण। ये गतिविधियां भारत और बाकी दुनिया के देशों के बीच सिनेमा के क्षेत्र में विचारों व सांस्कृतिक अनुभवों के आदान-प्रदान का विल्क्षण मंच मुहैया करती हैं।
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी)
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का गठन सिनेमेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत, भारत में फिल्मों को प्रदर्शनों के लिए प्रमाणित करने के लिए किया गया है। बोर्ड का गठन चेयरपर्सन और 25 अन्य गैर-अधिकारी सदस्यों को मिलाकर होता है। बोर्ड का मुख्यालय मुंबई में है और इसके 9 क्षेत्रीय केंद्र हैं। क्षेत्रीय केंद्र को फिल्मों के मूल्यांकन में एक परामर्श मंडल द्वारा सहयोग किया जाता है जिसका गठन जीवन के विविध क्षेत्रों के लोगों को लेकर किया जाता है।
फिल्म प्रभाग
फिल्म प्रभाग का गठन जनवरी 1948 में पहले के भारतीय सूचना फिल्म और भारतीय समाचार परेड, जिसका गठन 1943 में प्राथमिक तौर पर युद्ध का कवरेज करने के लिए हुआ था, का पुनर्गठन करके किया गया। 1918 के सिनेमेटोग्राफी एक्ट का 1952 में भारतीयकरण किया गया जिसमें डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन पूरे देश में करना अनिवार्य बना दिया गया। 1949 से फिल्म प्रभाग हर शुक्रवार को देशभर में फैले थियेटरों के लिए 15 राष्ट्रीय भाषाओं में डॉक्यूमेंट्री या समाचार आधारित या एनिमेशन फिल्में रिलीज करता है। इसका लक्ष्य व उद्देश्य राष्ट्रीय परिदृश्य (जो जनता के विकास की लिए शुरू की गई सरकार की योजनाओं, नीतियों, कार्यक्रमों व परियोजनाओं के लिए व्यापक प्रचार मंच मुहैया कराती है) पर केंद्रित फिल्में दिखाना है, जो राष्ट्रीय कार्यक्रमों के बारे में लोगों को शिक्षित व प्रेरित कर सके और देश की विरासत तथा यहां की धरती की छवि को भारतीय व विदेशी दर्शकों के सामने पेश कर सके। इस तरह की फिल्मों का प्रदर्शन फिल्म प्रभाग के प्रधान कामों में से एक है। भारत का फिल्म प्रभाग फिल्मों का डिजीटलीकरण और वेब प्रसारण करता है। 60 सालों के दौरान फिल्म प्रभाग 8100 फिल्मों के संग्रह जिसमें कि दस्तावेजी फुटेज, न्यूज रील, न्यू मैगजीन डॉक्यूमेंट्री, एनिमेशन और लघु फिल्में हैं के साथ राष्ट्रीय इतिहास का खजाना कोष बन गया है। फिल्मी सामग्री बहुत नाजुक और क्षणिक होती हैं अगर उन्हें सही से आदर्श परिस्थितियों में नहीं रखा जाए तो वो नष्ट होने लगती हैं। इसीलिए, फिल्मी सामग्रियों के संग्रहण और संरक्षण के लिए “वेबकॉस्टिंग एडं डिजीटाइजेशन ऑफ फिल्म डिवीजन फिल्म्स” शुरू किया गया। फिल्मों को टेलीसिने मशीन के द्वारा दोहरे डिजीटल फार्मेट में रखा जाता है जिसके बाद उन्हें डीजी बीटी के हाई डिफिनिशन टेप में संग्रहित किया जाता है। यह दुनिया में सबसे नवीनतम तकनीक है। इसके बाद फिल्म प्रभाग इन्हें तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत करता है जैसे कि अत्यंत मूल्यवान व मूल्यवान फिल्में, जिन्हें हाई डिफिनिशन टेपों में रखा जाता है और साधारण फिल्मों को डीजी बीटा में रखा जाता है। टेलीसिने ट्रांसफर और संरक्षण के बाद नियमित इस्तेमाल के लिए फिल्मों की डीवीडी/वीसीडी बनाई जाती है।
भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय
पुणे स्थित भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय, भारतीय फिल्मों का समृद्ध कोष है। सिनेमा को कला और इतिहास की तरह संरक्षित करने को पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण माना जाता है। सिनेमा को इसके सभी विविध भाव और रूपों में संरक्षित करने का काम उस राष्ट्रीय संगठन को सुपुर्द किया गया है जिसके पास पर्याप्त साधन, स्थायी ढांचा और फिल्म उद्योग का विश्वास है। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त इकाई के रूप में फरवरी 1964 में की गई। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय का लक्ष्य भावी पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय सिनेमा की पहचान कर उसका अधिग्रहण और संरक्षण करना है तथा विश्व सिनेमा की प्रतिनिधि फिल्मों का संग्रह तैयार करना है। इस संगठन का मुख्य काम फिल्मों से संबंधित दस्तावेजों का वर्गीकरण करना, सिनेमा पर शोध करना और उसे बढ़ावा देना, उनका प्रकाशन और वितरण करना है। यह देश में फिल्म संस्कृति के प्रसार के केंद्र के रूप में भी काम करता है तथा विदेशों में भारतीय सिनेमा के सांस्कृतिक मौजूदगी सुनिश्चित करता है।
राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम लिमिटेड (एनएफडीसी)
राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम लिमिटेड (एनएफडीसी) 1975 में निगमित किया गया (100 प्रतिशत भारत सरकार की मिल्कियत वाली संस्था) जिसे भारत सरकार ने गठित किया है। इसका प्राथमिक उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग के संगठित, सक्षम और एकीकृत रूप में विकास करना है। भारतीय फिल्म उद्योग के विकास में मदद कर सकने वाली संस्था की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने फिल्म वित्त निगम (एफएफसी) और भारतीय पिक्चर निर्यात निगम (आईएमपीईसी) का एनएफडीसी में विलय कर दिया। एनएफडीसी ने 200 से अधिक फिल्मों को आर्थिक मदद दी है और निर्मित किया है। विभिन्न भारतीय भाषाओं की इन फिल्मों को व्यापक रूप से सराहा गया और इन्होंने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
भारतीय सिनेमा की शताब्दी
भारतीय सिनेमा की शताब्दी के मौके पर साल 2012 में एक विशेष वेबसाइट आम लोगों से लेख आमंत्रित करने के उद्देश्य के साथ शुरू की गई थी। राज्यों की राजधानियों में भारतीय सिनेमा की शताब्दी के अभिनंदन के क्रम में पहला शताब्दी फिल्म समारोह पुडुचेरी सरकार की तरफ से 24-26 अगस्त 2012 को आयोजित किया गया। भारतीय सिनेमा का शताब्दी अभिनंदन के क्रम में एनएफएआई ने अगस्त, 2012 में तीन भारतीय मूक फिल्मों की एक डीवीडी जारी की जिसमें कि विशेषतौर से ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) की दो बची रील का संगीत, डीजी फाल्के का बेहतरीन नमूना ‘कालिया मर्दन’(1919) और एकमात्र उपलब्ध बंगाली फिल्म कालियापदा दास की उत्कृष्ठ कॉमेडी फिल्म ‘जमाई बाबू’ (1931) शामिल है।
भारतीय फिल्म संस्थान की स्थापना 1960 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत की गई। इसके अतिरिक्त 1974 में इसकी टेलीविजन शाखा भी शुरू हुई। बाद में संस्थान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान के रूप में पुनर्गठित किया गया। अक्टूबर 1974 में रजिस्ट्रेशन ऑफ सोसाइटी एक्ट 1860 के अंतर्गत संस्थान को सोसाइटी बना दिया गया। सोसाइटी का गठन फिल्म, टेलीविजन, संचार, संस्कृति क्षेत्र की प्रख्यात हस्तियों, संस्थान के पूर्व छात्र और सरकार के कार्यकारी अधिकारी को सदस्य बनाकर किया जाता है। संस्थान का संचालन गवर्निंग काउंसिल के जरिये किया जाता है जिसका प्रमुख चेयरमैन होता है। फिल्म प्रभाग और टीवी प्रभाग, फिल्म व टेलीविजन दोनों में कोर्स संचालित करता है। यहां फिल्म निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, ऑडियोग्राफी व फिल्म संपादन में तीन साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कराया जाता है। संस्थान अभिनय में दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा कोर्स भी संचालित करता है। सत्यजीत रे फिल्म व टेलीविजन संस्थान (एसएफआरटीआई) कोलकाता की स्थापना भारत सरकार द्वारा एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान के रूप में की गई जिसका प्रशासनिक नियंत्रण सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास है। यह पश्चिम बंगाल सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1961 के अंतर्गत पंजीकृत हुई थी। कोलकाता स्थित इस संस्थान का नामकरण प्रख्यात फिल्मी हस्ती सत्यजीत रे के नाम पर हुआ है औऱ यह राष्ट्रीय स्तर का दूसरा महत्वपूर्ण फिल्म प्रशिक्षण संस्थान है। संस्थान निर्देशन, पठकथा लेखन, सिनेमेटोग्राफी, संपादन और ऑडियोग्राफी में तीन साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कराता है।
(लेखक पीआईबी भोपाल में अपर महानिदेशक हैं)
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