मथुरा

खान शाहरूख खान के फॉलोअरो की संख्या टि्वटर पर 70 लाख हो गई है। आज के दौर में बॉलीवुड के कई सितारे माइको ब्लॉगिंग साइट टर पर सçRय है। टर के जरिए बॉलीवुड सितारे प्रशंसक से जु़डे रहते हंै। शाहरूख खान भी उन सितारों में शामिल हैं जो टि्वटर पर अपने अपडेट प्रशंसको के बीच शेयर करते रहते हैं। टि्वटर पर अब शाहरूख के फॉलाअरो की संख्या 70 लाख से अधिक हो गई है। हालांकि अब भी वह सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से पीछे है। टर पर अमिताभ के फॉलाअरो की संख्या 81 लाख से अधिक है। वहीं शाहरूख इस मामले में आमिर, सलमान और ऋतिक रौशन से आगे चल रहे हैं। साभार-khaskhabar.com

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ओडिशा : लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पीएम पद के उम्मीद्वार नरेंद्र मोदी ओडिशा के संबलपुर में रैली को संबोधित किया, इसमें वो विजय संकल्प रैली में कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा। मोदी ने कहा कि कोई भी अच्छा काम बीजेपी ने किया है चाहे वो कोई भी राज्य हो आप देख सकते हो। कांग्रेस लोगों के आखों में धूल झोकने का काम कर रही है, उसे गरीबों की चिंता नहीं है। उन्होने कहा कि गरीब मेहनत करने के लिए तैयार है लेकिन उसे रोजगार ही नहीं मिल रहा है। कैसे जलेगा इनके घरों में चुल्हा इसकी चिंता कांग्रेस को नहीं है। किसान मर रहा है दिल्ली सरकार को परवाह नहीं है। समीक्षा भारती न्यूज सर्विस

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नई दिल्ली रू आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया वालों को जेल भेजने की धमकी दे डाली है। केजरीवाल ने भाषण में कहा कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह मीडियावालों की जांच कराएंगे और उन्हें जेल भिजवाएंगे। उन्होने आरोप लगाया कि देशभर के टीवी चैनल बिके हुए हैं इसलिए सिर्फ मोदी.मोदी की रट लगा रहे हैं। हालांकि बाद में केजरीवाल ने अपने इस बयान का खंडन करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसा कोई भाषण नहीं दिया। केजरीवाल ने भाषण में कहा कि पिछले एक साल से हमारे दिमाग में भर दिया गया है कि मोदी हैण्ण्ण्मोदी है। उन्होंने कहा कि कुछ टीवी चैनल मोदी के साथ मिलकर कह रहे हैं कि रामराज्य आगया और भ्रष्टाचार दूर हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि मीडिया वाले बिक चुके है मोदी को प्रमोट करने के लिए। केजरीवाल ने मीडिया को घेरे में लेते हुए कहा कि गुजरात में पिछले 10 सालों में 800 किसानों ने आत्महत्या कीए मोदी ने अडानी को एक रुपए में जमीन बेच दी। लेकिनए यह कोई चैनल वाला नहीं बताएगा।  समीक्षा भारती न्युज सर्विस

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सविता पाण्डेय छोटे.छोटे पालनों में झूलतींण्ण्ण् गुलाबी कपड़ों में लिपटीं नवजात बच्चियां। डॉक्टरों की लाख मनाही के बावजूद किसी.किसी की आंखों में लगे मोटे.मोटे काजलों के बीच गुपचुप ताकती लड़कियां। हुह! ढीठ लड़कियां। देखो तो कैसे घूर रही हैं। सबकी सब एक साथ। घूरती रहो सब मिलकरए मैं नहीं डरने वाली। जन्म नहीं दूंगी एक और लडक़ी। लता बुदबुदायी। जब से अल्ट्रासांउड की रिपोर्ट आई है और लता को पता चला है कि सेक्स फीमेल हैए उसके खयालों में इसी तरह आती रहती हैं दृ लड़कियांए गुलाबी कपड़ों में लिपटींए उसे डराती सी। लता उन सबका सामना नहीं कर सकती। डरती है सचमुच डरती हैए कि इनकी जिदए गुस्से के आगे झुकना ना पड़े। डॉक्टर ने सप्ताहभर बाद अबॉर्शन की डेट दी है और वह जो उसके अंदर पल रही हैए वह तो जैसे दिन भर में कई.कई बार उसे लानतें भेजती रहती है. आने दो न इस सुंदर दुनिया में केतकी का फूल बन खिल जाऊंगी तुम्हारे घर मेंए मुझे नहीं भाते केतकी के फूल। काट डालूंगी तुम्हारी जड़ें मैं। लता बोली। मार दोगी तुम मुझेघ्  हां! हां! मुझे नहीं चाहिए एक और लडक़ी। तुम मुझे नहीं मार सकती। मुंह नोंच लूंगी मैं तुम्हारा। बित्तेभर की लडक़ी और गजभर की जुबान। अभी तो दुनिया भी नहीं देखी और मुंह नोंचने की बात करती है। गुस्से से चेहरा कैसा लाल था. मानो अभी खून टपक पड़े। लता को तो अपनी दुनिया में सिर्फ दो बच्चे चाहिए। दो बच्चे कितने काम लगते हैं दो बच्चें. एक लडक़ाए एक लडक़ी। छोटा परिवार दो बच्चों का परिवार। लेकिन दो लड़कियां। कितनी अधिक होती हैं दो लड़कियां। पूरे घर को भर देती हैं दो लड़कियां। दो लड़कियां पूरे घर में फैल जाती हैं। दो लड़कियों की एक साथ उच्चरित आवाज असह्य हो जाती है। दो लड़कियां दिनभर उधम मचाती हैं। दो लड़कियां लड़ती हैं झगड़ती हैं। जिद्दी लड़कियां। नकचढ़ी लड़कियां। दो लड़कियां टेपरिकॉर्डर के संगीत की तेज आवाज में दिनभर नाचती हैं। अभी अबॉर्शन में दिन शेष हैं। लता पांच साल की रिमी के साथ लेटी है कि वह फिर आ जाती है। वही जो अभी भ्रणू रूप ही है। वहीं जो हर पल यह रंगीन दुनिया देखने को व्याकुल है। वहीं जो लता के अंदर पल रही है। आकर शीशे से झांकती है .ष्ष्तुम सो रही होघ् मैं भी सोना चाहती हूंए तुम्हारी गोद में रिमी की तरह। नहीं! मैं नहीं भर सकती अपने अंक में दो.दो लड़कियां। दो लड़कियों के भार से मेरी बांहें दुखती हैं। लता नींद में बड़बड़ाई। .लेकिन मैं तो बहुत हल्की हूं। फूल.पत्तों सीए रुई के फाहों सीए चिडिय़ों के पंख सी। .नहीं.नहीं मेरा रोम.रोम कांपता हैए नस.नस फटती हैए दो लड़कियों के स्पर्श से। . छी! कितनी कमजोर हैं तुम्हारी नसें। नोंच डालूं तुम्हारे रोम.रोमघ् बोलो न! नोच दूं। तुम्हारा सारे रोमघ्  और वह हंस पड़ी। डरावनी हंसी में हंस पड़ी। लता हड़बड़ाकर उठ बैठी। देखा सोती हुई रिमी के चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखरी थी। लता देर तक सिर पकडक़र बैठी रही। रिमी को निहारती। उसे रिमी की बगल में एक और रिमी नजर आई। घुटने तक की फ्रॉक मेंए मुस्कुराती हुई। दो ष्रिम्मियोंष् ने उसकी दोनों आंखों को ढंक लिया। दो रिम्मियां आंखों में किरकिरी सी चुभने लगीं। दो रिम्मियां आंखों से आंसू बन टपक पड़ीं। लता को कमजोर करने लगीं। अनुरोध करने लगीं। लता ने जाकर अपना मुंह धोया। दोनों आकृतियां आंसुओं के साथ नाली में बह गईं। चेहरे पर छाया शोक. संताप भी धुल गया। कमजोरी छट गई। प्रतिज्ञा दृढ़ हो गई. मैं नहीं जन्म दूंगी एक और लडक़ी। पर वह एक और लडक़ी तो जैसे जन्म लेकर मानेगी। दुनिया में आकर रहेगी। खुद को जन्म देने के लिए अपनी मां से क्या.क्या जतन नहीं करती। लडऩाए रोनाए गुस्साना और कभी.कभी तो मान.मन्नौवल भी। पिछले दिन ही जब लता बरामदे में बैठी सब्जियां काट रही थी। वह आकर लता के गले में बांहें डाल झूल गई. मम्मा! प्यारी मम्मा! देखो कितने रंग लाई हूं। मैं और उसने अपनी मुठठी में भरे ढेर सारे रंग कमरे में बिखेर दिए। चमकीले रंग। उन रंगों में लता झिलमिला उठी। उन रंगों से सारा माहौल खुशनुमा हो गया। लता खुश हो गई। मम्मा! मुझे. आने दो इस घर में फिर देखना कौन.कौन से रंग लाती हूं। इन्द्र धुनष के सारे रंग। सब बंद हैं मेरी मुटठी में। इन्द्रधनुषी रंगों की चाहत लता के अंदर उमड़ उठी। हिलोरें लेने लगी। लता उन रंगों में डूबने.उतराने लगी। इस डूब से धीरे.धीरे उसकी सांसें घुटने लगी। वह सचमुच डूबने लगी. नहीं! मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे रंग३ लता चिल्लाई और पलक झपकते ही वह शैतान अपने रंगों के साथ ओझल हो गई। लाल रंग को छोडक़र। लाल रंग में लता को डूबोकर। सब्जी काटते हुए लता की अंगुली कट गई थी। उससे लाल रंग टपक रहा था। उफ्! यह क्या होता जा रहा है मुझे। हरपल वह लडक़ी मेरे इर्द.गिर्द छाई रहती है। लता बिलबिला उठी इस क्रंदन में सुबह का सपना छिपा था। जब लता की आंखें एक छोटे बच्चे का सपना बुन रही थीं। सपने में एक छोटा सा.बच्चा अपने हाथ में नन्हा दीपक लिए खड़ा था। दिया टिमटिमा रहा था। उस दिये की रौशनी से लता का सारा जीवन प्रकाशमान हो रहा था। लता भाव.विभोर मंत्रमुग्ध हो उस छोटे लडक़े को निहार रही थी। तभी यह लडक़ी फिर वहां आ गई। उस लडक़े को धक्का मारकर गिरा दिया और खुद उसके हाथों का दिया लेकर खड़ी हो गई। धीरे.धीरे दीपक मशाल मे बदल गया। दिन चढ़ आया था आंखे खुली तो लता का सारा शरीर आग की गर्मी सा तप रहा था। लता का मन अब कहीं नहीं लगता। हरदम खोयी.खोयी रहती है। बार.बार वह नन्हा दुध मुंहा चेहरा आंखों में उतर आता। अनुरोध करता. बचा लो न मुझे। कभी धमकता तुम मुझे नहीं मार सकती। लेकिन लता दृढ़ प्रतिज्ञ है। कठोर हो गई है। उसकी ममता सुख गई है। वह लड़की उसके पेट में लगातार लातें मारती है। उसके पैरों मे कीलें ठुकीं है। अबॉशर्न में अभी दो दिन बाकी हैं। कल सुबह लता को डॉक्टर के पास जाना है। बस दो दिन की बात है। लेकिन ये दो दिन! ये दो दिन जाने कब बीतेंगे। पिछले पांच दिन भी पांच महीनों से बीते। और ये दो दिन लंबे.लंबे दो दिन स्वतंत्रत होने के दो दिन। मुक्ति पाने के दो दिन। दो दिन शेष हैं। इस लडक़ी से छुटकारा पाने को फिर शांति३शांति३शांति३ए दैहिक शांतिए मानसिक शांतिए लड़की के गर्भ से मुक्त होने की सांसारिक शांति। इन दो दिनों में लता का शरीर पहले से भारी होता चला जा रहा है। यह भार मन मेंए आत्मा में दिमाग में नस.नस में भरता जा रहा है। कितनी भारी हो गई है यह लडक़ी गर्भ में३ इतना भार सह नहीं पा रही लता। उसके पैर. पिंडलियां सब दुखने लगेंगे३ सारी धरा का भार उसके अंदर है। तुम मुझे नहीं मार सकती३ किसी तरह डॉक्टर तक पहुंची। सातवें दिन से एक दिन पहले ही किसी तरह अस्पताल पहुंच सकी भर कि वहीं रिशेप्सन के सामने धम्म से धरती पर बैठ गई। पसीने से तरबतर। चला नहीं जा रहा उससे। धरती के एक.एक सागर की हलचल उसे अंदर मरोड़ रही है। दर्द बढ़ता जा रहा है। अचानक एक तेज दर्द उठा। समस्त जगत में शून्यता छा गई। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। तुम मुझे नहीं मार सकती की कई.कई कर्ण भेदी प्रतिध्वनियां एक साथ गूंज उठीं। इस त्वरित गूंज के साथ ही कुछ उसे चीरता सा उसके शरीर के बाहर आ गयादृ मिस कैरेज! गर्भपात!! लता को होश आया तो वह हॉस्पिटल के बिस्तर पर लेटी थी। हल्की होकर। डॉक्टर ने कहा कि अधिक तनावग्रस्तता के कारण उसका गर्भपात हो गया। लता हॉस्पीटल के ही कपड़े पहने थी। उसने देखा उसके कपड़े कमरे के एक कोने में पड़े हैं। इन्हीं कपड़ो में उसका गर्भपात हुआ। पसीने से खून में लथपथ कपड़े। गंदे कपड़े। छी!! घिनौने कपड़े। लेकिन उसने देखा उन कपड़ों में से कोई झांक रहा था। उसकी ओर आंखे तरेरता। उसे चिढ़ाता जीभ दिखाता. कहा था नए तुम मुझे नहीं मार सकती। मैं तो खुद ही बाहर आ गई। कहती हुई वह फिर से आकर लता से चिपक गई। उसकी बांहो में नहीं। गोद में नहीं। शरीर के उस हिस्से में जहां एक नन्हा सा दिल धडक़ता हैदृ बांयी तरफ। ;समीक्षा भारती न्यूज सर्विसद्ध

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सुनील शर्मा मोक्ष की प्राप्ति और मृत आत्माओं की शान्ति के लिये यमुना किनारे शवों का दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन आज इन मृत आत्माओं के लिये यमुना जल भी नसीब नहीं है। यमुना नदी में शहर के गंदे नाले तो जाकर मिल सकते है लेकिन मृत आत्माओं की शरीर के अवशेष यमुना में नही जा सकते है। अब किसी भागीरथ की पुनः आवश्यकता है जो कि मोक्षधाम के आस.पास इकट्ठा हो रहे मृत शरीर के अवशेषों के लिये यमुना को यहां तक ला सके। राजा सगर के पुत्रों की मुक्ति के लिये भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर अवतरित करके जहां उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्थ किया था वहीं आज तक यमुना हमारे जीवन और संस्कृति का अंग है। लेकिन जहां मथुरा भी धार्मिक स्थानों में से एक है जहां यदि किसी की मृत्यु हो जाती है और उसे यमुना नदी का जल मिल जाय तो उसकी पूर्ण मुक्ति मानी जाती है। नारद पुराण के अनुसार ष्ष्अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवन्तिका पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाष्ष् भारत की सात मोक्ष दायिनी पुरियों में से मथुरा भी एक पुरी मानी गयी है। जिसका आम जनमानस में बड़ा महत्व हैं। लेकिन शहर के बीचों.बीच बने दो शवदाह गृह ऐसे हैं। जिनमें अब तक लाखों मृत शरीरों को जलाया जा चुका है। लेकिन मजबूरी में परिवारी जन इन शवदाह ग्रहों में अपने इष्ट मित्र परिजनों आत्मीय जनों की दाह क्रिया तो करते है लेकिन दाह क्रिया के बाद क्या उनके शरीर के अवशेष यमुना नदी में प्रवाहित हो पाते है। यह कोई न तो सोचता है न ही देखता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार मान्यता है कि मृत शरीर की दाह क्रिया के बाद बचे अवशेष को यमुना में प्रवाहित किया जाय तभी मृत आत्मा को मुक्ति मिल पाती है। लेकिन आज तक लाखों आत्माएं मुक्ति की बाट जोह रही है शायद इन्हें मुक्ति नहीं मिली हो क्योंकि इनके अवशेषों को यमुना नदी में तो बहाया ही नहीं गया हैं। करोंड़ों रुपया खर्च करने के बाद नगर के धन्नासेठों ने पुण्यलाभ की कामना से मोक्षधाम का निर्माण तो कराया लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया कि मृत शरीर के अवशेष यमुना तक कैसे पहुंचेंगे। न ही यमुना इनके निकट आ सकती है ओर न ही मोक्षधाम यमुना के निकट जा सकता है। मोक्षधाम व यमुना के बीच भी यमुना में किसी अन्य पार्टी की जमीन है वह अपनी जमीन से किसी प्रकार की नाली भी यमुना तक नहीं निकालने देता है। इससे अवशेषों को किसी तरह से भी यमुना में प्रवाहित नहीं किया जा सकता है। उपर से पालिका प्रशासन ने मोक्षधाम के पीछे अपना खत्ता यानी पूरे शहर का कूड़ा करकट डालने का डलावघर तो बना दिया है। लेकिन मोक्षधाम से लेकर यमुना तक कोई व्यवस्था नहीं की है। हजारों लाखों ब्रज में मरने वाले मुक्ति के लिये भटक रहे है उनके मृत शरीर के अवशेष यमुना में मिलने को तड़फ रहे है तथा परिवारीजनों मलाल है कि उनके परिजनों आत्मीय जनों को यमुना का जल नहीं मिल पा रहा है। आज यमुना नदी की स्थिति क्या है यह किसी से छुपी नही है। इसमें शहर का गंदा पानी नालों का पानी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से गिर सकता है लेकिन शवदाह गृहों में मृत शरीर के अवशेष को यमुना में नहीं बहाया जा सकता है। कैसे होगी ब्रजवासियों की मुक्ति कौन पुनः भागीरथ की तरह आयेगा और इन मृत आत्माओं की मुक्ति के लिये यमुना को यहां तक लायेगा।

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प्रमोद कुमार पांडेय सुचित्रा सेन नहीं हैं३ अभिनय की सुंदरता नहीं है! ष्प्रियो बांधबीष् नहीं हैं। ष्देवदासष् की ष्पारोष् नहीं हैं। जी हांए अप्रतिम सौंदर्य और अभिनय की मिठास मृगनयनी सुचित्रा सेन बांग्ला सिने प्रेमियों के दिलों की रानी थीं। हिंदी सिनेमा जगत में भी उनकी बेहद लोकप्रियता थी। सुचित्रा ने 1952 में बांग्ला फ़िल्म ष्शेष कोथायष् से अपना सिने करियर शुरू किया और आगे चलकर अनेक मशहूर फ़िल्में कीं। बांग्ला सिनेमा की विशिष्ट अभिनेत्री होने के साथ हिंदी सिनेमा में भी लोकप्रिय रहीं। लोगों की स्मृतियों में उनकी अदाएं स्थायी रूप से अंकित हो गई हैं। हिंदी फिल्मों की बात करें तो विशिष्ट फिल्मकार बिमल रॉय की मशहूर फ़िल्म ष्देवदासष् में उन्होंने पारो का किरदार निभाया। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार देवदास की भूमिका में थीं। ष्देवदासष् में अभिनय के लिए उन्हें  राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था। 1978 में रिलीज़ हुई बांग्ला फ़िल्म ष्प्रनॉय पाशाष् के बाद उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया। इसके बाद वह सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं। अक्सर उनकी तुलना हॉलीवुड की ग्रेटा गार्बो से की जाती थीए जिन्होंने लोगों से मिलना.जुलना छोड़ दिया था। लम्बे समय तक सक्रिय नहीं रहने के बावजूद वह हमारी स्मृतियों में बनी थीं। लोग उन्हें चाहते थे। उनकी फिल्मों को याद करते थे। सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक लोगों के दिलों पर राज किया और ष्अग्निपरीक्षाष्ए ष्देवदासष् तथा ष्सात पाके बंधाष् जैसी यादगार फिल्में कीं। उन्होंने कुल 60 फ़िल्मों में काम किया। 53 बंगाली और सात हिंदी फ़िल्मों में। कहते हैं कि सुचित्रा सेन भारतीय सिनेमा इतिहास की पहली अभिनेत्री थीं जिन्होंने अपनी पहली फ़िल्म उस समय की जब वह एक बच्ची की माँ बन चुकी थीं। बंगाल में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के अवसर पर लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियों को उनकी शक्ल देने की कोशिश की जाती थी। चाहे उनका साड़ी बांधने का अंदाज़ हो या बाल काढ़ने का ढंग और धूप का चश्मा पहनने की अदा युवाओं में और सिने प्रेमियों में उन्माद की हद तक लोकप्रिय थी। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि उन्होंने महान फिल्मकार भारत रत्न सत्यजीत राय का उनके साथ काम करने का न्योता सिर्फ़ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी शर्तें उनसे मेल नहीं खाती थीं। कहते हैं कि हिंदी फ़िल्म ष्आंधीष्  में उनके निर्देशक कवि.गीतकार.फिल्मकार गुलज़ार तफ़रीह मेंए उन्हें हमेशा ष्सरष् कह कर पुकारा करते थे क्योंकि फ़िल्म की शूटिंग के दौरान बहुत वरिष्ठ होते हुए भी सुचित्रा गुलज़ार को ष्सरष् कहा करती थीं। अधिकतर फ़िल्मों में उन्होंने कामकाजी स्त्री की भूमिका को निभायाए हालांकि उस समय महिलाओं का बाहर काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। ष्सप्तापदीष् में वह एक आर्मी नर्स थीं३ ष्हरानो सुरष् में उन्होंने एक डॉक्टर की भूमिका निभाई थी। ष्जीबन तृष्णाष् में वह कलाकार बनीं और ष्आंधीष् में उन्होंने एक राजनीतिज्ञ के रोल को बख़ूबी निभाया। कहा जाता है कि सुचित्रा को एक फ़िल्म के लिए उस समय एक लाख रुपये की फ़ीस दी जाती थी और कई बार उनके नायक की पारिश्रमिक उनसे कम हुआ करती थी। 1962 में ष्बिपाशाष् में काम करने के लिए उन्हें एक लाख रुपये मिले थे जबकि उत्तम कुमार को सिर्फ़ अस्सी हज़ार रुपयों से संतोष करना पड़ा था। ष्बिपाशाष् की खास सफलता के बाद उन्होंने यकायक अपनी फ़ीस डेढ़ लाख कर दी थी। स्क्रीन पर उत्तम कुमार के साथ उनकी जो कैमिस्ट्री थीए वह अप्रतिम जोड़ी के रूप में मशहूर है। उत्तम कुमार अकेले ऐसे शख्स थे जो उन्हें उनके असली नाम ष्रोमाष् से पुकार सकते थे। वह एक दूसरे को ष्तुईष् ;तूद्ध कहकर भी पुकारते थे। वे अच्छे दोस्त थे। ष्प्रियो बान्धबी थींष् वह। जिस तरह से सुचित्रा सेन के जाने के बाद मीडिया सहित तमाम जगह उनकी चर्चा हुई। लोगों ने उन्हें ष्मिसष् किया। इससे उनकी जनप्रियता का प्रमाण मिलता है। लोगों के दिलों में उनका स्थायी प्रभाव बना हुआ है। सुचित्रा सेन का कलात्मक कृतित्व भारतीय सिनेमा में जगमगाता रहेगा। उनकी कृतियां हमारे मन.प्राण को झंकृत करती रहेंगी। वह रहेंगी जीवन के साथ३ जीवन में उल्लास बनकर। सुचित्रा भारतीय सिनेमा इतिहास में बनी रहेंगी हमेशा.हमेशा३ ;समीक्षा भारती न्यूज सर्विसद्ध

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