भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अप्रतिम योगदान देने वाले चंद्रशेखर आजाद भी उनमें से ही एक हैं। वह आजीवन आजाद रहे और मौत भी उनकी आजादी छीन न सकी।

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आज 15 फरवरी है, लेकिन इतिहास के पन्नों में आज से 89 साल पहले क्या हुआ था, यह शायद कम लोग ही जानते होंगे। आजादी के लिए देश के कोने-कोने में लड़ी गई लड़ाइयां समय-समय पर कहानी और किताबों के माध्यम से सामने आती रही हैं। तारापुर के शहीदों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

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दिल्ली हाट में चल रहे आदि महोत्सव में देश की समृद्धि जनजातीय संस्कृति की झलक लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। ‘जनजातीय भारत आदि महोत्सव’ का सबसे बड़ा आकर्षण यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं, जिनमें भारतीय जनजातीय समुदायों की विविधताओं का प्रदर्शन देखने को मिलता है।

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राजस्थान राज्य की राजनीति में हमेशा राजसी आन, बान और शान का बोलबाला रहा है। लेकिन, यह वह दौर था जब आजादी के बाद राजतंत्र के लोकतंत्र में बदलने के चलते जनता पर राज करने वाले राजा और महाराजा अब जनसेवक बनकर सामने आने की कोशिशें कर रहे थे। ऐसे ही एक महाराजा मान सिंह जनसेवक बन अपनी जड़ें जमाने में जुटे हुए थे। पूरी कहानी पढ़ने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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काशी विश्वविद्यालय से ‘शास्त्री’ की उपाधि‍ प्राप्त करने के बाद आजीवन कथावाचन और अध्यापन कार्य में रत रहे देवीराम शास्त्री को आज भी क्षेत्रीय लोग याद करते हैं।

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गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर देखने में जरूर धीर-गंभीर नजर आते थे लेकिन उनकी वाक्पटुता बेमिसाल थी। इसी का एक नमूना देखिए।

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