आगरा

अन्याय और उपेक्षा का लगातार शिकार रहा है आगरा। दो बैलों की जोड़ी से लेकर साइकिल तक का सफर, लेकिन, अब तक माया मिली न राम...

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भोपाल गैस त्रासदी से हमने हमने कुछ नहीं सीखा है। हमारे शहर हादसों और मानव निर्मित आपदाओं के कगार पर खड़े हैं। भोपाल की दुखद विरासत का भूत हर दिन बड़ा होता जा रहा है। शहरों का औद्योगिक परिदृश्य, सुरक्षा मानकों में ढिलाई और नियामक उदासीनता से पीड़ित है।

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साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगरा को ताज महल और अन्य धरोहरों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए हस्तक्षेप करने के बाद एक चौथाई सदी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आशा के अनुरूप परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। संसद के एक अधिनियम द्वारा गठित ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन प्राधिकरण प्रदूषण को नियंत्रित करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में बुरी तरह विफल रहा है।

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दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करने वाला, स्मारकीय भव्यता का खजाना शहर आगरा, आध्यात्मिक शून्यता में डूबा हुआ है। यह शहर अपनी समृद्ध विरासत से बेखबर है। जब दुनिया विरासत की पवित्रता का जश्न मनाती है, तब आगरा की सड़कों पर उदासीनता तैरती है। इसकी ऐतिहासिक संपदा में निहित विरासत और समृद्धि पर कोई चर्चा नहीं होती है।

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अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्रतिष्ठित ताजमहल के बीच, व्यस्त शहर आगरा में, सड़कों पर एक खामोश लेकिन जरूरी लड़ाई चल रही है। गरिमा की लड़ाई, स्वच्छ और सुरक्षित सार्वजनिक शौचालयों के रूप में बुनियादी मानवाधिकारों की लड़ाई...

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साल 1993 में सुप्रीम कोर्ट की सख्त दखल और एक दर्जन निर्देशों के बावजूद आगरा शहर ताज महल को प्रदूषण मुक्त माहौल देने में असफल रहा है। लगातार बढ़ रही भीड़ तो खतरा है ही, साथ ही, सूखी यमुना ताज महल के लिए एक नया संकट है। सुप्रीम कोर्ट को खुद अपने निर्णयों और उन पर अमल के परिणामों का ऑडिट करना चाहिए।

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