आगरा : ब्रज मंडल हैरिटेज कंजरवेशन सोसायटी के तत्वाधान में बीते कुछ दिन से चर्चा का केंद्र बनी किताब ‘ताज महल या ममी महल…?’ का विमोचन किया गया।
केंद्रीय हिंदी संस्थान के रजिस्ट्रार डॉ. चंद्रकांत त्रिपाठी ने किताब का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस किताब ने एक बहस शुरू कर दी है कि मुगल दौर में शवों का संरक्षण होता था या नहीं? उन्होंने कहा कि काफी शोध के बाद लिखी गई इस किताब से ताज से जुड़ा एक नया पहलू सामने आया है। होटल गोवर्धन में आयोजित विमोचन समारोह की अध्यक्षता सोसायटी के अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा ने की।
किताब के लेखक अफसर अहमद ने कहा कि उनका इस किताब को लिखने का मकसद मुमताज महल की मौत के वक्त हुई उन तमाम गतिविधियों से पर्दा उठाना था जो किसी न किसी वजह से इतिहास में दर्ज नहीं हो सकीं। अहमद के मुताबिक, शाहजहां के दरबारी इतिहासकार ऐसा कर सकते थे क्योंकि उनके सामने सिर्फ वही लिखने की मजबूरी थी जिससे बादशाह की कोई गलत छवि न बने इसलिए मुमताज का दफन किस तरह हुआ, इस पर कोई खास रोशनी नहीं डाली गई। अफसर ने कहा कि मेरे विचार से लोगों को यह जानने का हक है कि मुमताज के दफन का राज क्या है? क्या उसका दफन आम था या फिर बादशाह शाहजहां ने उसे आम लोगों की नजर से छिपाने की कोशिश की थी? इस लिहाज से इस किताब का पाठकों के सामने आना जरूरी है।
किताब में मुमताज की मौत के कारणों को बताया गया है। किताब में उस दौर की शाही यात्राओं का भी जिक्र है। इसमें मुमताज की मौत के वक्त के हालात का भी जिक्र है। अमानती दफन की परंपरा क्या थी और उसकी असल हकीकत क्या है... उसपर भी विस्तार से रोशनी डाली गई है। क्या मुगल सिर्फ इस्लामिक रिवाजों को ही मानते थे, इस सवाल का भी जवाब खोजा गया है। मुगल काल में शव को दफनाने के तौर-तरीकों पर भी रोशनी डाली गई है। मुमताज का शव कैसे दफन और संरक्षित हुआ..., यह भी बताया गया है। ताज पर होने वाले सालाना उर्स, ताज महल के निर्माण, उसकी मौजूदा कब्रों का भी विस्तार से इस पुस्तक में जिक्र है।
Read More