मनोरंजन

​राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या क्यों की और इस संगठन पर लगातार प्रतिबंध क्यों लगते रहे? साथ ही, प्रतिबंध उतनी ही बार 'हटते' भी क्यों रहे? इमरजेंसी के दौरान आरएसएस ने इंदिरा गांधी को चिट्ठियां क्यों लिखीं? आरएसएस ने बाबरी मस्जिद क्यों गिराई? आरएसएस द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्यों का क्या सबूत है? केरल और पश्चिम बंगाल में आरएसएस ने स्वयं को 'पीड़ित' दिखाने के लिए ख़ुद अपने स्वयंसेवकों की हत्या क्यों कराई? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अक्सर पूछे जाने वाले इन पांच सवालों के जवाब फिल्म 'आखिरी सवाल' में देने की कोशिश की गई है।

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वरुण धवन ‘गोविंदा’ बनने की कोशिश क्यों करते हैं? यह सवाल इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वरुण धवन के करियर को ध्यान से देखें तो जवाब उनकी अभिनय क्षमता में नहीं, बल्कि उनकी अभिनय-शैली के चुनाव में छिपा हुआ दिखाई देता है।

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है...

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ब्लॉकबस्टर फिल्मों ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर : द रिवेंज’ की शानदार सफलता के बाद अभिनेता राकेश बेदी अब सोनू त्यागी की बहुप्रतीक्षित आध्यात्मिक वेब सीरीज ‘टू ग्रेट मास्टर्स’ में मेजबान की भूमिका निभाते नजर आएंगे।

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“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…” दिल के किसी कोने से एक आह उठती है। क्या सच में हमने सिनेमा का वो जादू खो दिया है?

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पीएन ओक ने अपनी पुस्तक 'ताज महल : द ट्रू स्टोरी' में दावा किया था कि यह स्मारक दरअसल एक प्राचीन शिव मंदिर 'तेजो महालय' है। इतिहासकारों ने अब तक इसे खारिज ही किया है। अदालतों ने भी इसे प्रमाणित इतिहास के विपरीत बताया। लेकिन, इसी विवाद को संभवतः पहली बार सिनेमाई पर्दे पर रचा गया है।

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कभी एक 'चाणक्य' ने एक 'चंद्रगुप्त' को बनाया था। क्या हो जब आज के दिन कोई शिक्षक उन्हीं पदचिह्नों पर चलते हुए ढेर सारे 'चंद्रगुप्त' बना दे! और, क्या होगा जब ये सभी 'चंद्रगुप्त' एक साथ मिलकर पूरे तंत्र को अपने हिसाब से चलाने में सक्षम बन जाएं। और, इसके बाद, यदि इनमें से एक 'चंद्रगुप्त' विद्रोह कर अपने ही 'चाणक्य' के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो...! यह पूरा ताना-बाना बुना गया है प्रकाश झा की नई वेब सीरीज 'संकल्प' में...।

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क्या कोई ऐसा मानक है कि फलां फिल्म ओटीटी पर रिलीज होगी और फलां सिनेमाघरों में!? यदि नहीं तो 'सूबेदार' को ओटीटी पर रिलीज करना एक 'भूल' ही कहा जाएगा। अनिल कपूर फिल्म के निर्माताओं में से एक हैं और पूरी फिल्म को अपने कंधों पर रखकर चलते हैं। फिर उन्होंने इसे सिनेमाघरों में रिलीज करने का 'जोखिम' क्यों नहीं उठाया! यह जोखिम ले लेते तो दर्शक शायद उन्हें निराश नहीं करते। उन्हें देखकर 'तेजाब' वाला 'मुन्ना' याद आ जाता है...

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भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ यौन हिंसा रिपोर्ट की जाती है। इसी भयावह आंकड़े को याद दिलाने के लिए फिल्म ‘अस्सी’  में हर 20 मिनट बाद लाल स्क्रीन पर ‘20 मिनट’ लिखा आता है, मानो दर्शकों को झकझोर कर यह बताने के लिए कि वे जिस कहानी को देख रहे हैं, उसका आधार यह वास्तविकता है। शायद, यही शीर्षक फिल्म के लिए अधिक सार्थक भी होता...

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​'दो दीवाने सहर में' हां, बिल्कुल सही लिखा है। शब्द 'सहर' है, 'शहर' नहीं। सहर का अर्थ उर्दू में 'सुबह' होता है। हालांकि, इस 'सुबह' से फिल्म का कोई लेना-देना नहीं है। अब, चूंकि फिल्म का हीरो 'श' को 'स' बोलता है, तो फिल्म के टाइटल में भी 'स' है। वैसे फिल्म की हीरोइन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका हीरो 'श' को 'स' बोले या 'फ'। फिल्म के अंत तक वह अपने रिश्ते को लेकर 'फ्योर', मतलब 'स्योर', नहीं हो पाती है। निर्देशक रवि उदयवार की कारकिर्दगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही लगती है।

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